सूचना का अधिकार अधिनियम- वर्तमान स्थिति का विश्लेषण

सूचना का अधिकार अधिनियम ससंद द्वारा प्रशासन में पारदर्शिता व जवाबदेही लाने के लिये 2005 में पारित किया था। लेकिन गत दो दशकों में विभिन्न कारणों से इस अधिकार  स्थिति कमजोर हो रही है।

पहला, इसके क्रियान्वयन में अनेक कठिनाइयां हैं तथा व्यवहार में आम आदमी को सरकारी दफ्तर से सूचना प्राप्त करना कठिन काम है।

दूसरा, 1919 में सेरार क्षरा इस अधिनियम में संशोधन कर के्न्द्र व राज्यों के सुचना आयोगों की स्थिति को कमजोर कर दिया गया है। मूल अधिनियम में आयागों के सदस्यों व अघ्यक्ष क वेतन व सेवा शर्तों की व्यवस्था अधिनियम मे ही कर दी गई थी ताकि वे सरकार से स्वतंत्र होकर काम कर सकें। लेकिन इस संशोधन के बाद इनकी सेवा शर्तों व वेतन निर्धारण का अधिकार सरकार को प्राप्त हो गया हैं। इससे सूचना आयोगों की स्वायत्तता प्रभावित हुई है।

तीसरा, 2023 में संसद द्वारा डिजिटल डाटा संरक्षण अधिनियम पारित किया गया है। इस अधिनियम ने सुचना के अधिकार की धारा 8 में संशोधन कर दिया है। संशोधन यह है कि पहले सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत लोकहित की पूर्ति के लिये निजी सूचना भी दी  जा सकती थी। लेकिन डिजिटल डाटा संरक्षण अधिनियम के द्वारा निजी सूचना पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में पुत्तास्वामी मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत निजता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार की मान्यता प्रदान कर दी थी। वर्तमान में इन दोनो अधिनिमों में टकराव का मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

उक्त पृष्ठभूमि में सूचना के अधिकर की वर्तमान स्थिति का सरल विश्लेषण इस लेख में किया गया है।

भारत की संसद भारत सरकार द्वारा नियुक्त द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग, 2005-2009 ने सूचना के अधिकार को ’सुशासन की मास्टर चाबी’ की संज्ञा दी है। अन्य बातों के अतिरिक्त पारदर्शिता व जवाबदेही सुशासन के दो महत्वपूर्ण तत्व माने जाते हैं। सुशासन की धारणा को व्यवहारिक रूप देने में इन दोनो तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिये विभिन्न देशों में सूचना का अधिकार सुशासन की एक आवश्यक शर्त बन गया है। भारत में नागरिकों को सूचना का अधिकार संसद द्वारा 2005 में पारित सूचना का अधिकार अधिनियम द्वारा प्रदान किया गया है। उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार दिया गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिकार की व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अधिकार को भी शामिल किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एल. के. कूलवाल बनाम राजस्थान राज्य 1988 तथा दिनेश त्रिवेदी बनाम भारत संघ, 1997 के अपने निर्णयों में नागरिकों के सरकार की गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसी तरह नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय 1966 में भी नागरिकों के सूचना के अधिकार को एक मानव अधिकार की संज्ञा दी गयी है। भारत इस अभिसमय का अनुमोदन कर चुका है। फिर भी सूचना का अधिकार उस रूप मंे लागू नही हो पा रहा था जिसका लाभ सभी नागरिकों को प्राप्त हो सके। अतः भारतीय संसद ने 2005 में उक्त अधिनियम पारित कर इस अधिकार को एक कानूनी अधिकार के रूप मंे मान्यता दी।

     सूचना के अधिकार की आवश्यकता और महत्व- 1992 में विश्व बैंक द्वारा सुशासन की धारणा का प्रतिपादन किया गया था। तथा सुशासन की धारणा में खुलापन को उसकी एक प्रमुख विशेषता बताया गया था। प्रशासन तथा सरकार की गतिविधियों में खुलापन सुनिश्चित करने के लिए सूचना का अधिकार आवश्यक है। 

     सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की प्रस्तावना में भी इस अधिनियम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए यह कहा गया है कि जवाबदेह के लिए जागरूक नागरिक तथा सूचना मंे खुलापन का होना आवश्यक है। प्रस्तावना में यह भी कहा गया है कि सूचना का अधिकार अन्य लोकहितों जैसे- सरकारी कार्याें का प्रभावी निष्पादन, सीमित संसाधनों का समुचित प्रयोग अथवा संवेदनशील सूचनाओं की गोपनीयता के विरोध में हो सकता है। अतः इन दोनो स्थिति में समायोजन के लिए इस अधिनियम के द्वारा कतिपय मामलों मंे सूचना का अधिकार दिया जा रहा है।

     सूचना के अधिकार के महत्व को निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत समझा जा सकता हैं-

1. सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु- खुलेपन से युक्त सरकार ही जनता के प्रति जवाबदेह हो सकती है । सूचना के अधिकार द्वारा ही सरकार में खुलापन लाया जा सकता है तथा सरकार व प्रशासन को उसके कार्यों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जा सकता है।

2. नागरिकों और सरकार के बीच दोतरफा संचार हेतु- सूचना का अधिकार नागरिकों और सरकार के बीच दोतरफा संचार को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है। इस अधिकार के अंतर्गत नागरिक सरकारी विभागों के सम्पर्क में आयेंगे तथा प्राप्त सूचनाआंे के आधार पर सरकार की गतिविधियों के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकेंगे। इस प्रकार सूचना का अधिकार सरकार और जनता के बीच दोतरफा संवाद स्थापित करने में सहायक है।

3. नागरिकों द्वारा उचित निर्णयों के निर्माण में सहायक- सरकार की गतिविधियों के बारे में प्राप्त सूचना के आधार पर नागरिक विभिन्न सार्वजनिक मामलों में उचित तरीके से अपने दृष्टिकोण का निर्धारण कर सकते है। यदि उनके पास आवश्यक जानकारी नही है तो उनके निर्णय विवेक सम्मत नही हो सकते।

4. भ्रष्टाचार के निदान में सहायक- सरकारी और प्रशासनिक गतिविधियों में व्याप्त भ्रष्टाचार के पीछे एक मुख्य कारण इन गतिविधियों की गोपनीयता है। गोपनीयता के कारण अधिकारियों में अपने भ्रष्ट आचरण के लिए भय नही होता। सूचना के अधिकार से अधिकारियों का यह भय रहेगा कि उनकी कोई भ्रष्ट गतिविधि सार्वजनिक हो सकती है। अतः सूचना का अधिकार भ्रष्ट आचरण को रोकने में सहायक है।

5. सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं की निगरानी- सरकार द्वारा नागरिकों को विभिन्न प्रकार की सेवायें प्रदान की जाती है, जिसके लिए उन्हें कर अथवा फीस का भी भुगतान करना पड़ता है। अतः यह आवश्यक है कि इन सेवाओं की निगरानी नागरिकांे द्वारा की जाये। सूचना के अधिकार से निगरानी के लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसका दूसरा प्रभाव यह है कि सरकार अपनी सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए क्रियाशील होती है।

6. लोक सशक्तीकरण का साधन- सुशासन में विभिन्न स्तरों पर निर्णय-निर्माण में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसी भागीदारी को लोक सशक्तीकरण के नाम से जानते है। लोक सशक्तीकरण की कोई भी प्रक्रिया तब तक प्रभावी नही होगी जब तक नागरिकों को सरकार की गतिविधियों की जानकारी नही होगी। अतः सूचना का अधिकार लोक सशक्तीकरण का एक साधन है।

     सूचना के अधिकार के इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए भारत के द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने जून 2006 में प्रस्तुत अपनी पहली रिपोर्ट में सूचना के अधिकार को सुशासन की मास्टर चाबी की संज्ञा दी है।

     सूचना के अधिकार की पृष्ठभूमि

भारत में सूचना का अधिकार एक अप्रत्याशित घटना नही है। इसके पीछे जन आन्दोलन तथा विभिन्न स्तरों पर जन प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गयी मांगों की एक पृष्ठभूमि है। सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में सबसे पहले 1975 में उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण के मामले में नागरिकों के सूचना के अधिकार को अनुच्छेद 19 में वर्णित भाषण व अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के अंतर्गत शामिल करते हुए मान्यता प्रदान की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने बाद के कई निर्णयों में इसी दृष्टिकोण को अपनाया है। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार के साथ भी सूचना के अधिकार को जोड़ने का प्रयास किया है।

     सूचना के अधिकार अधिनियम के पहले कतिपय विशेष परिस्थितियों में नागरिकों को सरकार से सूचनायें प्राप्तकरने का अधिकार था। उदाहरण के लिए फैक्टरी अधिनियम 1948 में यह व्यवस्था हैं कि फैक्टरी के प्रबन्धक उस फैक्टरी के संचालन में निहित खतरों तथा स्वास्थ्य की हानि की सम्भावना के बारे में श्रमिकों का आवश्यक रूप से जानकारी देंगे। इसी तरह पर्यावरण संरक्षण अधिनिमय 1986 में विभिन्न उद्योगों से नागरिकों को प्रदूषण करने वाले तत्वों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अन्य कोई अधिकार प्राप्त नही था।

     इस विधिक स्थिति के अलावा नागरिकों व विभिन्न नागरिक समाज संगठनों द्वारा भी सूचना के अधिकार की संगठित मांग की गयी। यह मांग सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी के सम्बन्ध में जानकारी के लिए उठाई गयी। अरूणा राय के नेतृत्व में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने राजस्थान में विकास कार्यों के सम्बन्ध मंे फर्जी मजदूरी बिलों के सम्बन्ध में जानकारी का आन्दोलन चलाया। धीरे-धीरे यह मांग विकास कार्यों की सभी गतिविधियों के बारे में जानकारी के लिए देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गयी।

     1993 में अहमदाबाद स्थित कन्ज्यूमर एजूकेशन एण्ड रिसर्च काउन्सिल ने सूचना के अधिकार कानून का एक प्रारूप प्रस्तावित किया। इसी तरह 1996 में भारत की प्रेस परिषद द्वारा सूचना के अधिकार कानून का प्रारूप प्रकाशित किया गया, लेकिन सरकार ने इन प्रयासों को गंभीरता से नही लिया। 1996 में इसी संगठन ने सूचना के अधिकार के लिए एक राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की जिसका उद्देश्य देश के विभिन्न भागों में स्थानीय स्तर पर सूचना के अधिकार के लिए चलाये जाने वाले संघर्षांे को सहायता प्रदान करना था। इसका एक उद्देश्य सूचना अधिकार के लिए विभिन्न स्तरों पर सरकार पर दबाव बनाना भी था। इन प्रयासांे से  केन्द्र व राज्य स्तरों पर सूचना के अधिकार की मांग जोर पकड़ गयी।

     उक्त पृष्ठभूमि में केन्द्र सरकार ने 1997 में एच डी सूरी कमेटी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सूचना के अधिकार कानून का प्रारूप तैयार करना था। लेकिन इस कमेटी द्वारा प्रस्तावित प्रारूप मेें सूचना के सीमित दायरेे के कारण इसकी आलोचना की गयी।

     इसी बीच विभिन्न राज्यों ने अपने स्तर पर नागरिकों को सूचना का अधिकार देने के लिए राज्य अधिनियम पारित किये। इस तरह के अधिनियम तमिलनाडु मंे 1997 में, गोवा में 1998 में, राजस्थान तथा कर्नाटक मंे 2000, दिल्ली में 2001 में, महाराष्ट्र तथा असम में 2002 में तथा मध्य प्रदेश तथा जम्मू व कश्मीर में 2003 मंे पारित किये गये। इसी बीच तत्कालीन शहरी विकास मंत्री राम जेठ मलानी ने अपने स्तर से 1999 में नागरिकों को अपने विभाग की फाइलें देखने तथा उनकी प्रतियां प्राप्त करने के लिए अधिकृत जारी करने का आदेश जारी किया।

     अन्ततः तमाम संशोधन के बाद सूरी कमेटी द्वारा प्रस्तावित मसौदे को 2000 में संसद में प्रस्तुत किया गया तथा संसद द्वारा जनवरी 2003 में सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया गया। लेकिन यह अधिनियम कभी अस्तित्व में नही आया, क्योंकि इसे गजट में प्रकाशित नही किया गया। यद्यपि विभिन्न समाजसेवी संगठनों द्वारा सरकार पर इसे लागू करने का दबाव बनाने का प्रयास किया गया। मई 2004 के चुनावों में केन्द्र में सरकार का परिवर्तन हो गया तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार ने अपने न्यूनमत साझा कार्यक्रम की घोषणा के अनुसार एक अधिक प्रभावशाली कानून देने का प्रयास किया। इसी पहल के परिणामस्वरूप 23 दिसम्बर 2004 को सूचना अधिकार विधेयक लोकसभा मंे प्रस्तुत किया गया। इस विधेयक को लोकसभा ने कार्मिक मंत्रालय की स्थायी समिति को विचार के लिए प्रेषित किया जहां पर विधेयक के सम्बन्ध में विभिन्न नागरिक संगठनांे ने भी अपने सुझाव दिये। इस तरह इस कमेटी के रिपोर्ट पर आधारित संशोधित बिल पुनः 21 मार्च 2005 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा ने इस 11 मई को तथा राज्यसभा ने इसे 12 मई 2005 को पारित कर दिया। 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की सहमति के उपरान्त इस अधिनियम को 12 अक्टूबर 2005 को लागू किया गया।

सूचना अधिकार अधिनियम- 2005 के मुख्य प्रावधान

     इस अधिनिमय की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

    अ. सूचना का दायरा

इस अधिनिमय के अंतर्गत सूचना के अंतर्गत निम्नलिखित बातें शामिल होंगी-

अ. कार्य, दस्तावेज तथा अभिलेखों का अवलोकन।

ब. दस्तावेजों और अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां या उनके नोट प्राप्त करना।

स. किसी कार्य के सम्बन्ध में प्रयुक्त किये गये सामग्री का प्रमाणित सैम्पल प्राप्त करना।

द. इलेक्ट्रानिक रिकार्ड के प्रिन्ट आउट, फ्लापी आदि प्राप्त करना।

     2. सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया-

सूचना प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया निर्धारित की गयी हैं-

अ. सूचना का अवेदन किसी भी व्यक्ति द्वारा लिखित में हिन्दी अथवा अंगे्रजी अथवा स्थानीय भाषा में प्रस्तुत किया जायेगा। आवेदन पत्र में सूचना प्राप्त करने का कारण बताने की आवश्यकता नही है। इसमें वांछित सूचना का स्पष्ट विवरण तथा निर्धारित फीस संलग्न करना अनिवार्य है। वर्तमान में यह फीस 10 रूपये है। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले व्यक्तियों को फीस देने की आवश्यकता नही है।

ब. प्रत्येक विभाग अथवा प्रत्येक स्वतंत्र कार्यालय में एक जनसूचना अधिकारी नियुक्त किया जायेगा, जो आवेदन पत्र में मांगी गई वांछित सूचना को 30 दिन के अंदर उपलब्ध करायेगा। यदि सूचना का सम्बन्ध किसी व्यक्ति की जीवन व स्वतंत्रता से है तो ऐसी सूचना 48 घण्टे के अंदर प्रदान की जायेगी। यदि सूचना का सम्बन्ध किसी तीसरे पक्ष से है तो ऐसी सूचना अधिकतम 40 दिन की अवधि में उपलब्ध करायी जायेगी। तृतीय पक्ष का तात्पर्य यहां पर ऐसे पक्ष से है, जो सम्बन्धित विभाग का अंग नही है तथा उससे सूचना लेकर जनसूचना अधिकारी द्वारा आवेदक को सूचना दी जानी है। तृतीय पक्ष जनसूचना अधिकारी को अपनी आपत्ति के बारे में भी बता सकता है।

स. कौन सी सूचना नही दी जा सकती है?

अधिनियम की धारा 8 और 9 के अंतर्गत जनसूचना अधिकारी उन सूचनाओं को देने से मना कर सकता है, जिन्हें अधिनियम के अंतर्गत गोपनीय सूचनायंे माना गया है। इस अधिनियम की धारा 8 में निम्नलिखित सूचनाओं को गोपनयी सूचनायें माना गया है-

1. वे सूचनायें जो राज्य की सम्प्रभुता, अखण्डता, सुरक्षा, दूसरे देशों से सम्बन्ध तथा राज्य के सामरिक, आर्थिक व वैज्ञानिक हितों को प्रभावित करती है।

2. वे सूचनायें जो अपराध के लिए उकसाती है।

3.वे सूचनायें जिनसे न्यायालय की अवमानना होती हो अथवा न्यायालय द्वारा गोपनीय रखने के निर्देश दिये गये हों।

4. वे सूचनायें जो संसद तथा राज्य विधानमण्डलों के प्रति अवमानना पैदा करे।

5. व्यवसायिक या व्यापारिक गोपनीयता अथवा बौद्धिक सम्पदा से सम्बन्धित ऐसी सूचनायें जिनकों देने से तीसरे पक्ष की प्रतियोगी क्षमता प्रभावित होती हो।

6. न्यास सम्बन्धों से जुड़ी कोई सूचना, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी जनहित में उसे देना आवश्यक न समझे।

7. विदेशी सरकारों से विश्वास में प्राप्त की गयी सूचना।

8. ऐसी सूचना जो किसी व्यक्ति के जीवन व शारीरिक सुरक्षा के लिए घातक हो।

9. ऐसी सूचना जो किसी अपराध के सम्बन्ध में जांच की प्रक्रिया को बाधित करती हो।

10. मंत्रिमण्डल की बैठकों के सम्बन्ध मं मंत्रिमण्डल के दस्तावेज।

11. व्यक्तियों के निजी जीवन से सम्बन्धित सूचना।

     यद्यपि अधिनियम के अंतर्गत उक्त सूचनाओं को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया है, लेकिन किसी भी विभाग का शीर्ष पदाधिकारी उस सूचना को जनहि में देने के आदेश दे सकता है।

द. सूचना न मिलने पर क्या अग्रिम कार्यवाही की जा सकती है?

 यदि आवेदनकर्ता को सम्बन्धित जनसूचना अधिकारी द्वारा 30 दिन के अंदर वांछित सूचना नही प्राप्त होती है तो आवेदनकर्ता अपीलीय अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील दायर कर सकता है। अपीलीय अधिकारी उसी विभाग का जनसूचना अधिकारी से अग्रिम वरिष्ठ अधिकारी होता है और किसी भी विभाग का शीर्ष अधिकारी जिसे अधिनियम के अन्तर्गत पब्लिक अथारिटी कहा गया है, के द्वारा अपील अधिकारी की नियुक्ति की जाती है।

     अपीलीय अधिकारी इस तरह की अपील का निस्तारण 30 दिनों के अंदर करेगा। यदि अपील अधिकारी सूचना देने में असमर्थ रहता है अथवा 30 दिनों तक उस आवेदन पर कोई कार्यवाही नही करता तो आवेदक दूसरी अपील केन्द्रीय सूचना आयोग अथवा राज्य सूचना आयोग को कर सकता है। दूसरी अपील अपीलीय अधिकारी के निर्णय के 30 दिन के अंदर की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मामलों मंे केन्द्रीय सूचना आयोग को अपील की जाती है तथा राज्य सम्बन्धी मामलों में राज्य सूचना आयोग को अपील की जाती है। यदि आवेदक द्वारा दूसरी अपील दायर करने में 90 दिन से अधिक का समय लग जाता है तो भी सम्बन्धित सूचना आयोग इसमें छूट भी दे सकता है। लेकिन राज्य और केन्द्रीय सूचना आयोग को दूसरी अपील का निस्तारण करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नही की गयी।

     राज्य या केन्द्र सूचना आयोग यदि आवेदक के पक्ष में फैसला देता है तो सूचना न देने के लिए जनसूचना अधिकारी के ऊपर 250 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से, (अधिकतम 25,000) सूचना न देने हेतु दण्ड आरोपित किया जा सकता है। सूचना आयोग के निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय मंे अपील की जा सकती है। यह अपील किसी अधीनस्थ न्यायालय में नही की जा सकती।

केन्द्रीय व राज्य सूचना आयोग

     सूचना अधिकार अधिनिमय के अंतर्गत राज्य और केन्द्र दोनो स्तर पर अलग-अलग सूचना आयोग का प्रावधान किया गया है।

     मुख्य सूचना आयुक्त व अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति

केन्द्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम दस सूचना आयुक्त हो सकते है। इन सभी की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी की संस्तुति के आधार पर की जाती है। इस कमेटी में लोकसभा का विपक्ष का नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक अन्य केन्द्रीय मंत्री होता है। इन आयुक्तों को पद ग्रहण करने के पहले राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाई जाती है। आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा लेकिन केन्द्र सरकार की अनुमति से उसके अन्य कार्यालय दूसरे शहरों में भी स्थापित किये जा सकते है।

     राज्य सूचना आयोग में एक राज्य मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 राज्य सूचना आयुक्त होंगे। इन सभी की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी की सिफारिश पर की जायेगी। इस कमेटी में विधानसभा में विपक्ष का नेता तथा मुख्यमंत्री द्वारा नामित राज्य का एक अन्य कैबिनेट मंत्री होगा। राज्यपाल आयुक्तों को पद ग्रहण करने के पहले शपथ दिलायेगा। आयोग का मुख्यालय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित स्थान पर होगा।

     आयुक्तों की योग्यतायें- केन्द्र व राज्य दोनो में मुख्य सूचना आयुक्त व सूचना आयुक्तों के पद पर नियुक्ति लिए ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो सार्वजनिक जीवन में प्रसिद्ध हो तथा जिसे कानून, विज्ञान एवं तकनीकि, समाजसेवा, प्रबन्धन, पत्रकारिता, जलसंचार अथवा प्रशासन एवं शासन के क्षेत्र में व्यापक अनुभव व ज्ञान हो। संसद व विधानमण्डल के किसी सदस्य को आयुक्त के पद पर नियुक्त नही किया जा सकता तथा ऐसा व्यक्ति किसी लाभ के पद पर न आसीन हो तथा किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बद्ध न हो अथवा कोई व्यवसाय न कर रहा हो।

     सेवा शर्तें-

केन्द्र व राज्य दोनो में मुख्य सूचना आयुक्त तथा अन्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक रहेगा। इनके वेतन व सेवा शर्तों को उनके सेवाकाल में कोई अलाभकारी परिवर्तन नही किया जायेगा। लेकिन 2019 में सुचनाण्,िणकार अधिनियम में संशोधन कर 5 वर्ष की निर्धारित अवधि को समाप्त कर सरकार को सुचना आयुक्तों की सेवा शर्तें निर्धारित करने का अधिकार दे दिया गया है।

     केन्द्र के मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बराबर होगा तथा केन्द्र के अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन केन्द्र के निर्वाचन आयुक्तों के बराबर होगा। केन्द्र के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पुनः किसी भी पद पर तथा सूचना आयुक्त को पुनः उसी पद पर नही नियुक्त किया जा सकता है।

     राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन निर्वाचन आयुक्त के बराबर होगा तथा अन्य आयुक्तों का वेतन राज्य सरकार के मुख्य सचिव के बराबर होगा। लेकिन 2019 में इस अधिनियम में संशोधन कर निर्वाचन आयुक्त के समान वेतन की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है तथा केन्द्र अथवा राज्य सरकारों को क्रमशः के्रन्द्र के सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की सेवा शर्तें व वेतन निर्धारण का अधिकार दे दिया गया गया है। उक्त संशोधन से सूचना आयोगों की स्थिति कमजोर हुई है।

     पदमुक्ति- केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को पदमुक्त करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को प्राप्त है। राष्ट्रपति मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को दुव्र्यवहार तथा अक्षमता के आरोप के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के द्वारा की गयी जांच के उपरान्त दोष सिद्ध होने पर उसके पद से हटा सकता है।

यदि मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त के विरूद्ध दुव्र्यवहार के आरोप की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जांच की जा रही है तो उस जांच की अवधि में राष्ट्रपति द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को निलम्बित भी किया जा सकता है।

यदि मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त के प्रति निम्नलिखि में से कोई आरोप लगाया जाता है तो उसे राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच किये बिना भी पद से हटाया जा सकता है

अ. यदि उसे दिवालियां घोषित कर दिया गया हो।

ब. यदि वह अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य किसी सवैतनिक रोजगार में संलग्न है।

स. राष्ट्रपति की दृष्टि से वह शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता के कारण अपना कार्य करने मंे असमर्थ है।

द. यदि ऐसे मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त ने सरकार के किसी ऐसे ठेके और कार्य में हिस्सा लिया है जिसका लाभांश उसे प्राप्त हो रहा है।

     उक्त आधारों पर यदि किसी मुख्य सूचना आयुक्त अथवा सूचना आयुक्त को हटाया जाता है तो उसकी जांच सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से कराना आवश्यक नही है।

     राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त को इसी रीति से राज्यपाल द्वारा पदमुक्त अथवा निलंबित किया जाता है। दोनो की प्रक्रिया एक है अन्तर केवल यह है कि राज्य के सम्बन्ध में पदमुक्ति करने का अधिकार राष्ट्रपति की बजाए राज्यपाल को प्राप्त है।

     सूचना आयोग के कार्य- राज्य व केन्द्र दोनो स्तरों पर सूचना आयोग के निम्नलिखित कार्य हैं-

समय से सूचना न पाने, अधिक फीस मांगे जाने, जनसूचना अधिकारी के उपलब्ध न होने या गलत सूचना दिये जाने आदि के सम्बन्ध में आवेदकों से शिकायत प्राप्त करना तथा उनका निस्तारण करना।

आयोग को इन शिकायतों के निस्तारण में सिविल कोर्ट की निम्न शतियां प्राप्त होगी-

1. देश के अन्दर किसी भी व्यक्ति को गवाही के लिए बुलाना, उसका परीक्षण करना तथा उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने का अधिकार।

2. किसी मामलें से सम्बन्धित सरकारी दस्तावेजों को आयोग के समक्ष मंगाने का अधिकार।

3. शपथ पत्र के माध्यम से गवाही लेने का अधिकार।

4. किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से किसी सरकारी आदेश व उसकी प्रति प्राप्त करना।

5. गवाहों तथा दस्तावेजों की छानबीन के लिए आदेश जारी करना।

6. कोई अन्य विषय जो केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाये।

7. सूचना आयोगों को अपने आदेशों के पालन के लिए लोक प्राधिकारियों को निर्देश देने का अधिकार प्राप्त है। इन आदेशों में निर्धारित सूचना देने, जनसूचना अधिकारियों की नियुक्ति करने, आवेदक को क्षतिपूर्ति देने तथा अन्य मामलों से सम्बन्धि आदेश शामिल है।

8. सूचना आयोग दोषी पाये जाने पर सम्बन्धित जनसूचना अधिकारी पर 250 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से (अधिकतम 25000 रूपयें) का दण्ड आरोपित कर सकता है। इस दोष में समय से सूचना न दिया जाना, गलत सूचना दिया जाना, सूचना की प्रक्रिया को बाधित करना अथवा सूचना के लिए आवेदन स्वीकार करने से मना करना आदि कार्य शामिल है।

     सूचना अधिकार के सम्बन्ध में सरकार की जिम्मेदारी-

सूचना अधिकार अधिनियम में केन्द्र तथा राज्य सरकारों को भी कतिपय जिम्मेदारियां दी गयी है जो निम्नलिखित हैं-

1.  जनता को सूचना अधिकार के सम्बन्ध में जागरूक बनाने के लिए शैक्षणिक कार्यक्रम चलाना जिसमें विभागों के लोक अधिकारी शामिल होंगे।

2. जनता को समय पर तथा सही सूचना उपलब्ध कराने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना।

3. जनसूचना अधिकारियों तथा अपीलीय अधिकारियों के नाम व पते की सूचना जनता को देना तथा उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।

4. राज्य व केन्द्र सरकार का प्रत्येक मंत्रालय अपने अधीन विभागों के लोक अधिकारियों से सूचना अधिकार के सम्बन्ध में प्राप्त आवेदनों तथा कृत कार्यवाही की जानकारी प्राप्त कर प्रतिवर्ष उसकी रिपोर्ट सम्बन्धित सूचना आयोग को प्रेषित करेगा।

     सूचना अधिकार के क्रियान्वयन में कठिनाईयां

इस सम्बन्ध में इस अधिनिमय के क्रियान्वयन में निम्न कठिनाईयां सामने आ रही हैं-

1. कई समीक्षकों ने अधिनियम में अधिकारियों द्वारा फाइलों पर दी गयी नोटिंग को सूचना के अधिकार से बाहर करने पर इसकी आलोचना की है। इन नोटिंग को सूचना अधिकार से बाहर करने पर भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा मिलेगा।

2. अधिनियम की एक कमी यह है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा की जायेगी, अतः उनकी कार्यात्मक स्वायत्ता बाधित हो सकती है। पुनः अधिनिमय में दण्ड की व्यवस्था अपर्याप्त है तथा जनसूचना अधिकारी इस दण्ड से भयभीत नही होंगे। साथ ही विभिन्न राज्यों में सरकारी प्रक्रियायें अलग है, अतः इस सम्बन्ध मंे एकरूपता का अभाव है।

3. वर्तमान परिवेश में अधिनियम को लागू करने में कतिपय व्यवहारिक कठिनाईयां भी सामने आ रही है। जैसे- कार्यालय में अभिलेख रखने की कोई नियमित व्यवस्था नही है, प्रशासनिक अधिकारियों का दृष्टिकोण इस अधिनियम के अनुकूल नही है, सूचना सम्बन्धी कार्य के निस्तारण के लिए प्रशासनिक अधिकारी व कर्मचारी प्रशिक्षित नही है तथा इस सम्बन्ध मंे जनता को पर्याप्त जानकारी नही है।

     द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें

केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने जून 2006 में प्रस्तुत अपनी प्रथम रिपोर्ट में ही सूचना के अधिकार को सुशासन की मास्टर चाबी की संज्ञा दी है। आयोग के अनुसार इस अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन तीन तरह के मौलिक बदलावों पर निर्भर करता है-

1. गोपनीयता की संस्कृति से खुलेपन की संस्कृति की ओर बदलाव

2. सत्ता के निजी प्रयोग से जबावदेही की तरफ बदलाव।

3. एकपक्षीय निर्णय-निर्माण से सहभागी निर्णय-निर्माण की ओर बदलाव।

     उक्त टिप्पणी के आलोक में  आयोग ने सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए दो प्रकार के सुझाव दिये हैं-

1. आयोग के अनुसार सूचना के अधिकार को बाधित करने वाले सभी कानूनों तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं विश्ेाषकर गोपनीयता के नियमों, लोकसेवा आचरण नियमों तथा अभिलेखो के वर्गीकरण के नियमों में संशोधन किया चाहिए। ताकि वांछित सूचनायें उपलब्ध करायी जा सके। आयोग के अनुसार 1923 के सरकारी गोपनीयता अधिनियम को समाप्त कर देना चाहिए।

2. दूसरे प्रकार के सुझाव सूचना अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में है। इस सम्बन्ध में सरकार में जवाबदेही तय करने, सूचना मांगने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का संरक्षण करने तथा सत्ता के विकेन्द्रीकरण की सिफारिश की गयी है। उन्होंने सूचना के अधिकार को लागू करने के लिए एक व्यवस्था निर्माण की संस्तुति की है। इस संस्तुति के आलोक में भारत की संसद में 2011 व्हिसिल ब्लोअर संरक्षण विधेयक प्रस्तुत किया गया था। 2014 में राष्ट्रपति की सहमति के उपरान्त व्हिसिल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम अस्तित्व में आ गया है। इय अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार व सत्ता के दुरूपयोग के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को विभिन्न दबाओं तथा खतरों से संरक्षण प्रदान करना है।

     निष्कर्ष

कतिपय मामलों में सूचना अधिकार का प्रयोग नागरिकों द्वारा निजी हितों की पूर्ति व प्रशासन को परेशान करने की नीयत से भी किया जा रहा है। ‘सिटीजन चार्टर’ के प्रति नागरिकों मंे जागरूकता नहीं है और न ही सभी विभागों ने इसे लागू किया है। फिर भी इतना अवश्य है कि उक्त प्रयासों से प्रशासन में खुलेपन की प्रक्रिया आरम्भ हुयी है। जननिगरानी से प्रशासनिक सुधार व प्रशासन की क्षमता विकास को प्रोत्साहन मिल सकता है। निगरानी के अभाव मंे कार्य-निष्पादन की कमी के परिणाम प्रशासनिक व्यवहार का आम अंग बन जाते हैं तथा जटिल समस्यायें उत्पन्न करते हैं। वास्तव में प्रशासनिक कार्य निष्पादन में जनता को भागीदार बनाना, जनता व प्रशासन दोनों के लिये लाभदायक है। इससे जनता में जागरूकता आती है तथा प्रशासन में स्थायित्व आता हैं। इससे ननौकरशाही को जनसमर्थन को जनसमर्थन प्रप्त होता है तथा  सामाजिक पूँजी (ैवबपंस ब्ंचपजंस) में वृद्धि होती है। एस.एन. सदासिवन के अनुसार, ”सरकार के कार्य निष्पादन की जानकारी पाने का अधिकार जनता का आधारभूत अधिकार है। इससे नागरिकों में जानकारी व सरकार के कार्यों में रूचि उत्पन्न होती है। सरकार के स्थायित्व के लिये नागरिकों का समर्थन तभी प्राप्त किया जा सकता है जब प्रशासन अपनी जांच पड़ताल के लिये तैयार हो। अतः सूचन के अधिकार का ्रपभावी क्रियान्वयन आवश्यक है तथा सूचना के अधिकार तथा निजता के अधिकार में इस प्रकार से तारतम्य बनाने की आवश्यकता है कि प्रशासन की पारदर्शिता बाधित न हो।

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