क्या भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बन सकता है ?

भारत ने जुलाई 2026 मे नौवीं बार वर्ष 2028-29 में सुरक्षा परिषद की अस्थाई सदस्यता के लिये अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। ये चुनाव जून 2027 में संपन्न होंगे। भारत अस्थाई सदस्यता के लिये तो आसानी से सफल हो जायेगा। लेकिन भारत की सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता की राह कठिन है। भारत का सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का दावा अभी भी चार दशकों से लम्बित है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी सितम्बर, 2026 में यू0 एन0 महासभा को संबोधित करेंगे, जिसमें सुरक्षा परिषद में सुधार तथा भारत की स्थाई सदस्यता का मुद्दा जोर- शोर से उठाया जायेगा।

इस लेख में भारत की स्थाई सदस्यता के दावे तथा उसकी संभावना के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया है।

      द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र का गठन इस विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिये किया गया था। अतः इसका प्रमुख उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की स्थापना करना है। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में सदस्य देशों के मध्य आर्थिक व सामाजिक सहयोग को बढ़ाना, मानवाधिकारों की रक्षा, निःशस्त्रीकरण के प्रयास, नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के प्रयास आदि सभी का अन्तिम उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की स्थापना ही है। संक्षेप में संयुक्त राष्ट्र संघ के दायरे में वे सभी कार्य आते हैं जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबन्ध अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा से है।   

सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्कता क्यों है

प्रथम, अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की अन्तिम व तात्कालिक जिम्मदारी संयुक्त राष्ट्र के कार्यकारी अंग सुरक्षा परिषद को सौंपी गयी है। सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढ़ाचा 1945 में तय किया गया था। इसमें पांच स्थाई तथा दस अस्थाई सदस्य होते हैं। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दोवर्ष के लिये होता है तथा इनका निर्वाचन संयुक्त राष्ट्र की संसद यानी महासभा द्वारा किया जाता है। इसके स्थाई सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, तथा चीन। स्थाई सदस्यों को वीटो की शक्ति प्राप्त है। अर्थात यदि किसी प्रस्ताव पर एक भी स्थाई सहमत नही है तो सुरक्षा परिषद उस प्रस्ताव को पारित नही कर सकती है। इन पांच देशों को स्थाई सदस्यता 1945 में इस आधार पर दी गयी थी कि ये पाचों देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़ी शक्तियां थे तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान करने के लिये इन पांचो देशों का सहयोग आवश्यक माना गया था। यही व्यवस्था गत आठ दशकों से चली आरही है।

लेकिन तब से लेकर आज तक विश्व की सामरिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। इसका तात्पर्य यह है कि आज विश्व में नई शक्तियां अस्तित्व में आ गयी है। उनकी भागीदारी के बिना सुरक्षा परिषद को प्रभावी नही बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिये जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन वह सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं है जबकि ब्रिटेन तथा फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हैं। भारतीय अर्थव्यस्था भी ब्रिटेन व फ्रांस से बड़ी है लेकिन भारत भी सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य नही है। निष्कर्षतः सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढ़ाचा वर्तमान वैश्विक शक्ति वितरण के अनुरूप नही है।

दूसरा, गत आठ दशकों में अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की चुनौतियों व खतरों में परिवर्तन हुआ है। आज विश्व जलवायु परिवर्तनए मानवाधिकार उल्लंधन, आतंकवाद, गृह युद्ध जैसेी चुनौतियों का सामना कर रहा है। सुरक्षा परिषद 21वीं शताब्दी की इन चुनौतियों का सामने करने में प्रभावी सिद्ध नहीं हो पा रही है।

भारत की दावेदारी के आधार

भारत ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिये निम्नलिखित आधारों पर अपना दावा प्रस्तुत किया हैः-

      1. जब 1945 में 80  वर्ष पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी, तब विश्व के पांच बडे़ व शक्तिशाली राष्ट्रों को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता प्रदान की गयी थी। तब से लेकर अब तक राष्ट्रों की शक्ति तथा क्षमताओं की स्थिति में व्यापक परिवर्तन हो चुके है, लेकिन सुरक्षा परिषद के वर्तमान ढ़ाचे में ये परिवर्तन दिखाई नही दे रहे हैं। अतः सुरक्षा परिषद वर्तमान विश्व की वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व नही करती है। भारत अपने आर्थिक व तकनीकि विकास के कारण विश्व की 8वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यदि क्रय शक्ति समतुल्यता की दृष्टि से भारत के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का आंकलन किया जाये तो अमेरिका, चीन तथा जापान के बाद भारत विश्व की चैथीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यह कहांतक उचित है कि जहां ब्रिटेन और फ्रांस जैसे छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हो तथा भारत, इसकी स्थाई सदस्यता से वंचित है। अतः सुरक्षा परिषद को प्रभावी बनाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में उसमें सुधार किया जाना आवश्यक है।

      2. भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तथा जनसंख्या की दृष्टि से अब भारत विश्व का सबसे बड़ा देश है। आजादी के बाद से लेकर अब तक भारत ने लोकतांत्रिक तरीके से 18 बार शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता परिवर्तन किया जाचुका है। भारत लोकतंात्रिक मूल्यों जैसे मानव अधिकार, विधि का शासन, समानता आदि में विश्वास करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर हुई है। भारत के सार्वभौमिक मूल्यों की स्वीकार्यता का ही प्रमाण है कि 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महात्मा गांधी के जन्म दिन 2 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया है। 2014 में महासभा ने अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव भी पारित किया है। भारत की राजनीतिक स्थिरता व विकास तथा उसके जीवन मूल्य विश्व शांति व सुरक्षा के लिये अत्यंत आवश्यक है।

      3. भारत ने गत 80 वर्षों में अपनी विदेश नीति के द्वारा संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को आगे बढ़ाने तथा उसके उद्दश्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत ने अपने देश के संविधान में संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों में आस्था व्यक्त की है। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं में भारत का योगदान उल्लेखनीय है। भारत 2025 तक संयुक्त राष्ट्र के  शांति मिशनों में लगभग 290000 सैनिकों का योगदान कर चुका है तथा इस दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश है। वर्तमान में भी नौ शंाति मिशनों में भारत के 6000 हजार सैनिक कार्यरत है। इसके अतिरिक्त भारत ने 82 देशों के 800 से अधिक शांति सैनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान किया है। भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का संस्थापक देश है। भारत अब तक आठ बार – 1950-51, 1955-56, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12, तथा 21-22 सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य चुना जा चुका है। अस्थाई सदस्य के रूप में भारत ने सुरक्षा परिषद में महतवपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।

        इतना ही नही भारत विवादों के शंतिपूर्ण समाधान के सिद्धान्त में विश्वास करता है ऐसे विवादों केसमाधान के लिये निरन्तर प्रयासरत रहा है। उदाहरण के लिये भारत ने कोरिया युद्ध तथा हिन्द चीन समस्या में मध्यस्थता करके शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत ने उपनिवेशवाद तथा रंगभेद नीति का निरन्तर विरोध किया है तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के माध्यम से गरीब देश की समस्याओं को उठाया है। इसी तरह वर्तमान में निःशस्त्रीकरण, मानव अधिकारों की रक्षा, संयुक्त राष्ट्र सुधार, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद आदि के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गये प्रयासों में भारत सक्रिय भागीदारी निभा रहा है।

      4. गत 25 वर्षों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक व तकनीकि प्रगति दर्ज की है तथा घरेलू आर्थिक सुधारों के माध्यम से वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था से जुड़ने का प्रयास किया है। आज भारत की गणना विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में की जा रही है। भारत जी-20, ब्रिक्स, इब्सा जैसे महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का सदस्य है तथा वर्तमान में विश्व के राजनीति और आर्थिक मामलों के प्रबन्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत अभी भी विकासशील देशों को सशक्त प्रतिनिधि है तथा अल्पविकसित देशों के विकास के लिए महत्वपूर्ण साझेदारी निभा रहा है। भारत की इस बढ़ती हुई वैश्विक भूमिका के लिए आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसे उचित स्थान प्राप्त हो।

           चीन को छोड़कर शेष चार- ब्रिटेन, अमेरिका, रूस तथा फ्रांस ने खुलकर भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन किया है। पाकिस्तान तो भारत की सदस्यता का खुलकर विरोध कर रहा है तथा चीन व पाकिस्तान ’हर मौसम के दोस्त’ हैं। अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती सामरिक साझेदारी के आलोक में स्थाई सदस्यता के लिये चीन का समर्थ प्राप्त करना भारत के लिये कठिन है। वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 1955 में अमेरिका तथा सोवियत संघ द्वारा भारत को चीन के स्थान पर सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता देने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन भारत ने सैद्धान्तिक पक्ष अपनाते हुए स्थाई सदस्यता लेने से मना कर दिया था, क्योंकि भारत उस समय साम्यवादी चीन को स्थाई सदस्य बनाने हेतु प्रयत्नरत् था। 1949 में राष्ट्रवादी चीन की पराजय के बाद यह पद एक तरह से खाली चल रहा था, क्योंकि पश्चिमी देश साम्यवादी चीन को स्थाई सदस्यता देने हेतु इच्छुक नही थे। इस घटना के आलोक में इस संबन्ध में चीन का भारत विरोधी दृष्टिकोण आश्चर्यजनक है।

सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रगति

सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यों के विस्तार का मामला सबसे पहले 1992 में संयुक्त राष्ट्र के विशेष शिखर सम्मेलन में उठाया गया था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इस सम्मेलन में भाग लेकर भारत की दावेदारी प्रस्तुत की थी। तभी से यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र की कार्य-सूची में शामिल है, लेकिन इसमें अभी तक कोई ठोस प्रगति नही हुई है। वर्तमान में भारत, जापान, जर्मनी तथा ब्राजील सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के प्रबल दावेदार है। इन देशों ने अपनी दावेदारी को प्रभावी ढ़ग से उठाने के लिये जी-4 नामक समूह का गठन भी कर लिया है। बाद में अफ्रीकी देशांे ने भी एक अफ्रीकी देश को स्थाई सदस्यता देने की मांग की है। अतः दक्षिण अफ्रीका भी एक दावेदार हो सकता है।

      इस मुद्दें पर विचार करने के लिए 1992 में संयुक्त राष्ट्र महासभा नेएक टास्क फोर्स की स्थापना की, जिसने 1996 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपार्ट में सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के विस्तार के मुद्दें पर राष्ट्र के मध्य आम सहमति विकसित करने का सुझाव दिया गया। पुनः 2005 में तत्कालीन महासचिव बुतरस बुतरस घाली ने  इन लार्जर फ्रीडम  नामक प्रस्ताव रखा, जिस पर संयुक्त राष्ट्र के 2005 के शिखर सम्मेलन में चर्चा हुई, लेकिन कोई आम सहमति नही बन सकी। इस प्रस्ताव के अनुसार सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या 15 से बढ़ाकर 24 किये जाने का प्रस्ताव था। एक अन्य विचार यह था कि सुरक्षा परिषद मे केवल अस्थाई सदस्यों की संख्या में विस्तार कर दिया जाये तथा स्थाई सदस्यता में परिवर्तन न किया जाये।

      सुरक्षा परिषद में सुधार का मामला एक राजनीतिक विवाद बन गया है। चार दावेदार देशों के विरोधी देशों ने भी काफी क्लब के नाम से अपने को संगठित कर लिया है। ये देश है- इटली, स्पेन, अर्जेन्टीना, कनाडा, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको तथा पाकिस्तान। उदाहरण के लिए इटनी तथा स्पेन जर्मनी की की स्थाई सदस्यता का विरोध कर रहे है, अर्जेन्टीना तथा मेक्सिको ब्राजील की सदस्यता का विरोध कर रहे है, दक्षिण कोरिया जापान की सदस्यता का विरोध कर रहा है तथा पाकिस्तान भारत की सदस्यता का विरोध कर रहा है। चीन भी जापान की सदस्यता का विरोध कर रहा है जब कि भारत के बारे में भी चीन का नजरिया नकारात्मक ही है। काफी क्लब के देशों को वर्तमान में यूनाइटेड फार कन्सेन्सस के नाम से जाना जाता है। ये सदस्य समय-समय पर सुरक्षा परिषद की स्थई सदस्यता में बदलाव का विरोध करते रहते है। दूसरी तरफ, सुरक्षा परिषद के वर्तमान स्थाई सदस्य आसानी से अपने विशेषाधिकार में दूसरों को साझेदार बनाने के लिये तैयार नही दिख रहे हैं। कानूनी स्थिति यह है कि सुरक्षा परिषद में सुधार का कोई भी मामला तब तक सफल नही हो सकता, जब तक इसके पांचों स्थाई सदस्य उससे सहमत न हो और इन पांचों सदस्यों की सहमति प्राप्त करना एक अत्यंत कठिन कार्य है।

      इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी जी-4 के देश विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मंचांे पर सुरक्षा परिषद में सुधार का मामला गत 35 वर्षों से लगातार उठा रहे है। इस मामलें को गुटनिरपेक्ष आन्दोलन, इब्सा, ब्रिक्स, दक्षेस आदि सभी में प्रभावी ढंग से उठाया जा चुका है। ये देश द्विपक्षीय आधार पर भी विभिन्न देशों से अपनी सदस्यता हेतु समर्थन प्राप्त करने का प्रयास कर रहे है। ये देश अपने लोकतंात्रिक मूल्यों तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा में अपने योगदान, वर्तमान सामरिक वास्तविकताओं तथा महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय दायित्वों को वहन करने की अपनी क्षमता के आधार पर सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की मांग को दोहराते रहते हैं। लेकिन विपरीत परिस्थितियों के कारण सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के विस्तार का मामला राजनीतिक गतिरोध का शिकार हो गया है।

सुरक्षा परिषद में सुधार की वर्तमान स्थिति

      वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना की  70वीं वर्षगांठ मनाई। इसी समय भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान 26 सितम्बर, 2015 को न्यूयार्क में जी-4 समूह के शासनसघ्यक्षों का शिखर सम्मेलन आहूत किया था।  इस शिखर सम्मेलन में सुरक्षा परिषद के सुधार में हो रही देरी पर चिन्ता व्यक्त की गयी।   लेकिन इस दौरान एक सकारात्मक पहल यह हुयी है कि महासभा द्वारा जुलाइर्, 2015 में सुरक्षा परिषद में सुधार हेतु एक लिखित मसौदे (टेक्सट-बेस्ड नेगासियेशन)के आधार पर विचार-विमर्श करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया है। अब महासभा में इस विषय पर लिखित मसौदे के आधार पर विचार-विमर्श  किया जायेगा । सच्चाई यह है कि महासभा के बाहर सुरक्षा परिषद के सुधार के संबन्ध में वर्तमान स्थाई सदस्यों ने अपनी सहमति व्यक्त की है लेकिन इन्होंने अभी तक महासभा में लिखित रूप से अपनी सहमति नही व्यक्त की है। अब महासभा के मसौदे पर इन देशों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। लेकिन एक दशक बाद भी इन वार्ताओं को सफलता नही मिली है तथा सुरक्षा परिषद में सुधार का मामाला अभी भी लटका हुआ है। सितमबर 2026 में भारत के प्रधानमंत्री यु0एन0 महासभा को संबोधित करेंगे जिसमें इस बात की पूरी संभावना है, कि सुरक्षा परिषद में सुधार का मामला जोर-शोर से उठाया जायेगा।

 निष्कर्ष

सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग के औचित्य पर कोई दो राय नहीं है। लेकिन कई कारणों से सुधार की राह कठिन है। प्रथम, सुरक्षा परिषद के वर्तमान स्थाई सदस्यों की सहमति के बिना सुरक्षा परिषद के ढ़ांचे में कोई परिवर्तन नही किया जा सकता। लेकिन इन सदस्यों ने अभी तक अपेक्षित सुधारों के लिये इच्छा शक्ति व दृढ़ निश्चय का प्रदर्शन नही किया है। दूसरा, कई देश नये स्थाई सदस्यों की दावेदारी का खुलकर विरोध कर रहै हैं। इस कारण आम रा का बनाना अत्यंत मुश्किल है। तीसरा, चारों देशों- भारत, जापान, जर्मनी तथा ब्राजील की दावेदारी एक साथ प्रस्तुत करने से भी यह मामला जटिल हो गया है। उदाहरण के लिये चीन किसी भी कीमत पर जापान की स्थाई सदस्यता के लिये तैयार नही है। चीन ने कहा भी है कि भारत ने जापान के साथ अपनी दावेदारी को शामिल कर अपनी दावेदारी को कमजोर कर लिया है। ऐसा भी हो सकता है कि आगे चलकर सुरक्षा परिषद में सुधार का मामला अमेरिका व पश्चिमी देशों तथा दूसरी तरफ रूस व चीन के बीच विवाद का विषय बन सकता है क्योंकि अमेरिका सदैव इस बात को सुनिश्चित करेगा कि जापान को सुरक्षा परिषद में स्थान अवश्य मिले। अक्टूबर, 2015 के अन्तिम सप्ताह में अपनी सदस्यता के समर्थन में भारत को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मिली है। भारत-अफ्रीका फोरम के दिल्ली में आयाजित तीसरे शिखर सम्मेलन में अफ्रीका के सभी 54 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था तथा दोनो पक्षों के बीच हुये एक राजनीतिक समझौते के तहत सभी अफ्रीकी देशों ने भारत की सथाई सदस्यता का समर्थन किया है। यह समर्थन संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की स्थिति को मजबूत बनाने के लिये आवश्यक है।

भारत को चीन को छोड़कर स्थाई सदस्यता हेतु समर्थन मिल रहा है। स्थाई सदस्यों की संख्या में बदलाव के लिये यू0 एन0 चार्टर में संशोधन आवश्यक है। संशोधन के लिये महासभा का दो‘-तिहाई बहुमत तथा सुरक्षा परिषद के पांचों स्थाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। चीन के सहयोग के बिना यह संशोधन संभव नही है। अतः ऐसा लगता है कि वर्तमान स्थाई सदस्यों के बीच आपसी असहमति व उनमे इच्छा शक्ति के अभाव में भारत की दावेदारी निकट भविष्य में साकार नही हो सकेगी।

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