सामरिक स्वायत्ता क्या है?
सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के सिद्धान्त को भारत की समकालीन विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता माना जाता है। ’सामरिक स्वायत्तता’ वाक्यांश दो शब्दों से मिलकर बना है- सामरिक तथा स्वायत्तता। ’सामरिक’ का संबन्ध उन आधारभूत तथा दूरगामी प्रभाव वाले तत्वों से है, जो किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आवश्यक हैं। स्वायत्तता का तात्पर्य किसी रणनीति के निर्माण व उसके क्रियान्वयन की स्वतंत्रता से है। इस प्रकार विदेशनीति के सन्दर्भ में सामरिक स्वायत्तता का तात्पर्य किसी देश द्वारा अपनी विदेशनीति से संबन्धित आधारभूत निर्णय व रणनीति के निर्माण व क्रियान्वयन की स्वतंत्रता से है। दूसरे शब्दों में भारत अपने मौलिक हितों केा ध्यान में रखकर विदेश नीति के निर्णय स्वतंत्र रूप से लेगा तथा वह इस संबन्ध में किसी बाहरी शक्ति से प्रभावित नही होगा। संक्षेप में आधारभूत मामलों में विदेशनीति के निर्णयों की स्वतंत्रता ही सामरिक स्वायत्तता है।
भारतीय विदेशनीति में सामरिक स्वायत्तता की पृष्ठभूमि
भारत की विदेशनीति में सामरिक स्वायत्तता का शब्द भले ही नया हो लेकिन यह विचार नया नही है। यद्यपि समकालीन वैश्विक परिदृश्य में सामरिक स्वायत्तता की धारणा को नया आयाम प्राप्त हो गया है, लेकिन भारत की विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय की बात भारत द्वारा आजादी के बाद से ही की जा रही है। शीत युद्ध काल-1945से 1991 में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति अमेरिका तथा सोवियत संघ के दो विरोधी गुटों के मध्य शक्ति संघर्ष से ग्रसित थी। पूंजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में था तथा साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ के हाथ में था। दोनो के बीच तनाव व शीत युद्ध का माहौल था तथा दोनो विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रभाव के विस्तार हेतु प्रयत्नशील थे। दोनो विरोधी गुटों का लक्ष्य भारत जैसे नवोदित राष्ट्रों को अपने गुट में शामिल कर अपने वर्चस्व का विस्तार करना था। जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो उसके विदेशनीति निर्माताओं की मुख्य चुनौती यह थी ेिक भारत दो गुटों में विभाजित विश्व में विदेश नीति को क्या दिशा प्रदान करे। भारतीय विदेश नीति के निर्माता नेहरू ने इस सन्दर्भ में गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाते हुये भारत की स्वतंत्र नीति का आगाज किया । बाद में एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के कई नवोदित राष्ट्रों ने इस नीति को स्वीकार किया तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का विकास हुआ। वास्तव में गुटनिरपेक्षता की नीति केवल गुटों से अलग रहने की निष्क्रिय नीति नही थी, वरन यह प्रत्येक मामले में गुण-दोष के आधार पर स्वंत्र निर्णय लेने की नीति थी। इसीलिये विदेश नीति की स्वतंत्रता को ही गुटनिरपेक्षता का मूल तत्व माना जाता है। भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाने के अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण विदेश नीति की स्वतंत्रता को बनाये रखना था। इसका कारण यह था कि भारत लम्बे समय तक विदेशी शासन के अधीन था तथा अब वह वैदेशिक मामलों में किसी बाह्य शक्ति की अधीनता स्वीकार करने के पक्ष में नही था। अमेरिका अथवा सोवियत गुट में शामिल होने का मतलब विदेशी मामलों में स्वतंत्रता से समझौता करना था। इस प्रकार हम कह सकते है कि वैदेशिक मामलों में स्वतंत्रता भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति का आवश्यक अंग है तथा यही इसका सही अर्थ है। उत्तर-शीत युद्ध काल में सामरिक स्वायत्तता का विचार गुटनिरपेक्षता के इसी विचार का नया संस्करण है। अतः भारत की सामरिक स्वायत्तता की नीति को उक्त पृष्ठभूमि में ही समझा जाना चाहिये। यह बात सच है कि वर्तमान परिस्थितियां शीतयुद्ध कालीन वैश्विक परिस्थितियों से भिन्न है, लेकिन नयी परिस्थितियों में भारत को अपने मौलिक हितों की रक्षा करने के लिये सामरिक स्वायत्तता की नीति आवश्यक है।
भारत की सामरिक स्वायत्तता के वर्तमान सन्दर्भ
वर्ष 1991 में सोवियत संघ का विघटन होने के कारण शीत युद्ध का अ्रन्त हुआ तथा अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभर कर सामने आया। इस नई वैश्वि व्यवस्था में भारत सहित अन्य देशों को अपनी विदेशनीति की प्राथमिकताओं में समायोजन करना आवश्यक हो गया। कहींे न कहीं इस समायोजन का संबन्ध भारतीय विदेश नीति की स्वतंत्रता से भी है। उल्लेखनीय है कि भारत व सोवियत संघ, वर्तमान में रूस, के सथ भारत के घनिष्ठ सामरिक संबन्ध शीत युद्धकाल से ही चले आरहे है। उत्तर-षीत युद्धकाल में भी इन संबन्धों में कोई कमी नही आई है। लेकिन उत्तर-शीत युद्ध काल में सामरिक स्वायत्तता का मुद्दा इस लये महत्वपूर्ण हो गया है कि हिन्द प्रशान्त क्षेत्र में अमेरिका तथा चीन के बीच वर्चस्व की जो प्रतियोगिता चल रही है, उसमें भारत का झुकाव गत कुछ वर्षों से अमेरिका की तरफ बढ़ रहा है। इस बात के प्रमाण उत्तर-शीत युद्ध काल में भारत व अमेरिका के बीच क्रमशः बढ़ रही सामरिक साझेदारी से लगाया जा सकता है। उच्च स्तरीय विचार-विमर्श के बाद 2008 में दोनो देशों के बीच सिविल परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुये, जो सामरिक दृष्टि से दोनो देशों के संबन्धों में एक बड़ा बदलाव था। इसी समझौते के कारण न केवल भारत का विश्व स्तर पर परमाणु अलगाववाद समाप्त हुआ वरन् भारत व अमेरिका के बीच एक सामरिक समझ का विकास हुआ। प्रतिरक्षा के क्षेत्र में दोनो देशों ने 2005 में दस वर्ष के लिये एक प्रतिरक्षा सहयोग समझौता किया था, जिसे 2015 में तथा दोबारा 2025 में पुनः 10 वर्षों के लिये बढ़ा दिया गया है। इस समझौते में उन्नत प्रतिरक्षा उपकरणों के व्यापार, उनके संयुक्त उत्पादन व विकास तथा संयुक्त सैनिक अभ्यासों की बात शामिल है। इसी के अन्तर्गत दोनो देश मालाबार नौसैनिक अभ्यास का संचालन नियमित रूप से कर रहे है। भारत, अमेरिका, जापान तथा आस्ट्रेलिया ने 2017 में सामरिक सहयोग बढ़ाने के लिये क्वाड (QUAD) की स्थापना की है। क्वाड (QUAD) के अन्तर्गत अब मालाबार नौसैनिक अभ्यास में ये चारो देश भाग लेते है।
उधर चीन ने क्वाड को एशियाई नाटो की संज्ञा देकर इसका विरोध किया है, क्योंकि वह मानता है कि क्वाड का गठन चीन की सामरिक नाकेबन्दी के लिये किया गया है। इसी बीच यूके्रन युद्ध के चलते चीन तथा रूस के बीच तेजी से सामरिक साझेदारी का विकास हो रहा है। वर्तमान में ईरान तथा उत्तरी कोरिया जैसे देशों ने भी इनें साथ सामरिक संबन्धों का विकास किया है।
भारत की सामरिक स्वायत्तता की नीति का वर्तमान सन्दर्भ यह है कि भारत अमेरिका के साथ मजबूत सामरिक साझेदारी के बावजूद उसके दबाव के बिना अपने हितों की पूर्ति के लिये स्वतंत्र निर्णय ले। भारत ने कई बार ऐसा करके दिखाया है। अमेरिका तथा पश्चिमी देशों खरा यूके्रन युद्ध के कारण रूस के विरूद्ध कई तरह के सैनिक प्रतिबन्ध लगाये गये है तथा इस युद्ध में रूस को आक्रमण कारी घोषित किया गया है। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों ने इसी नीति का अनुशरण करने के लिये भारत पर दबाव भी बनाया है। लेकिन अपने हितों के अनुसार भारत ने स्वायत्तता की नीति का अनुशरण करते हुये संयुक्त राष्ट्र के ऐसे किसी प्रस्ताव का समर्थन नही किया है जिसमें रूस को आक्रमणकारी घोषित किया गया हो। भारत ने रूस से इन प्रतिबन्धों के बावजूद 2024 से सस्ता तेल भी खरीदा है। 2026 में ईरान अमेरिका युद्ध के समय हार्मुज जलडमरूमध्य से भारत का तेल व गैस आयात बाधित हो गया था। अतः भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ा दिया है। अमेरिका ने ईरान को लेकर भी इस तरह के प्रतिबन्धों की घोषणा की है। भारत को अपने हितों को ष्यान में रखकर ईरान के प्रति भी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की आवश्यकता है। ईरान ने भारत को अइपने चाबहार बन्दरगाह के शाहिद बहस्ती अर्मिनल के संचालन का अधिकार दिया है तो भारत के लिये सेण्ट्रल एशिया व रूस से सम्पर्कता मार्ग के लिये आवश्यक है।
इसी तरह भारत ने 1992 में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ अपने संबन्धों को मजबूत करने के लिये ’पूर्व की ओर देखों की नीति का आरंभ किया, जिसे 2014 के बाद ’एक्ट ईस्ट’ नीति के नाम से जाना जाता है। भारत ने अफ्रीका तथा सेण्ट्रल एशिया तथा अफ्रीका व अन्य क्षेत्रों में एक स्वतंत्र नीति का अनुशरण किया है। अतः भारत अपने व्यापक हितों को ध्यान में रखकर निरन्तर विभिन्न क्षेत्रों में बिना कियाी दबाव के सामरिक स्वायत्तता की नीति का अनुशरण कर रहा है।
अमेरिका की मान्यता यह जो देश अमेरिका की नीतियों का अनुशरण नही कर रहा है वह अमेरिका विरोधी है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे शासन काल में यह मान्यता और अधिक स्पष्ट हो गई है। उनके कार्यकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ घनिष्ट संबन्ध विकसित करने का प्रयास किया है। इसी तरह उन्होने अपने अन्य देशों के साथ भी एकतरफा व मनमानी नीतियां अपनाई है, जिन्हें ट्रम्प की व्यापारिक नीतियों में स्पष्ट तोर पर देखा जा सकता है।
निष्कर्ष यह है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था अनिश्चितता के दैज्ञर से गुजर रही है। एसे स्थिति में भारत की सामरिक स्वायत्ता की नीति का महत्व अघिक बढ़ जाता है, क्यांेकि इस नीति का अनुशरण करके ही भारत अपने व्यापक हितों की रक्षा कर सकता है।
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