भारत की विदेशनीति के संबन्ध में यूरोपीय संघ क्यों चर्चा में है? यूरोपीय संघ क्या है?


भारत की विदेशनीति के संबन्ध में यूरोपीय संघ क्यों चर्चा में है?


यूरोपियन आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयन तथा यूरोपियन परिषद के अध्यक्ष, एंटोनियो कोस्टा को 26 जनवरी 2026 को भारत के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर 27 जनवरी, 2026 को भारत व यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुये तथा भारत-यूरोपीय संघ वार्षिक शिखर सम्मेलन भी आयोजित किया गया।
उल्लेखनीय है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच कूटनीतिक संबन्ध 1963 में स्थापित हुये थे। भारत तथा यूरोपीय संघ के बीच नियमित रूप से वार्षिक शिखर सम्मेलनों की शुरूआत 2000 में हुई थी। तब से लेकर अब तक कतिपय अपवादों को छोड़कर नियमित रूप से दोनों के मध्य शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहे है। इस प्रकार के नियमित वार्षिक शिखर सम्मेलनों की व्यवस्था भारत ने यूरोपियन संघ के अलावा केवल आसियान तथा चार देशों- रूस, चीन, जापान तथा आस्ट्रेलिया के साथ ही की है। इससे यह पता चलता है कि भारत यूरोपियन संघ के साथ अपने संबन्धों को कितना महत्व प्रदान करता है। दोनों पक्षों ने हेग में 2004 में सम्पन्न पांचवें शिखर सम्मेलन में अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था। वर्तमान में दोनो इसी सामरिक साझेदारी को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं
भारत- यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जनवरी, 2026
उक्त सामरिक साझेदारी की उपलब्धि 27 जनवरी, 2026 को दोनो के बीच हस्ताक्षरित ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता है। समझौते की वार्तायें 2007 से चल रही थी। लेकिन इसका तात्कालिक कारण ट्रम्प प्रशासन की मनमानी व्यापारिक नीतियां है, जिससे दोनो पक्ष परेशान है तथा वैकल्पिक समाधान खोज रहे। इस समझौते की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

  1. इस मुक्त व्यापार समझौते से भारत के 99.5 प्रतिशत वस्तु निर्यात को कस्टम शुलक से मुक्त किया जायेगा तथा यूरोपीय संघ के 96.6 प्रतिशत निर्यात को भारत में कस्टम शुल्क से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान में दोनों के बीच वस्तुओं का व्यापार 120 बिलियन यूरो है।
  2. भारत के हितों को देखते हुये कृषि तथा दुग्ध उत्पादों को समझौते से बाहर रखा गया है।
  3. समझौते में सेवाओं में व्यापार तथा सुरक्षित डिजिटल व्यापार को भी शामिल किया गया है। वर्तमान में भारत तथा यूरोपीय संघ के बीच सेवाओं का कुल व्यापार 59 बिलियन यूरो है।
  4. समझौते में दोनो पक्षों ने लेबर तथा वर्कर के अधिकारों के संरक्षण पर सहमति व्यक्त की है।
  5. समझौते में विवादों के समाधान की भी व्यवस्था की गई है।
    यूरोपीय संघ क्या है?
    वर्तमान में विश्व में आर्थिक व राजनीतिक शक्ति के उभरते केन्द्रों में यूरोपीय देशों के क्षेत्रीय सहयोग संगठन- यूरोपीय संघ की गणना भी की जाती है। क्षेत्रीय स्तर पर देशों के आर्थिक समुदाय की स्थापना का विश्व में यह सफलतम उदाहरण है। यूरोपियन संघ वर्तमान में 28 देशों का संगठन है। वैसे तो इसकी स्थापना अपने वर्तमान रूप में 1993 में हुई लेकिन यह संघ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय देशों के मध्य सहयोग के लिये किये गये अनेक प्रयासों का परिणाम है। यह 1950 के बाद चार दशकों के क्रमिक विकास का परिणाम है। यह विश्व में क्षेत्रीय एकीकरण व आर्थिक समुदाय का एकमात्र सफलतम उदाहरण है।
    यूरोप में आर्थिक एकीकरण के प्रेरक तत्व
    यूरोपियन संघ यूरोपीय देशों की आर्थिक सहयोग व एकीकरण की इच्छा का मूर्तरूप है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सूरोपीय एकीकरण की प्रक्रिया को कई तत्वों से प्रोत्साहन प्राप्त हुआ, जो निम्नलिखित हैं- 1. द्वितीय विश्व युद्ध का सबसे अधिक विनाशकारी प्रभाव यूरोप में ही दिखाई दिया, क्योंकि युद्ध का प्रमुख स्थल यूरोप ही था। इस युद्ध के कारण यूरोप के देशों को न केवल व्यापक आर्थिक व मानवीय क्षति हुई बल्कि विश्व स्तर पर उनकी प्रभावशाली स्थिति भी प्रभावित हुई। युद्ध के बाद विश्व शक्ति के केन्द्र यूरोप नहीं रहा, बल्कि उसका स्थान अमेरिका और सोवियत संघ ने ले लिया। यूरोप के नेताओं तथा बुद्धजीवियों ने इस विपरीत स्थिति के लिये आपसी मदभेदों व विवादों को उत्तरदायी माना। अतः उन्होने अनुभव किया कि युद्ध की विभीषिका से बचने के लिए आपसी सहयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना आवश्यक है। यूरोप का आर्थिक एकीकरण व सहयोग इसी इच्छा का परिणाम है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद की समाप्ति के कारण भी यूरोप बाह्य तनावों से मुकत हो गया तथा शान्ति व सहयोग की प्रक्रिया आरंभ हुई। 2.अन्य क्षेत्रों की तुलना में यूरोप के देशों में वैचारिक व राजनीतिक समानता के तत्व पहले से विद्यतान रहे है, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लोकतंत्र और पूंजीवाद की विचारधाराओं ने पश्चिमी यूरोप में वैचारिक एकरूपता को मजबूत कर दिया। पश्चिमी यूरोप के सभी देशों में प्रजातंत्रिक व्यवस्था, समानता, स्वतंत्रता, न्याय, विधि का शासन, मानव अधिकारों का सम्मान तथा खुली आर्थिक प्रतियोगिता आदि तत्वों के प्रति आम सहमति पायी जाती है। इस वैचारिक सहमति के कारण आर्थिक सहयोग को प्रेरणा मिली। वैश्वीकरण के बाद उदारवाद व पूंजीवाद की धारणायें इनके एकीकरण का आधार बन गयी।
    यूरोपीय संघ की स्थापना व विकास
    एक आर्थिक समुदाय के रूप में यूरोपीय संघ की स्थापना एक लम्बे विकास का परिणाम है। इसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-
    अ. सहयोग का आरम्भ तथा रोम की संधि
    यूरोप में आर्थिक एकीकरण व सहयोग की प्रक्रिया का आरम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से माना जाता है। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास 1950 मेें यूरोप के 6 देशों द्वारा यूरोपीय कोयला व स्टील समुदाय की स्थापना करके किया गया। यह 6 देश थे – बेल्जियम, इटली, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, लक्जमबर्ग, तथा नीदरलैण्ड। यूरोपीय कोयला व स्टील समुदाय का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के राष्ट्रीय कोयला और स्टील उद्योगों पर केन्द्रियकृत नियन्त्रण की व्यवस्था करना था। इस प्रयास को यूरोप में संघ की स्थापना को पहला कदम कहा गया है। बाद में 1957 में रोम की संधि के द्वारा कोयला व स्टील समुदाय के साथ-साथ अन्य आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया गया तथा इस संधि के द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना की गई। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य इसके सदस्य देशों के मध्य व्यापार तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों में सहयोग को मजबूत करना था। रोम संधि के द्वारा ही कस्टम यूनियन तथा अणविक ऊर्जा के विकास में सहयोग हेतु यूरोपीय आणविक ऊर्जा समुदाय की स्थापना की गई। ये सभी संस्थायें 1958 में रोम की संधि के प्रभावी होते ही अस्तित्व में आ गयी।
    यूरोपीय एकीकरण की प्रक्रिया का विकास दो दिशाओं में हुआ है।
    पहला, इस प्रक्रिया में सम्मिलित देशों की संख्या का विस्तार तथा
    दूसरा, एकीकरण के ढ़ांचे में बदलाव तथा परिस्थितियों के अनुसार उसका विस्तार।
    ब. सदस्यता का विस्तार
    यूरोप के छः देश-बेल्जियम, इटली, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, लक्जमबर्ग, तथा नीदरलैण्ड यूरोपीय संघ के संस्थापक देश है। सहयोग की सफलता से प्रभावित होकर अन्य यूरोपीय देशों ने भी बाद में इसकी सदस्यता ग्रहण की-
    1973 में ब्रिटेन, डेनमार्क तथा आयरलैण्ड ने यूरोपीय आर्थिक समुदाय की सदस्यता ग्रहण की।
    1981 में यूनान ने तथा 1986 में पुर्तगाल व स्पेन ने इसकी सदस्यता ग्रहण कर ली। अतः शीतयुद्ध की समाप्ति तक यूरोपीय आर्थिक समुदाय की सदस्यता बढ़कर 12 हो गयी थी।
    वास्तव में यूरोपीय आर्थिक समुदाय की सदस्यता में व्यापक विस्तार सोवियत साम्यवादी व्यवस्था के समाप्ति के बाद तब हुआ जब पूर्वी यूरोप के देशों तथा सोवियत संघ से टूट कर आये नये गणराज्यों ने लोकतंत्र तथा नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया। परिणामतः पूर्वी यूरोप के देशों तथा पूर्व सोवियत गणराज्यों ने यूरोपीय संघ के सदस्य बन गये।
    1995 में फिनलैण्ड, आस्ट्रिया तथा स्वीडन ने यूरोपीय संघ की सदस्यता प्राप्त की।
    2004 में एक साथ पूर्वी यूरोप के 10 राज्यों ने यूरोपीय संघ में प्रवेश किया- चेक गणराज्य, साइप्रस, स्टोनिया, लाटबिया, लिथुआनिया, हंगरी, माल्टा, पौलैण्ड, स्लोवानिया तथा स्लोवाकिया।
    2007 में बुलगारिया तथा रोमानिया यूरोपीय संघ के सदस्य बने।
    2013 में क्रोसिया की सदस्यता के बाद यूरोपीय संघ की कुल सदस्य संख्या 28 हो गयी।
    2016 के ब्रेक्सिट मतदान संग्रह के बाद 2020 में ब्रिटेन आधिकरिक तौर पर यूरोपीय संघ से अलग हो गया है।
    अतः वर्तमान में 27 देश ही यूरोपीय संघ के सदस्य है।
    इस प्रकार यूरोपीय संघ ने उत्तर शीतयुद्ध काल में अपना विस्तार सम्पूर्ण यूरोप में कर लिया है। पूरब में इसकी सीमाएंे सोवियत संघ तक पहुंच गयी है। तुर्की कों यूरोप का बीमार व्यक्ति कहा जाता है। वह लम्बे समय से यूरोपीय संघ की सदस्यता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत् रहा है परन्तु यूरोप से राजनीतिक व सांस्कृतिक भिन्नता के कारण उसे अभी तक उसे सदस्यता प्राप्त नही हो सकी।
    स. यूरोपीय संघ में ढ़ाचागत बदलाव
    वैश्वीकरण की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए यूरोपीय संघ के ढ़ांचे में भी परिवर्तन किया गया है तथा आवश्यकतानुसार सहयोग की नई संस्थाओं व प्रणालियों का विकास किया गया है। इनका उल्लेख नीचे किया गया है- 1.मास्ट्रिक्ट संधि, 1992- सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 1993 में लागू की गई इस सन्धि के द्वारा किये गये-
    ’यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ का नाम बदलकर इसका नया नाम ‘यूरोपीय समुदाय’ कर दिया गया।
    संधि की व्यवस्था के अनुसार यूरोपीय संघ के तीन स्तंभ निर्धारित किए गए है। इन स्तंभों का निर्धारण उनके कार्यक्षेत्र के आधार पर किया गया।
    प्रथम स्तंभ में विभिन्न प्रकार के यूरोपीय समुदाय सम्मिलित थे जो अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से सहयोग के कार्यक्रमों का संचालन कर सकते थे। यूरोपियन समुदायों की संख्या तीन थी – 1. यूरोपियन समुदाय 2. यूरोपियन कोयला तथा स्टील समुदाय तथा 3. यूरोपियन आणविक ऊर्जा समुदाय । इसमें से यूरोपीय कोयला तथा स्टील समुदाय की संधि की अवधि समाप्त होने के कारण 2002 में यह समुदाय भंग हो गया। इन समुदायों द्वारा स्वतंत्र रूप से आर्थिक, सामाजिक तथा पर्यावरण संबंधी सहयोग की नीतियों व कार्यक्रमों के संचालन का अधिकार दिया गया था। वास्तव में इन समुदायों का अपना एक स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व था।
    दूसरा स्तंभ ‘सामान्य विदेश तथा सुरक्षा नीति’ के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्य दायित्व विदेश नीति तथा सैनिक मामलों में समन्वय स्थापित करना है।
    तीसरा स्तंभ ‘आपराधिक मामलों में पुलिस तथा न्यायिक सहयोग’ के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्य कार्य आपराधिक मामलों में सदस्य देशों के मध्य सहयोग व समन्वय स्थापित करना है। इस स्तंभ को मूल रूप से ‘न्याय तथा ग्रह मामलें‘ (श्रभ्।) के नाम से जाना जाता था।
    इन तीनों स्तंभों की शक्तियां समान नहीं थी। पहले स्तंभ का स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व था तथा वह सदस्य राष्ट्रों से स्वतंत्र रहकर सहयोग कार्यक्रमों का संचालन कर सकता था। लेकिन दूसरे और तीसरे स्तंभ की शक्तियाँ सीमित थी, क्योंकि इन्हे अपने अधीन आने वाले मामलों को संचालन करने के लिये सदस्य राष्ट्रों की अलग सहमति लेनी पड़ती थी। 2.एमस्टरडम संधि, 1997 तथा नाइस सन्घि, 2001- 1997 में प्रभावी एमस्टरडम संधि तथा 2001 में प्रभावी नाइस ;छपबमद्ध संधि द्वारा इन तीनों स्तंभों के आपसी अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन किया गया। एमस्टरडम संधि द्वारा तीसरे स्तंभ के अन्तर्गत आने वाले कतिपय मामलों जैसे राजनीतिक शरण, आव्रजन, तथा सिविल मामलों में न्यायिक सहयोग को पहले स्तंभ के अधिकार क्षेत्र में शामिल कर दिया गया।
    3.संवैधानिक संघि, 2004-यूरोपीय समुदाय के एक अलग संविधान का निर्माण के उद्देश्य हेतु 2004 में संवैधानिक संधि का मसौदा तैयार किया गया था। इसके द्वारा यूरोपीय विदेश मंत्री के पद की भी स्थापना की गई। इसको लागू करने की शर्त यह थी कि सभी सदस्य देशों की जनता द्वारा इसका अनुमोदन किया जाये। लेकिन 2005 में फ्रांस तथा नीदरलैण्ड के नागरिकों ने इस संधि को अस्वीकार कर दिया, जिससे यह संधि 2005 मंें समाप्त हो गई तथा कभी अस्तित्व में नही आ पायी। 4.लिस्बन सन्धि, 2007 – यूरोपीय एकीकरण के ढ़ांचे में बदलाव की दृष्टि से यह संघि सबसे महत्वपूर्ण है।यह संधि 1 दिसम्बर 2009 को प्रभाव में आ गई तथा इसके ही पूर्व की सभी सन्धियाँ समाप्त हो गई। यूरोपीय संघ का वर्तमान ढ़ांचा लिस्बन सन्धि पर ही आधारित है।
    इस संधि के द्वारा यूरोपीय समुदाय का नाम बदलकर यूरोपीय संघ ;म्नतवचमंद न्दपवदद्ध कर दिया गया, जो इसका वर्तमान नाम है।साथ ही संघ को एक स्वतंत्र कानूनी व्यक्तित्व प्रदान किया गया। अतः अब यूरोपीय संघ अन्य देशों के साथ एक राष्ट्र की तरह संबंध स्थापित कर सकता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना स्वतंत्र प्रतिनिधित्व कर सकता है।
    लिस्बन संधि ने देशों के मध्य सहयोग से संबंधित सभी विषयों के अधिकार क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित कर दिया।
    (अ) पहले भाग में यूरोपीय संघ के एकमात्र अधिकार क्षेत्र में आने वाले पांच विषयों को शामिल किया गया- 1. कस्टम यूनियन, 2. सदस्य देशों के आन्तरिक बाजार के संचालन हेतु आवश्यक प्रतियोगिता नियमांे का निर्धारण करना, 3. उन सदस्य देशों की मौद्रिक नीति का निर्धारण जिन्होंने यूरो करेंसी को अपना लिया है, अब तक यूरोपीय संघ के 17 देशों ने यूरो को अपनी मुद्रा के रूप में अपना लिया है। 4. सामान्य मछली उत्पादन ;थ्पेीमतपमेद्ध नीति के अन्तर्गत समुद्री जैविक संसाधनों के संरक्षण मामले, 5. सदस्य देशों के लिए सामान्य व्यवसायिक नीति। ये सभी मामले ऐसे है जिन में यूरोपीय संसद द्वारा कानूनी व्यवस्था किए जाने के बाद यूरोपीय संघ को अकेले ही कार्यवाही करने तथा अन्तर्राष्ट्रीय समझौते करने का अधिकार है।

(ब) दूसरे भाग में उन मामलों को शामिल किया गया है जिन पर यूरोपीय संघ तथा सदस्य राष्ट्रों को साझा अधिकार क्षेत्र प्राप्त है। ये मामले दो प्रकार के है। प्रथम श्रेणी में वे मामले आते है जिन पर यदि यूरोपीय संघ ने अपन अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर लिया है तो बाद में सदस्य राष्ट्र अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नही कर सकते है। ये मामले है – सदस्य देशों के आन्तरिक बाजार, सामाजिक नीति, आर्थिक सामाजिक तथा क्षेत्रीय एकता, समुद्री जैविक संशाधनों को छोड़कर कृषि तथा मछली उत्पादन, पर्यावरण, उभोगता संरक्षण, यातायात, ट्रान्स यूरोपीय नेटवर्क, स्वतंत्रता सुरक्षा तथा न्याय के क्षेत्र तथा जनस्वस्थ्य के संबंध में सामान्य सुरक्षा के मामले। साझा अधिकार क्षेत्र की दूसरी श्रेणी में वे मामले आते है जिन पर यूनियन द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र को प्रयोग करने के बावजूद भी सदस्य देशों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया जा सकता है। इस श्रेणी में सम्मिलित मामले है – अन्तरिक्ष, तकनीकि, तथा विकास संबंधी शोध, विकास सहयोग तथा मानवीय सहायता।
(स) तीसरे भाग में वे मामले सम्मिलित है जिनमें यूरोपीय यूनियन को समर्थक अधिकार क्षेत्र प्राप्त है। अर्थात जिनके बारे में यूरोपीय संघ सदस्य राज्यों को सहयोग देने के लिए उनके अनुसार कार्यवाही कर सकता है। ये मामले है – मानवीय स्वास्थ्य का सुधार एवं संरक्षण, उद्योग, संस्कृति, पर्यटन, शिक्षा, युवा खेलकूद एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण, नागरिक संरक्षण तथा प्रशासनिक सहयोग। वर्तमान में यूरोपीय संघ का उक्त ढ़ांचा ही कार्यरत है।


यूरोपीय संघ के उद्देश्य
यूरोपीय संघ के मौलिक उद्देश्यों का उल्लेख लिस्बन संघि, 2007 की प्रस्तावना तथा उसके अनुच्छेद 3 में किया गया है। ये उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. यूरोप में शांति, जनकल्याण तथा यूरोपीय संघ के मूल्यों को प्रोत्साहित करना।
  2. संघ के नागरिकों को स्वतंत्रता, सुरक्षा तथा न्याय प्रदान करना।
  3. सदस्य राष्टों के मध्य आर्थिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करना।
  4. यूरोपीय संघ की जनता के मध्य एकता को मजबूत करना तथा उसकी इतिहास, संस्कृति व परम्पराओं का सम्मान करना।
  5. सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाना तथा उनके मध्य समनवय बनाते हुये एक आर्थिक और मौद्रिक संघ की स्थापना करना।
  6. जीवन्त विकास के सिद्धान्त के आधार पर यूरोप में आर्थिक व सामाजिक उन्नति को बढ़ाना तथा आर्थिक एकीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करना।
  7. यूरोपीय महाद्वीप में विभेदों को समाप्त करना तथा भविष्य के यूरोप के निर्माण के लिए ठोस आधार तैयार करना।
  8. यूरोपीय संघ में सामान्य सुरक्षा व विदेश नीति को लागू करना ताकि यूरोपीय पहचान मजबूत हो सकें तथा विश्व और यूरोप में शांति सुरक्षा व उन्नति को बढ़ावा मिल सकें।

यूरोपीय संघ के प्रमुख अंग तथा संस्थायें
यूरोपीय संघ के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये निम्न सात संस्थाओं की स्थापना की गयी है-

  1. यूरोपीय संसद- यह यूरोपीय संघ का अर्द्धविधायी विधायी अंग है। 751 सदस्यों वाली यूरोपीय संसद का निर्वाचन हर 5 साल बाद सदस्य देशों के नागरिकों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक सदस्य देश के लिए यूरोपीय संसद में सीटे आबंटित होती है। यद्यपि यूरोपीय संसद के सदस्यों का निर्वाचन राष्ट्रीय आधार पर होता है तथापि वे राष्ट्रीयता के आधार पर नही बल्कि एक राजनीतिक समूह के आधार पर कार्य करते है। संसद का मुख्य कार्य यूरोपीय संघ के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों के बारे में कानूनों का निर्माण व समयानुसार उनका संशोधन करना है। यह अपने विधायी कार्यों का निष्पादन यूरोपीय संघ की परिषद के साथ मिलकर करती है।
    2.यूरोपीय संघ की परिषद- इसमें सदस्य देशों के मंत्री सदस्य होते है। यह यूरोपीय संसद के साथ मिलकर विधायी कार्यों का निष्पादन करती है। यह यूरोपीय संघ की आधी संसद की तरह है। इसकं अतिरिक्त यह परिषद सामान्य विदेश एवं सुरक्षा नीति के संबंध में कार्यपालिका के दायित्वों का निर्वाह भी करती है।
    3.यूरोपीय आयोग- सही अर्थों में यूरोपीय आयोग ही संघ की कार्यपालिका है। सैद्धान्तिक अर्थों में आयोग यूरोपीय संघ का सामूहिक प्रतिनिधित्व करता है। इसका मुख्य कार्य सहयोग के लिए कानूनी उपायों का मसौदा तैयार करना तथा यूरोपीय संघ की दिन प्रतिदिन की कार्यवाहियों का संचालन करना है। इसमें प्रत्येक देश से एक प्रतिनिधि होता है। जिसे आयुक्त कहा जाता है।
    4.यूरोपीय परिषद- यूरोपियन परिषद को यूरोपीय संघ की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता कहा जाता है, जबकि यूरोपीय संघ की परिषद संघ का अर्धविधायी अंग है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यूरोपीय संघ की परिषद तथा यूरोपीय परिषद दोनो अलग संस्थायें है ।
    यूरोपीय परिषद में इसका एक अध्यक्ष, यूरोपीय आयोग का अध्यक्ष तथा प्रत्येक देश से एक प्रतिनिधि होता है। यह प्रतिनिधि आमतौर पर उस देश का राष्ट्राध्यक्ष अथवा शासनाध्यक्ष होता है। एक सामूहिक संस्था के रूप में यह अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों व संधियों का अनुमोदन करती है तथा संघ के सदस्यों अथवा उसकी संस्थाओं के मध्य विवादों तथा अन्य राजनीतिक संकटों का समाधान करती है।
    5.यूरोपीय संघ का न्यायालय- संघ का अपना एक अलग न्यायालय भी है, जिसका मुख्य कार्य संघ के कानूनों व संधियों को लागू करना तथा उनकी व्याख्या करना है।
    6.यूरोपीय केन्द्रीय बैंक- यूरोपीय संघ का एक केन्द्रिय बैंक भी है जो संघ की मौद्रिक नीति बनाता है तथा उसका प्रशासन भी करता है।
    7.यूरोपीय लेखा परीक्षकों का कोर्ट- यह वित्तीय मामलों में यूरोपीय संघ की एक महत्वपूर्ण संस्था है। इसके महत्वपूर्ण कार्य है- बजट का समुचित लेखा तैयार करना, लेखों की विश्वनीयता को सुनिश्चित करना, तथा वितीय जालसाजी को रोकना।

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