भारत में नक्सलवाद की समाप्ति कैसे हुई ?


भारत सरकार के गृहमंत्री अमित शाह के दावे के अनुसार भारत में मार्च 2026 में नक्सलवाद का सफाया हो चुका है। 1960 के दशक से ही नक्सलवाद भारत में आन्तरिक सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है। वर्ष 2015 के बाद वर्तमान सरकार ने नक्सलवादियों के विरूद्ध दोहरी रणनीति अपनाई, जिसके अन्तर्गत निरन्तर पुलिस आपरेशन के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास पर भी घ्यान केन्द्रित किया गया जिससे नक्सलवादी क्षेत्रीय जनता की गरीबी का फायदा उठाकर नई भर्ती न कर सके। सरकार की रणनीति का परिणाम यह हुआ है कि मार्च 2025 तक नकसलवाद के अन्तिम गढ़ छत्तीसगढ़ से भी नक्सलवाद का सफाया हो चुका है।
इस पृष्ठभूमि में यह लेख भारत में नक्सलवाद के विकास तथा उसके विरूद्ध सरकार की रणनीति के विश्लेषण पर आधारित है।
भारत में नक्सलवाद की पृष्ठभूमि
भारत में नक्सलवादी आन्दोलन की जड़े भारत के साम्यवादी आन्दोलन में निहित है। वास्तव में नक्सलवाद भारत में साम्यवादी आन्दोलन की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। भारत में साम्यवादी पार्टी की स्थापना 1925 मंे कानपुर में हुई थी। इस पार्टी की विचारधारा 1917 की रूसी क्रांति तथा लेनिन व माक्र्स के विचारों से प्रभावित थी। इस विचारधारा के अनुसार साम्यवाद की स्थापना क्रांति के द्वारा की जानी है। इस क्रांति का आयोजन मजदूरों, किसानों और अन्य सर्वाहारा वर्ग के सदस्यों द्वारा किया जायेगा। क्रांति में हिंसा का प्रयोग अनुमन्य है।
आजादी के बाद भारतीय साम्यवादी पार्टी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि अपनी उक्त विचारधारा के रहते हुए वह संसदीय प्रजातंत्र में किस तरीके से भाग ले क्योंकि संसदीय प्रजातंत्र और भारत का नया संविधान दोनो ही परिवर्तन के शांतिपूर्ण साधनों का समर्थन करते है। इसमें क्रांति और हिंसा के लिए गुजांइश नही है। इस समय साम्यवादी पार्टी में आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना आन्दोलन (1946-51) तथा 1949 की चीनी क्रांति के उदाहरण उपस्थित थे। तेलंगाना अन्दोलन एक कृषक आन्दोलन था जो साम्सवादी पार्टी के नेतृत्व में चलाया गया था तथा चीनी क्रांति की मान्यताओं पर आधारित था। इस आन्दोलन के अनुभव से साम्यवादी पार्टी में तीन तरह के दृष्टिकोण विकसित हुए- इसमें प्रथम दृष्टिकोण साम्यवादी नेता रणदिवे तथा उसके समर्थकों का था, जिन्होंने चीनी क्रांति के महत्व को अस्वीकार करते हुए भारत में शहरों में आधारित मजदूर वर्ग द्वारा लोकतांत्रिक और समाजवादी क्रांति का समर्थन किया। दूसरा समूह अजय घोष व डांगे के नेतृत्व मंे था, जिसने यह दृष्टिकोण अपनाया कि साम्यवादी पार्टी के लिए संसदीय प्रजांतत्र का मार्ग ही उचित है। इसके विपरीत आन्ध्र प्रदेश के साम्यवादियों का एक उग्र दृष्टिकोण यह था कि माओं के सिद्धान्तों के आधार पर भारत मंे भी चीन जैसी क्रांति का प्रयास किया जाये।
अतः साम्यवादी पार्टी में चीन के नेताओं का प्रभाव स्पष्ट था। लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के परिणामस्वरूप साम्यवादी दल के अंदर चीन की भूमिका को लेकर फूट पड़ गयी, जिसका परिणाम 1964 में साम्यवादी पार्टी के विभाजन के रूप में सामने आया। विभजान के परिणामस्वरूप भारतीय साम्यवादी दल ने गैर-पूंजीवादी विकास का शांतिवादी मार्ग का समर्थन किया, जबकि विभाजन के परिणामस्वरूप आये माक्र्सवादी साम्यवादी दल ने तीव्र सुधारों का समर्थन करते हुए संसदीय लोकतंत्र में भाग लेने पर सहमति दिखाई।
नक्सलवाद का प्रथम चरण 1967-1980 -साम्यवादी आन्दोलन में चल रही इस वैचारिक उथल-पुथल के परिवेश में भारत में नक्सलवादी आन्दोलन का जन्म हुआ। नक्सलवादी आन्दोलन वास्तव में ऐसे तत्वों द्वारा शुरू किया गया है, जिन्होंने उक्त दोनो साम्यवादी पार्टियों की संसदीय लोकतंत्र में भाग लेने की नीति का समर्थन नही किया। उन्होंने ऐसी नीति को समझौतावादी नीति कहा तथा वे माओं की क्रांतिकारी परिवर्तन की नीति मंे अडिग बने रहे। इस पृष्ठभूमि में माक्रसवादी साम्यवादी पार्टी के नेता चारू मजूमदार के नेतृत्व में 1967 मंे नक्सलवादी आन्दोलन की शुरूआत हुई। 2 मार्च 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले की सिलीगुणी तहसील के नक्सलबारी नामक गांव में एक विमल नामक जनजातीय किसान की भूमि पर वहां के जमींदारों ने कब्जा कर लिया। इस कब्जे के विरोध में उस पूरे क्षेत्र में जमींदारों के विरूद्ध चारू मजूमदार के नेतृत्व में किसानों का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में 15 जनजातीय किसानों की जाने चली गयी तथा आन्दोलनकारियों के हिंसा के परिणामस्वरूप कई पुलिस वाले घायल हुये तथा एक सब-इंस्पेक्टर की मृत्यु हो गयी। बाद में यह आन्दोलन सशस्त्र कार्यकताओं द्वारा चलाया गया, जिनकी मुख्य मांग जमींदारो से जमीन छीनकर भूमिहीनों में बांटना था। नक्सलबारी गांव से शुरू हुए इस आन्दोलन को इसी गांव के नाम पर नक्सलवादी आन्दोलन कहा गया।
इस हिंसक किसान आन्दोलन को बिहार, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में माक्रसवादी साम्यवादी पार्टी के उग्रवादी तत्वों का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। यद्यपि पश्चिम बंगाल की सरकार ने 3-4 दिनों मंें ही इस आन्दोलन पर नियन्त्रण स्थापित कर लिया था, लेकिन इसके परिणामस्वरूप इस तरह के सभी उग्रवादी तत्वों ने मिलकर मई 1968 में आल इण्डिया को-आरडिनेशन कमेटी आॅफ कम्यूनिस्ट रिवोल्यूशनरीस् नामक राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की। इस संगठन ने नक्सलवाद के दो प्रमुख सिद्धान्तों पर सहमति व्यक्त की-
भारत सरकार के गृहमंत्री अमित शाह के दावे के अनुसार भारत में मार्च 2026 में नकसलवाद का सफाया हो चुका है। 1960 के दशक से ही नक्सलवाद भारत में आन्तरिक सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है। वर्ष 2015 के बाद वर्तमान सरकार ने नक्सलवादियों के विरूद्ध दोहरी रणनीति अपनाई, जिसके अन्तर्गत निरन्तर पुलिस आपरेशन के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास पर भी घ्यान केन्द्रित किया गया जिससे नक्सलवादी क्षेत्रीय जनता की गरीबी का फायदा उठाकर नई भर्ती न कर सके। सरकार की रणनीति का परिणाम यह हुआ है कि मार्च 2025 तक नकसलवाद के अन्तिम गढ़ छत्तीसगढ़ से भी नक्सलवाद का सफाया हो चुका है।
इस पृष्ठभूमि में यह लेख भारत में नक्सलवाद के विकास तथा उसके विरूद्ध सरकार की रणनीति के विश्लेषण पर आधारित है।
भारत में नक्सलवाद की पृष्ठभूमि
भारत में नक्सलवादी आन्दोलन की जड़े भारत के साम्यवादी आन्दोलन में निहित है। वास्तव में नक्सलवाद भारत में साम्यवादी आन्दोलन की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। भारत में साम्यवादी पार्टी की स्थापना 1925 मंे कानपुर में हुई थी। इस पार्टी की विचारधारा 1917 की रूसी क्रांति तथा लेनिन व माक्र्स के विचारों से प्रभावित थी। इस विचारधारा के अनुसार साम्यवाद की स्थापना क्रांति के द्वारा की जानी है। इस क्रांति का आयोजन मजदूरों, किसानों और अन्य सर्वाहारा वर्ग के सदस्यों द्वारा किया जायेगा। क्रांति में हिंसा का प्रयोग अनुमन्य है।
आजादी के बाद भारतीय साम्यवादी पार्टी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि अपनी उक्त विचारधारा के रहते हुए वह संसदीय प्रजातंत्र में किस तरीके से भाग ले क्योंकि संसदीय प्रजातंत्र और भारत का नया संविधान दोनो ही परिवर्तन के शांतिपूर्ण साधनों का समर्थन करते है। इसमें क्रांति और हिंसा के लिए गुजांइश नही है। इस समय साम्यवादी पार्टी में आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना आन्दोलन (1946-51) तथा 1949 की चीनी क्रांति के उदाहरण उपस्थित थे। तेलंगाना अन्दोलन एक कृषक आन्दोलन था जो साम्सवादी पार्टी के नेतृत्व में चलाया गया था तथा चीनी क्रांति की मान्यताओं पर आधारित था। इस आन्दोलन के अनुभव से साम्यवादी पार्टी में तीन तरह के दृष्टिकोण विकसित हुए- इसमें प्रथम दृष्टिकोण साम्यवादी नेता रणदिवे तथा उसके समर्थकों का था, जिन्होंने चीनी क्रांति के महत्व को अस्वीकार करते हुए भारत में शहरों में आधारित मजदूर वर्ग द्वारा लोकतांत्रिक और समाजवादी क्रांति का समर्थन किया। दूसरा समूह अजय घोष व डांगे के नेतृत्व में था, जिसने यह दृष्टिकोण अपनाया कि साम्यवादी पार्टी के लिए संसदीय प्रजांतत्र का मार्ग ही उचित है। इसके विपरीत आन्ध्र प्रदेश के साम्यवादियों का एक उग्र दृष्टिकोण यह था कि माओं के सिद्धान्तों के आधार पर भारत मंे भी चीन जैसी क्रांति का प्रयास किया जाये।
अतः साम्यवादी पार्टी में चीन के नेताओं का प्रभाव स्पष्ट था। लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के परिणामस्वरूप साम्यवादी दल के अंदर चीन की भूमिका को लेकर फूट पड़ गयी, जिसका परिणाम 1964 में साम्यवादी पार्टी के विभाजन के रूप में सामने आया। विभजान के परिणामस्वरूप भारतीय साम्यवादी दल ने गैर-पूंजीवादी विकास का शांतिवादी मार्ग का समर्थन किया, जबकि विभाजन के परिणामस्वरूप आये माक्र्सवादी साम्यवादी दल ने तीव्र सुधारों का समर्थन करते हुए संसदीय लोकतंत्र में भाग लेने पर सहमति दिखाई।
नक्सलवाद का प्रथम चरण 1967-1980 -साम्यवादी आन्दोलन में चल रही इस वैचारिक उथल-पुथल के परिवेश में भारत में नक्सलवादी आन्दोलन का जन्म हुआ। नक्सलवादी आन्दोलन वास्तव में ऐसे तत्वों द्वारा शुरू किया गया है, जिन्होंने उक्त दोनो साम्यवादी पार्टियों की संसदीय लोकतंत्र में भाग लेने की नीति का समर्थन नही किया। उन्होंने ऐसी नीति को समझौतावादी नीति कहा तथा वे माओं की क्रांतिकारी परिवर्तन की नीति मंे अडिग बने रहे। इस पृष्ठभूमि में माक्रसवादी साम्यवादी पार्टी के नेता चारू मजूमदार के नेतृत्व में 1967 में नक्सलवादी आन्दोलन की शुरूआत हुई। 2 मार्च 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जलिंग जिले की सिलीगुणी तहसील के नक्सलबारी नामक गांव में एक विमल नामक जनजातीय किसान की भूमि पर वहां के जमींदारों ने कब्जा कर लिया। इस कब्जे के विरोध में उस पूरे क्षेत्र में जमींदारों के विरूद्ध चारू मजूमदार के नेतृत्व में किसानों का आन्दोलन चलाया गया। इस आन्दोलन में 15 जनजातीय किसानों की जाने चली गयी तथा आन्दोलनकारियों के हिंसा के परिणामस्वरूप कई पुलिस वाले घायल हुये तथा एक सब-इंस्पेक्टर की मृत्यु हो गयी। बाद में यह आन्दोलन सशस्त्र कार्यकताओं द्वारा चलाया गया, जिनकी मुख्य मांग जमींदारो से जमीन छीनकर भूमिहीनों में बांटना था। नक्सलबारी गांव से शुरू हुए इस आन्दोलन को इसी गांव के नाम पर नक्सलवादी आन्दोलन कहा गया।
इस हिंसक किसान आन्दोलन को बिहार, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल में माक्रसवादी साम्यवादी पार्टी के उग्रवादी तत्वों का प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ। यद्यपि पश्चिम बंगाल की सरकार ने 3-4 दिनों में ही इस आन्दोलन पर नियन्त्रण स्थापित कर लिया था, लेकिन इसके परिणामस्वरूप इस तरह के सभी उग्रवादी तत्वों ने मिलकर मई 1968 में आल इण्डिया को-आरडिनेशन कमेटी आफ कम्यूनिस्ट रिवोल्यूशनरीस् नामक राष्ट्रीय संगठन की स्थापना की। इस संगठन ने नक्सलवाद के दो प्रमुख सिद्धान्तों पर सहमति व्यक्त की-

  1. नक्सलवादियों का सशस्त्र विद्रोह में विश्वास।
  2. नक्सलवादियों का संसदीय लोकतंत्र के अंतर्गत चुनाव में भाग नही लेना।
    इस बात को लेकर नक्सलवादियों में सहमति थी कि सशस्त्र विद्रोह को किस रूप मंे आगे बढ़ाया जाये। चारू मजूमदार और उसके समर्थकों का मत था कि पूंजीपति वर्ग को शत्रु मानते हुए प्राथमिकता के आधार पर उसका अंत किया जाये। जबकि अन्य प्रमुख नक्सलवादी नेता कन्हाई चटर्जी तथा टी नेगीरेड्डी ने यह मत व्यक्त किया कि पूंजीपतियों का अंत करने के पहले नक्सलवादी को एक जनआन्देालन के रूप में स्थापित करना पड़ेगा। लेकिन नक्सलवादियों का बहुमत चारू मजूमदार के पक्ष में था, अतः उसी दृष्टिकोण को अपनाया गया। मई 1969 में सभी नक्सलवादियों ने अपना पहला राजनीतिक संगठन भारतीय साम्यवादी पार्टी (माक्रसवादी-लेनिनवादी) की स्थापना की तथा चारू मजूमदार को उसका महासचिव बनाया गया।
    1960 के दशक में चारू मजूमदार तथा उनके सहयोगी कानू सान्याल तथा जघन संथाल नक्सलवादी आन्दोलन के प्रमुख नेता थें। उन्होंने माओंवादी क्रांति का सपना दिखाकर नक्सलवादी आन्दोलन को देश के विभिन्न भागों में फैलाने का कार्य किया, लेकिन उन्हें इस कार्य में अधिक सफलता नही मिली तथा उनके अनेक कार्यकर्ता पुलिस के हाथों मारे गय अथवा जेल में डाल दिये गये। अतः 1969 में नक्सलवादी आन्दोलन में फूट पड़ गयी। चारू मजूमदार की पार्टी से अलग हुए कन्हाई चटर्जी व नेगीरेड्डी ने 20 अक्टूबर 1969 को माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर (डब्ब्) की स्थापना की, जिसका मुख्य कार्यक्षेत्र दक्षिण भारत था। 1972 में चारू मजूमदार की मृत्यु हो गयी तथा 1977 में कानू सान्याल ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़कर संसदीय प्रजातंत्र में विश्वास व्यक्त किया।
    भारतीय साम्यवादी पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) के एक समूह ने सुब्रत दत्ता, नागभूषण पटनायक तथा विनोद मिश्रा के नेतृत्व में 1974 में एक नई पार्टी की स्थापना की जिसका नाम भारतीय साम्यवादी पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन था। इन नेताओं ने वैचारिक गलतियों को सुधारने का लक्ष्य रखा। इस वैचारिक सुधार में अब मुख्य बल इस बात पर था कि सशस्त्र विद्रोह सीमित मात्रा में किया जाये जबकि मुख्य ध्यान कृषकों के जनआन्दोलन में केन्द्रित किया जाये। अन्ततः नक्सलवादियों के इस समूह ने भी संसदीय प्रजातंत्र को स्वीकार कर लिया। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप इस पार्टी का एक समूह एन प्रसादके नेतृत्व में अलग हो गया तथा उसने 1980 में भारतीय साम्यवादी पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) यूनिटी नामक पार्टी की स्थापना की।
    नक्सलवाद का दूसरा चरण 1980 से 2004 तक- 1980 में ही आन्ध्र प्रदेश में कोण्डा पल्ली सीतारमैया ने आन्ध्र प्रदेश में पीपुल्स वार ग्रुप नामक नक्सलवादी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य संसदीय लोकतंत्र से दूर रहते हुए नक्सलवादी जनआन्दोलन को खड़ा करना है। इस संगठन की स्थापना को भारत मंे नक्सलवादी आन्दोलन का दूसरा चरण माना जाता है। दूसरे चरण में नक्सलवादियों की गतिविधियों में पुनः एक बार एकता व जोश का प्रभाव दिखाई देता है। इस चरण में पीपुल्स वार गु्रप तथा एम. सी सी. ही ऐसे दो समूह थे जिन्होंने संसदीय प्रजातंत्र का अस्वीकार करते हुए नक्सवादी आन्दोलन को व्यवस्थिति तरीके से चलाया तथा इस आन्दोलन का देश के विभिन्न क्षेत्रों में संगठित रूप में विस्तार किया। ये दोनो समूह 2004 में एक साथ आ गये तथा दोनो ने मिलकर भारतीय साम्यवादी पार्टी (माओवादी) नामक नक्सलवादी दल की स्थापना की। यह पार्टी वर्तमान में भारत के सभी नक्सलवादियों का छतरी दल है तथा उनमें एकता स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुआ है। वर्तमान में सारे देश में नक्सलवादी आन्दोलन का संचालन इसी दल की राजनीतिक देखरेख में चल रहा है।
    तृतीय चरण, 2004 के बाद वर्तमान स्थिति- इस चरण की मुख्य विशेषता विभिन्न नक्सलवादी समूहों में स्थापित की गयी एकता है। गत वर्षों में नक्सलवाद में निम्न प्रवृत्तियां देखने में आयी है- प्रथम, इसने अपनी हिंसात्मक गतिविधियों को तेज किया है तथा इसके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम दिया गया है। 2009 में नक्सलवादियों ने पंश्चिम बंगाल के लालगढ़ क्षेत्र में अपना कब्जा कर लिया था तथा सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत की थी। अप्रैल 2010 में नक्सलवादियों ने अब तक सबसे बड़ी हिंसक घटना को तब अंजाम दिया था, जब उन्होंने छत्तीसगढ़ के दातेवाला जिले में 76 सशस्त्र सैनिकों की हत्या कर दी थी। इस घटना के तुरन्त बाद उन्होंने इसी जिले में 35 अन्य लोगों को मार दिया था। दूसरा, नक्सलवाद ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस आन्देालन को फैलाने का प्रयास किया है। वर्तमान में नक्सलवाद पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, आन्ध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में मुख्य रूप से सक्रिय है। नक्सलवाद ने उत्तर प्रदेश के दक्षिणी व तराई इलाकों में भी अपनी जड़े फैलाना शुरू कर दिया है। तराई क्षेत्र में उनका विस्तार राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त गंभीर है। तीसरा, नक्सलवादियों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने सम्पर्कों के विकास को प्रयास किया है। इस बात के प्रमाण मिले है कि भारत के नक्सलवादियों ने नेपाल के माओवादी तत्वाें के साथ सम्पक्र व सहयोग स्थापित किया है। ऐसा किया जाना सम्भव है क्योंकि दोनो ही समूह माओवादी विचारधारा के समर्थक है। चौथा, नक्सलवादी समूहों को अधिकांश घटनाओं में इसलिए सफलता प्राप्त हुई है क्योंकि उन्होंने वर्तमान समय में लडाई की गुरिल्ला पद्धति का अधिकतम प्रयोग किया है। पांचवां, वर्तमान समय में नक्सलवादी समूहों की गरीबाें की समर्थक नीतियों के कारण भारत के शहरी बौद्धिक वर्गों के मध्य उन्हें कतिपय सहानुभूति भी मिल रही है। इन्हे सरकार ने शहरी नक्सलवाद की संज्ञा दी है।
    नक्सलवाद की विचारधारा
    नक्सलवाद की विचारधारा व राणनीति के सम्बन्ध में मुख्य बिन्दु महत्वपूर्ण है- 1. भारत का नक्सलवादी आन्दोलन अपने मौलिक रूप में कार्ल मार्क्स और लेनिन की विचारधाराओं से प्रभावित था। फिर भी इसके विभिन्न समूहों में रणनीति को लेकर मतभेद रहे है। लेकिन अपने वर्तमान चरण में वह चीन की माओवादी क्रांति तथा माओवाद के विचारों से प्रभावित है। इस विचारधारा में हिंसक जनआन्दोलन के द्वारा ही साम्यवाद की स्थापना की जा सकती है। नक्सलवादी भी भारत में इसी तरह की क्रांति का आयोजन कर एक साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना करना चाहते है। उनका घोषित लक्ष्य भारत में शोषितों, गरीबों व किसानों के हित में नई व्यवस्था की स्थापना करना है। 2.नक्सलवादी संसदीय लोकतंत्र, चुनावों तथा परिवर्तन के शांतिपूर्ण साधनों में विश्वास नही करते। वे हिंसा के द्वारा अपनी लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते है।
    3. नक्सलवादी अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सबसे पहले गरीब व अविकसित क्षेत्रों में जनता की सहानुभूमि प्राप्त कर वहां अपने आन्दोलन का विस्तार करते है। उसके बाद वे शहरी क्षेत्रांे मंे अपने आधार को मजबूत करने की इच्छा रखते है। अन्ततः उनका लक्ष्य केन्द्र की राज्य सत्ता को प्राप्त करना है। सरकार की सुरक्षा नीति को भेदने के लिए वे छापामार युद्ध की रणनीति अपनाते है।4.वर्तमान समय में नक्सलवादियों ने माओवादी विचारधारा के आधार पर विभिन्न समूहों में एकता स्थापित करने का प्रयास किया है तथा 2004 में नक्सलवादी समूहों के छतरी संगठन के रूप में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) की स्थापना की गयी।
    वर्ष 2011 में प्रस्तुत किये गये केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आंकलन के अनुसार नक्सलवाद इस समय देश के 20 राज्यों के 220 जिलों में फैला हुआ था। नक्सलवादी हिंसा से प्रभावित प्रमुख क्षेत्र थे- उड़ीसा, पंश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पूर्व इलाके। नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र को लाल गलियारा कहा जाता है, जिसका क्षेत्रफल 92,000 वर्ग किलोमीटर है। यह एरिया आन्ध्र प्रदेश से नेपाल की सीमा तक फैला हुआ है। गृह मंत्रालय के आंकलन के अनुसार नक्सलवादी आन्दोलन में सक्रिय सदस्यों की संख्या 50,000 थी जिनमें से 20,000 सक्रिय सशस्त्र सदस्य थेे।

भारत सरकार की नक्सल विरोधी रणनीति
केन्द्र सरकार ने नक्सलवाद को आन्तरिक सुरक्षा की एक प्रमुख चुनौती माना है। 2000 के दशक में इसका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया था। तभी से सरकार ने नक्सलवाद के विरूद्ध व्यवस्थित रणनीति अपनाई है। नक्सलवाद से निबटने के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयासों की का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

  1. स्थानीय पुलिस सलवा जुदूम की स्थापना- छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए सलवा जुदूम नामक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसके अंतर्गत ग्रामीण निवासियों को आत्मरक्षा के लिए सरकार द्वारा हथियार दिये जाते थे तथा ग्रामीण जनता एक समूह के रूप में नक्सलवादियों का सामना करती थी। सलवा जुदूम समूहों को प्रदेश सरकार का समर्थन प्राप्त था, लेकिन अनेक मानव अधिकार समूहों ने आम नागरिकों को इस तरह से सुरक्षा में संलग्न किये जाने का विरोध किया था। न्यायालय ने कानूनी दृष्टि से भी कानून व्यवस्था में नागरिकों की सशस्त्र उपस्थित को अवैध माना है, अतः अन्ततः इस कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया था।
  2. केन्द्र सरकार की 14 सूत्रीय नीति, 2006- भारत सरकार ने नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए 13 मार्च 2006 को लोकसभा में एक 14 सूत्रीय नीति की घोषणा की है। इस नीति में नक्सलवाद के विरूद्ध पुलिस कार्यवाही करने के साथ-साथ इस क्षेत्र के विकास तथा जन सहयेाग प्राप्त करने पर बल दिया गया था।
  3. गृहमंत्रालय में बामपंथी अतिवाद नामक नये डिवीजन की स्थापना, जिससे उच्च स्तर पर नक्सल रोधी नीति में निरन्तर समन्वय स्थापित किया जा सके।
  4. आपरेशन ग्रीन हन्ट- इस समस्या से निपटने के लिए केन्द्र सरकार ने 2009 में आपरेशन ग्रीन हन्ट चलाया है, जिसके अंतर्गत देश के विभिन्न क्षेत्रों में 50,000 सशस्त्र बलों की तैनाती की गयी है।
  5. नक्सलवाद नयी रणनीति 2010-वर्तमान में केन्द्र सरकार ने भारत में नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए 2010 में एक बृहद रणनीति को लागू किया है। इस रणनीति में हथियार डालने वाले नक्सलवादियों के पुनर्वास की व्यवस्था, व्यापक स्तर पर सशस्त्र बलों की तैनाती की जायेगी, अभिसूचना तन्त्र को मजबूत करना, तथा नक्सलवादी क्षेत्रों में आर्थिक विकास की प्रक्रिया को तेज करनेपर बल दिया गया था।
  6. वर्तमान रणनीति 2015 से अब तक- वर्तमान रणनीति में व्यापक सुरक्षा बलों गहन अभियान तथा उसकी उच्च स्तर पर निगरानी, स्पेशल सैन्य अभियान, हथियार डालने वाले नक्सलवादियों के पुनर्वास की व्यवस्था तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्र का तीव्र विकास शामिल है। नई नीति के ही अन्तर्गत अप्रिल-मई 2025 में 21 दिन का आपरेशन ब्लैक फारेस्ट चलाया गया था जिसमें प्रमुख नक्सलवादी नेता नम्बाला केशव राव सहित कुल 57 नक्सलवादी मारे गये थे।
    सरकारी की नई रणनीति की सफलता का परिणम यह रहा कि 2026 के आरभ में नक्सलवचाद को लाल गलियारा देश के 220 जिलों से सिमट कर छत्तीसगढ़ के तीन जिलो- बीजापुर, सुकमा तथा नारायणपुर तक सीमित रह गया। वर्ष 2015 से 2025 की अवधि में 1800 नक्सलवादी मारे गये है तथा लगभग 10000 नक्सलवादिये ने सरेन्डर कर दिया है जिन्हें सरकार द्वारा पुनस्र्थापित किया गया है। मार्च 2026 में सरकार ने भारत में नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा कर दी।

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