पाकिस्तान ने 2026 में ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थता करने के प्रयासों तथा 2025 में साउदी अरब के साथ आपसी सहयोग का समझौता करके अपने वैश्विक अलगाव को कम करने का प्रयास किया है। लेकिन उसकी आन्तरिक चुनौतियां कम हाने का नाम नही ले रही है। जुलाई 2026 में ही पाकिस्तान को तीन मार्चों पर हिंसा व अलगाववाद का सामना करना पडा है। पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर की विधान सभा में शरणार्थियों की 12 सीटें समाप्त करने के विरोध में इस क्षेत्र की जनता ने ज्वाइन्ट अवामी एक्सन कमेटी के नेतृत्व में व्यापक प्रदर्शन व आन्दोलन चलाया है। यद्यपि पाकिस्स्तान की सेना ने बलपूर्वक इस आन्दोलन को दबाने का प्रयास किया है, लेकिन तनाव जारी है। इसी प्रकार जुलाई 2026 में ही लम्बे समय से चला आ रहा बलूचिस्तान का अलगाववादी आन्दोलन पुनः हिंसक हो गया है। जुलाई 2026 में ही बलूचिस्तान के अलगाववादी आन्दोलन में पाकिस्तान सेना के 74 सैनिक मारे गये है। पाकिस्तानी सेना ने अलगाववाद को दबाने के लिये वहां आपरेशन शाबान नामक अभियान चलाया है। इसी तरह पाकिस्तान की अफगान सीमा से लगे खैबर-पख्तूनख्वा प्रान्त में तहरीक-ए तालीबान पाकिस्तान नामक आतंकी समूह क्षरा पाकिस्तान की सेना पर निरन्तर हमले किये जा रहे है तथा पाकिस्तान की सेना के 15 जवान शहीद हुये है। ये सभ्सी हिंसक घटनायें उस समय हो रही है जब पाकिस्तान एक आर्थिक संकट का सामना भी कर रहा है। उक्त सभी घटनायें एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के अस्तित्व के लिये नई चुनौती हैं।
इस प्रकार जब पाकिस्तान अपने अस्तितव के 79 वें साल से गुजर रहा है तो उसके बारे में कई प्रकार की छबि उभरती है- एक देश जो अपने कई क्षेत्रों में अलगाववाद व हिंसा की चपेट में है; एक देश जो गंभीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है; जहां विकास के पहले ही लोकतांत्रिक संस्थाओं का व्यापक क्षरण हो रहा है; जो एक असफल राज्य है; अथवा जो राज्य समर्थित आतंकवाद का किताबी उदाहरण है । इनमें से कोई भी छबि सकारात्मक नही है। अगस्त 1947 में एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उदय से लेकर अब तक अव्यवहारिक लक्ष्यों का प्राप्त करने का प्रयास करना पाकिस्तान की नियति रहा है। तथापि गत पांच सालों में पाकिस्तान की राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था में एक साथ संकट उत्पन्न हुये है, जिन्होंने पाकिस्तान के एक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। आर्थिक व राजनीतिक संकटों का एक साथ उत्पन्न होना, पाकिसतान के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है। जहां एक ओर अर्थव्यवस्था में गभीर ऋणग्रस्तता, तीव्र मंहगाई तथा उत्पदन में कमी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर राजनीतिक व्यस्था की प्रत्येक संस्था यथा संसद, न्यायपालिका तथा विधि के शासन आदि में पतन दिखाई दे रहा है। ऐसा लगता है है कि सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनो में सक्रिय राजनीतिक वर्ग नीचे से ऊपर तक लोकतांत्रिक प्रकिया के पतन में अपना योगदान दे रहा है। इस राजनीतिक संकट का यही संदेश है, भले ही पाकिस्तान ने फरवरी 2024 के चुनावों के बाद एक सरकार का गठन कर लिया है। यदि पाकिस्तान में कोई संस्था अथवा विचार जीवित है तो वह है – सेना तथा घार्मिक कट्टरता।
तमाम नकारात्मक परिणामों के बावजूद इन दोनो का पाकिस्तान में उपयोगिता बनी हुई है। दोनों ने पाकिस्तान तथा उसके लोगों को उक साथ बनाये रखा है। देश अपनी सीमाओं की रक्षा के लिये सेनाओं का गठन करते है। लकिन पाकिस्तान में सीमाओं कर रक्षा में भले ही सेना की भूमिका प्रभावशाली न हो लेकिन आन्तरिक एकीकरण में उसकी भूमिका का नकारा नही जा सकता है। यह किसी संस्था की भूमिका में बदलाव अथवा उसके विस्तार का शास्त्रीय उदाहरण है।
इन सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि पाकिस्तान में आत्म-परीक्षण की क्षमता का लोप हो गया है। इसका तात्पर्य है कि भविष्य में भी सुधार कोई आशा नही है। कई विश्लेषक दावा करते हैं कि पाकिस्तान एक असफल राज्य नही है बलिक एक असुरक्षित राज्य है जो गलत नीतियों का चुनाव करता है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि पाकिस्तान आखिर क्यों गलत नीतियों का चयन करता है? क्या धर्म के आधार पर नये राज्य की स्थापना हेतु पाकिस्तान की मांग एक गलत मांग नही थी? पाकिस्तान कैसे इस स्थिति में पहुंच गया है? कौन से आधारभूत तत्व है जो पाकिस्तान द्वारा गलत नीतियों व विकल्पों के चयन के लिये उत्तरदायी है? यही प्रश्न इस आलेख की मुख्य विषयवस्तु है।
पाकिस्तान का उदय तथा राष्ट्रीय पहचान
किसी देश की राष्ट्रीय पहचान उसके व्यवहार व उसकी प्राथमिकताओं ाके आकार देनो वाला महत्वपूर्ण कारक है। पाकिसतान की राष्ट्रीय पहचान का निर्माण व विकास उसके उदय के सन्दर्भ से जुड़ा हुआ है। इस सन्दर्भ के तीन पहलू महत्वपूर्ण है।
पहला, भारत में लम्बे समय तक रहे इस्लामिक शासन के एक कल्पित दोहराव का विचार पाकिस्तान की मौलिक धारणा में निहित है। मान्यता यह थी कि चूंकि भारत में लम्बे समय तक मुसलमान शासको ने शासन किया है अतः अब मुसलमान जनता हिन्दू बहुमत वाले शासन के अधीन नही रह सकती। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय मुस्लिम लीग ने देश की आजादी के लिये कोई सकारात्मक योगदान नही दिया लेकिन कांग्रेस के वर्चस्व से उक्त धारणा को मजबूत कर लिया। लेकिन इतिहास को दोहराना हर बार संभव नही होता है। पाकिस्तान ने इस कल्पित इतिहास को पाने के स्थान पर एक स्वतंत्र मुस्लिम देश का विकल्प चुन लिया।
दूसरा, ब्रिटिश शासन की फूट डालो व शासन करो की नीति के चलते मुस्लिम लीग को बिना किसी प्रयास के ही एक अलग राष्ट्र के सपने को साकार करने में सफल हो गई। पाकिस्तान के निर्माण में मुस्लिम लीग का योगदान बयानबाजी व अड़ियल रूख अपनाने तक सीमित रहा है। यह किसी लम्बे संघर्ष का परिणाम नही है इसीलिये इसमें भविष्य की किसी व्यापक सोच का अभाव है।
तीसरा, स्वतंत्र भारत में भविष्य में मुसलमानों की भावी स्थिति को लेकर मुस्लिम लीग की नकारात्मक सोच का होना है। इस प्रकार पाकिस्तान अतीत के इतिहास को दोहराने मुसलमानों के लिये एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने तथा तत्कालीन ब्रिटिश नीतियों से प्राप्त अवसर का लाीा उठाने का परिणाम है।
यद्यपि 1930 में मुस्लिम लीग ने अपने इलाहाबाद अधिवेशन में मुसलनमानों के लिये एक अलग राष्ट्र का विचार रखा था, लेकिन इस विचार को पाकिस्तान के रूप में एक ठोस आकार देने का श्रेय रहमत अली को जाता है जिन्होने 1933 में लन्दन में जारी एक पम्फलेट में पाकिस्तान शब्द का प्रयोग करते हुये उसकी स्थापना की अपील की थी, ’’मैं भारत की पांच उत्तरी इकाइयों- पंजाब, उत्तरी-पश्चिमी सीमान्त प्रदेश (अफगान), कश्मीर, सिन्ध तथा बलूचिस्तान में निवास कर रहे पाकिस्तान के 30 मिलियन मुसलमानों की ओर से अपील करता हूुं। इसमें उनकी राष्ट्रीय मान्यता की मांग शामिल है जो भारत में निवास कर रहे अनय निवासियों से अलग है तथा उसे धार्मिक, सामाजिक तथा ऐतिहासिक आधार पर स्थापित किया जाना चाहिये। मोहम्मद अली जिन्नाह ने इस विचार को ग्रहण कर लिये तथा अपने द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त के आधार पर पाकिस्तान की मांग को एक राजनीतिक कार्यक्रम में बदल दिया। द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त का आवश्यक तत्व यह विचार है कि मुसलमान तथा हिन्दू दो अलग राष्ट्र है तथा उनकी संस्कृति व अपेक्षायें भिन्न है, अतः वे एक साथ नही रह सकते है। इस प्रकार पाकिस्तान का विचार हिन्दू विरोध अथवा भारत विरोध में निहित है। पाकिस्तान को इस प्रकार की पहचान से समस्या नही होती यदि भारत भी पाकिस्तान की तरह एक छोटा घार्मिक राज्य होता, लेकिन एक बड़े व विकसित भारत का विरोध पाकिसतान के लिये व्यवहारिक नही है। जिन्ना इस वास्तविकता का नही समझा पाये। वास्तव में यदि देखा जाये तो जिन्ना न तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और नही कि पाकिस्तान के बारे में उनका कोई दीर्घकालीन विजन था। जिन्ना उपस्थित अवसर का लाभ उठाने में माहिर थे। पाकिस्तान के निर्माण में यही उन्होनें किया। इस बात को पाकिस्तान का प्रबुद्ध वर्ग अब स्वीकार करने लगा है। स्टाकहोम विश्व विद्यालय में राजनीति विज्ञान के एमेरिटस प्रोफेसर इश्तियाक अहमद पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति के लिये जिन्ना को दोषी पाते है क्योंकि उनके अनुसार जिन्ना के पास पाकिस्तान के भविष्य को लेकर कोई विजन नही था (थापरः 2024)।
यदि हम पाकिस्तान के निर्माण की उक्त पृष्ठभूमि का आंकलन करते है तो पाते है कि पाकिस्तान का निर्माण भारत-विरोधी विचार की नीव पर हुआ। यही पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का आधार है तथा इस विचार से पाकिस्तान गत 20 दशकों में उभर नही पाया। अतः पाकिस्तान को अपनी एकता व राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने के लिये एक विरोधी के रूप में भारत की आवश्यकता है। लेकिन पाकिस्तान का एक विचार अव्यवहारिक है, क्योंकि जनसंख्या, आकार तथा विकास की दृष्टि से भारत पाकिस्तान से बहुत आगे है।
पकिस्तान की भारत-विरोधी राष्ट्रीय पहचान के परिणाम
पकिस्तान की यही राष्ट्रीय पहचान पाकिस्तान के घरेलू व बाह्ष् वयवहार का निर्धारण करती रही है। इस संबन्ध में पाकिस्तान के राष्ट्रीय व्यवहार की निम्न तीन प्रवृत्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय है-
अ. भारत का स्थाई व प्रत्येक स्तर पर विरोध- पाकिस्तान के सैन्य, धार्मिक व राजनीतिक अभिजन भारत को अपना स्थाई विरोधी मानते है तथा उसे अपनी सुरक्षा व विकास में खतरा मानते है। यह तथ्य पाकिस्तान के राजनीतिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान में भारत के समझज्ञैता अथवा सुलह का सुझाव देना ही राष्ट्र विरोधी गतिविधि माना जाता है। इसी असुरक्षा की भावना के कारण पाकिस्तान में सेना तथा धार्मिक उग्रवादियों का औचित्य बना हुआ है। सेना तथा पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार अपनी कमजोरियांे से जनता का ध्यान बटाने के लिये भारत के साथ तनाव को बढ़ावा दिया है। इस भारत विरोधी नीति के तीन परिणाम सामने आये हैं-
1. पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में सेना का वर्चस्व बना हुआ है। पाकिस्तान का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि सेना पाकिस्तान की सुरक्षा के लिये आवश्यक है। अतः सेना को पर्याप्त राजनीतिक व सैनिक शक्तियां प्राप्त होनी चाहिये। इस स्थिति का फायदा उठाकर पाकिस्तान की सेना ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक परिदृश्य पर भी अपना वर्चस्व मजबूत कर लिया है। अब तक के पाकिस्तान के इतिहास में तीन दौर में (1958-1071; 1977-1988; 1999-2008) चैतीस वर्षों तक सैनिक शासन रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान की सेना ने राजनीतिक नेतृत्व को अंघेरे में रखकर 1999 में भारत के साथ कारगिल युद्ध छेड़ दिया था। इसके साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से भी सेना ने पाकिस्तान की राजनीतिक सत्ता व नीतियों पर नियंत्रण बनोये रक्षा है। उदाहरण के लिये 2018 के चुनाव सेना के सहयोग व समर्थन से ही इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहररीके इन्साफ अथवा पी0टी0 आई0 को सत्ता प्राप्त हुई थी। जब इमरान खान ने सेना के निर्देशों की अनदेखी करनी शुरू कर दी तो सेना ने विपक्षी दलों के साथ साठ गांठ कर अप्रिल 2022 में सत्ता से बेदखल कर दिया। इतना ही नही पी0टी0 आई0 को अवैध घोषित कर इमरान खान व उनके समर्थकों के जेल में डाल दिया गया है। फरवरी 2024 के चुनावों में सभी दलों में इमरान समर्थित स्वतंत्र उम्मीदवारों की सबसे अधिक सीटें प्राप्त हुई थी लेकिन सेना के प्रभाव के चलते पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के गठबन्धन को सरकार बनाने का अवसर प्राप्त हुआ।
2- इसका दूसरा प्रभाव पाकिस्तान में सेना में सेना के राजनीतिक वर्चस्व के कारण लोकतंत्र तथा उसकी संस्थाओं का निरन्तर क्षरण होना है। सेना के प्रभाव के चलते पाकिस्तान मे ंसभी लोकतंात्रिक संस्थायें जैसे संसद, न्यापालिका तथा विधि के शासन का ह्रास हुआ है। यही पाकिस्तान में लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान की राजनीतिक संस्कति का सबसे विचित्र तत्व यह है कि राजनीतिक सत्ता का प्रयोग सेना के द्वारा किया जाता है लेकिन वह जनता के प्रति उत्तरदायी नही है, वही दूसरी ओर राजनीतिक नेतृत्व जनता के प्रति जवाबदेह है लेकिन उनके पास स्वंतत्र निर्णय लेने की शक्ति नही है।
3. इसका तीसरा प्रभाव पाकिस्तान की राजनीति में धार्मिक उग्रवादी तत्वों का बढ़ता प्रभाव है। सेना इन ततवों साथ गठजोड़ करने में कोई संकोच नही करती है। पाकिस्तान में धार्मिक तथा कानूनी तौर को धर्म तथा धार्मिक तत्वों को विशेष स्थान दिया गया है। पाकिस्तान एक घोषित धार्मिक राज्य है। 1973 के संविधान के अनुच्छेद 228 में इस्लामिक कौंसिल की स्थापना का प्राविधान है जो यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका द्वारा बनोय गये कानून इस्लाम की मान्यताओं के विपरीत न हों । इसी प्रकार अनुच्छेद 203 में संघीय शरियत न्यायालय की स्थापना की गई है जो यह सुनिश्चित करता है कि न्यायपालिका के निर्णयों में शरियत के कानूनों का उल्लंघन न हो। यह बात सर्वविदित कि जिया उल हक के कार्यकाल (1977-1988) में पाकिस्तान की सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं यथा शिक्षा, सेना, न्यापालिका आदि में उग्रवादी इस्लामिक तत्वों को बढ़ावा दिया गया। लेकिन जिया उल हक का यह कार्य अचानक से नही हुई, बल्कि इसकी जड़े पाकिस्तान के निर्माण में ही निहित है। कतिपय कारणों जैसे निर्णय निर्माताओं की अपनी धार्मिक पहचान, हिन्दू देश भारत को अपना विरोधी मानना, तथा सेना द्वारा लोकतंत्र को अपनी स्थिति के लिये खतरा मानना आदि के कारण धार्मिक उग्रवादियों के साथ गठबन्धन को विदेश नीति के एक उपकरण के रूप में स्वाभाविक मान्यता प्रदान की गई । इस प्रकार यह स्वाभाविक है कि विभिन्न विचारधाराओं के धार्मिक उग्रवादी समूहों को पाकिस्तान में प्रभावी व सम्मानजनक स्थिति प्राप्त है। लेकिन इससे पाकिस्तान में पंथ निरपेक्ष लोकतंत्र के विकास की आशा घूमिल हो गई है।
सेना व धार्मिक उग्रवादियों के बीच मजबूत होते गठजोड़ को सबसे महत्वपूर्ण परिणाम पाकिस्तान में राज्य समर्थित आतंकवाद के रूप में सामने आया है। यद्यपि पाकिसतान में आतेकवाद की विसा व्यवस्थित रूप् से अफगानिस्तान में रूसी सेनाओं के विरोध में 1980 के दशक में हुआ लेकिन 1989 में अफगानिस्तान से रूसी सेनाओं की वापिसी के बाद इन आतंवादी समूहो का इस्तेमाल पाकिस्तान द्वारा मुख्यतः भारत के विरूद्ध किया गया। वर्ष 1948, 1965 तथा 1971 में भारत-पाक युद्धों में पाकिस्तानी सेना की पराजय के बाद आतंकवाद का हथियार पाकिस्तान की सेना के लिये भी उपयुक्त था। मान्यता यह थी कि खुले युद्ध में भारत भले ही मजबूत है लेकिन आतंकवाद के सामने वह टिक नही पायेगा। यही आतंकवाद आज भारत व पाकिस्तान के संबन्धों में एक बड़ी फांस बना गया है। भारत ने पाकिस्तान के साथ बत-चीत दोबारा आरंभ करने के लिये उससे आतंकवाद को छोड़ने की पूर्व शर्त रखी है।
पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद अब पाकिस्तान के लिये भी घातक सिद्ध हो रहा है। अफगान सीमा पर सक्रिय तहरीके तालिबान पाकिस्तान-टी0टी0पी0 नामक आतंकवादी समूह पाकिस्तान की सेना को चुनौती दे रहा है। इस समूह को अफगानिस्तान तालीबान का समर्थन प्राप्त है। इसी कारण वर्तमान में पाकिस्तान व अफगानिस्तान के संबन्धों में तनाव उत्पन्न हो गया है। पाकिस्तान के आतंकवादी समूह पाकिस्तान में कार्यरत चीन के कार्मिकों के विरूद्ध भी हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम दे रहे है। कई चीनी कार्मिक पाकिस्तान में मारे जा चुके है। इसके कारण चीन ने पाकिसतान में संचालित कतिपय परियोजनाओं में काम करना बनद कर दिया है।
ब. पाकिस्तान द्वारा भारत के साथ समानता (पैरिटी) प्राप्त करने की इच्छा- पाकिसतान भारत को अपना विरोधी ही नही उसे अपना परम प्रतिद्वन्द्वी भी मानता है तथा अपने जन्म से ही प्रत्येक क्षेत्र में भारत के साथ समानता बनाने का प्रयास करता रहा है। इसी कारण पाकिस्तान की कई नीतियां व निर्णय अव्यवहारिक सिद्ध हुये है। वर्ष 1974 में जब भारत ने अपना परमाणु परीक्षण किया तो भारत की बराबरी करने के लिये पाकिस्तान ने भी अपना परमाणु कार्यक्रम आरंभ कर दिया। वर्ष 1998 में जब भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया तो अगले ही वर्ष पाकिस्तान ने भी अपना परमाणु परीक्षण संपन्न किया। इस प्रक्रिया में उसके ऊपर दूसरे देशों से परमाणु तकनीकि चोरी करने का भी आरोप लगा। वर्ष 2017 में पाकिस्तान ने भी चीन के सहयोग से शंघाई सहयेाग संगठन की सदस्यता प्राप्त कर ली। अब जब भारत परमाधु आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता हेतु प्रयासरत है तो पाकिस्तान भी चीन के सहयोग से इसमें सदस्यता प्राप्त करना चाहता है। इसके अलावा पाकिस्तान यूनाइटिंग फार कान्सेशस नामक उस समूह का सदस्य है जो भारत सहित अन्य देशों की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता का विरोध कर रहा है। इस प्रकार भारत के साथ समानता पाने की ललक में पाकिस्तान ऐसी नीतियों का अपना रहा है जो न तो उसके लिये आवश्यक है और न ही उसके लिये व्यवहारिक है।
स. भारत को संतुलित करने के लिये बड़ी शक्तियों की शरण- पाकिस्तान अपनी क्षमाताओं के आधार पर भारत जैसेी उभरती शक्ति को संतुलित नही कर सकता है। इसके लिये पाकिस्तान ने आरभ से ही असमान स्तर पर बड़ी शक्तियों का साथ लेने का प्रयास किया है। 1950 के दशक में तब भारत अपनी गुटनिरपेक्षता नीति के आधार पर तीसरी दुनियां के देशों के साथ सहयोग व साझेदारी को बढ़ा रहा था तो पाकिस्तान ने अमेरिका के नेतृत्व वाले सैनिक गठबनधनों जैसे सीटो व सेण्टो आदि की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। वर्ष 1971 के युद्ध के समय पाकिसतान ने अमेरिका से सैनिक व कूटनीतिक सहयता प्राप्त की। बाद में जब 1080 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत सेनायें तैनात थी तो उसने शीत युद्ध की राजनीति के अन्तर्गत अमेरिका के सथा सामरिक संबन्ध विकसित किये। इसी तरह 9/11 की आतंकी घटना के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबन्ध और मजबूत हुये क्याेंकि अमेरिका अफगानिस्तान में आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई में पाकिस्तान का साथ चाहता था। लेकिन जब अमेरिका ने अफगानिसतान से वापिस जाने की नीति अपनाई तो पाकिस्तान के साथ संबन्धों में उसकी रूचि नही रही। अतः 2010 के दशक में पाकिस्तान ने भारत विरोधी चीन के साथ अपने सामरिक संबन्धों का विकास किया। वैसे 1962 के चीन युद्ध के बाद से ही पाकिस्तान चीन को भारत को सनतुलित करने वाली शक्ति के रूप में देखता रहा है। वर्तमान में चीन और पाकिस्तान की सामरिक साझेदारी भारत विरोध की नीव पर आधारित है। चीन पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के अन्तर्गत निवेश कर रहा है तथा उसने हिन्द महासागर में पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह तक अपनी पहुंच बना ली है। कई विद्वान मानते है कि पाकिस्तान का दक्षिण एशिया में भू-सामरिक महत्व है लेकिन गौर से देखने पर स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान ने अपने भारत विरोध को अपने सामरिक महत्व के रूप में उपयोग करने की कोशिश की है।
निष्कर्ष
वर्तमान में पाकिस्तान के राजनीतिक व आर्थिक चुनौतियां गंभीर रूप धारण कर रही है। यह पहली बार है कि इन दोनो ही मोर्चों पर पाकिस्तान एक साथ चुनौतियों का सामना कर रहा है। पाकिस्तान की चुनौतियों की सूची अनगिनत है- अत्यधिक ऋणग्रस्तता व मंहगाई, आर्थिक विकास में बाधा, लोकतंत्र की कमजोरी तथा राजनीतिक हिंसा में वृद्धि, अल्गाववाद व आतंकवाद की बढ़ोत्तरी, मानवाधिकारों का उल्लंघन आदि । पाकिस्तान की ऐसी स्थिति एक दिन में नही हुई बल्कि लम्बे समय तक भारत-केन्द्रित अव्यवहारिक नीतियों का परिणाम है। अपने जन्म से ही पाकिस्तान ने अपनी पहचान भारत विरोध व इस्लाम के आधार पर विकसित की है। आज यही पहचान सर्वस्वीकृत होने के साथ-साथ पाकिस्तान की नियति बन गया है। भारत विरोधी पहचान पाकिस्तान के जेनेटिक कोड में ही निहित है। इससे जहां एक ओर सेना को राजनीतिक व सामाजिक जीवन में पैर पसारने का अवसर प्राप्त हो गया है वही ं दूसरी ओर लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़े कमजार हो गई है। पाकिस्तान ने आतंकवाद को भारत के विरूद्ध एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया है लेकिन वही ंआतंकवाद आज पाकिस्तान की एकता व अखण्डता के लिये एक चुनौती बना गया है। वास्तवकिता यह है कि पाकिस्तान तब तक अपनी चुनौतियों से निजात नही पा सकता जब तक वह भारत विरोधी पहचान को त्याग कर अपनी परिस्थितियों के आधार पर अपनी नीतियों का चयन नही करता। लेकिन इसके लिये वहां के सैनिक व राजनीतिक नेतृत्व में गंभीर आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता है।
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