भारत मे लोकपाल से संबिन्धत विवरण भारत की संसद द्वारा 2013 में पारित लोकपाल तथा लोकायुक्त अधिनियम में दिया गया है। इस अधिनियम का का उद्देश्य प्रशासन में जवाबदेही तथा पारदर्शिता को सुनश्चित करना है। यह अधिनियम 2011 में अन्ना हजारे द्वारा चलाये गये भ्रष्टाचार विरोधी आनादोलन का परिणाम है। इस आन्दोलन को इण्डिया अगेन्स्ट करप्सन के नाम से जाना जाता है।
लोकपाल जैसी संस्था का उल्लेख विश्व में पहली बार 1908 में स्वीडन में स्थापित ओमबुडसमैन नामक संस्था के रूप में पाया जाता है। भारत में लोकपाल शब्द का प्रयोग सबसे पहले एल0 एम0 सिंहवी ने किया था। लेकिन भारत में लोकपाल का विचार सबसे पहले मोरारजी देशाई की अध्यक्षता में गठित प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-1969) ने अपनी सिफाारिसों में दिया था। इस आयोग ने पहली बार लोक शिकायतों के निस्तारण के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकयुक्त की नियुक्ति का सुझाव दिया था। लेकिन लोकपाल बिल संसद में 10 बार (1968, 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005 तथा 2008 में ) प्रस्तुत होने के बाद 11वीं बार में 2013 में संसद में पारित हुआ।
लोकपाल के अध्यक्ष व सदस्यों की योग्यतायें
लोकपाल के गठन की व्यवस्था लोकपाल तथा लोकायुक्त अधिनियम की धारा 3 में की गई है। इसके अनुसार लोकपाल नामक सस्था में एक अध्यक्ष व अधिकतम आठ सदस्य हो सकते है।
अध्यक्ष वही व्यक्ति हो सकता है जो या तो सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व मुख्य न्यायाधाीश अथवा न्यायधीश रहा हो या प्रसिद्ध (एमीनेन्ट) व्यक्ति हो।
लोकपाल में अधिकतम आठ सदस्य होंगे। इनमें से आधे सदस्य न्यायिक सदस्य होंगे। न्यायिक सदस्य वही होंगे जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के मुख्य नयायाधीश रहे हों। अन्य आधे सदस्य वे व्यक्ति होंगे, जिन्हें 25 वर्षेों का भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों व प्रशासन का अनुभव हो।
यह भी शर्त है कि कुल सदस्यों के आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओ0 बी0 सी0, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं में से होंगे।
अध्यक्ष व सदस्यों की न्यूनतम आयु 45 वर्ष अथवा अधिक होनी चाहिये।
यह भी उल्लेखनीय है कि संसद सदस्य, राज्य विधानमंडलों के सदस्य, पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के सदस्य, तथा सरकारी सेवा से हटाये गये व्यक्ति लोकपाल के अध्यक्ष अथवा सदस्य नही हो सकते हैं।
लोकपाल के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति
लोकपाल के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति का उल्लेख अधिनियम की धारा चार में िदया गया है। लोकपाल के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा चयन समित के सदस्यों की संस्तुति के आधार पर की जायेगी।
चयत समिति में निम्न सदस्य होंगे-
- प्रधानमंत्री- अध्यक्ष
- लोक सभा स्पीकर- सदस्य
- लोक सभा में विपक्ष का नेता-सदस्य
- भारत के मुख्य न्यायाधीश-सदस्य
- एक प्रसिद्ध न्यायिवद जो उक्त चार सदस्यों द्वारा नामित किया जायेगा। उक्त चयन समिति पहले सात सदस्यों की एक खोज अथवा सर्च कमेटी बनायेगी, जो चयन के लिये कतिपय नामों का पैनल तैयार कर चयन समिति का सौंपेगी। लेकिन चयन समिति इस पैनल से अथवा इसके बाहर से भी किसी व्यक्ति की नियुक्ति हेतु सिफारिस कर सकती है। क्या लोकपाल भारत के प्रधामंतत्री के विरूद्ध भ्रष्टाचार कीजांच कर सकता है?
लोकपाल के क्षेत्राधिकार का उल्लेख अधिनियम की धारा 14 में दिया गया है। लोकपाल कतिपय अपवादों को छोडकर वतर्मान अथवा किसी पूर्व प्रधानमंत्री के विरूद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर कता है। अपवाद यह है कि लोकपाल प्रधानमंत्री के निम्न कार्यों अथवा मामलों की जांच नही कर सकता है-
अन्तराष्ट्रीय संबन्ध, बाहरी तथा आन्तरिक सुरक्षा, लोक व्यास्था, एटामिक इनर्जी तथा अन्तरिक्ष विभाग संबन्धी मामले।
इस प्रकार हम कह सकते है कि प्रधानमत्री के सारे कार्य लोकपाल की जांच के दायरे में नही है। उक्त मामलों के अलावा लोकपाल द्वारा प्रधानमंत्री के कार्यों की जांच लोकपाल द्वारा की जा सकती है।
प्रधानमंत्री के अतिरिक्त निम्न पदाधिकारी में लोकपाल की जांच की परिधि में आते हैं-
- वर्तमान तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्रीगण
2.संसद के वर्तमान तथा पूर्व सदस्य
3.केन्द्र सरकार के क्लास अ, ब, स, तथा द वर्ग के अधिकारी व कर्मचारी
4.केन्द्रीय सरकारी निगमों के अध्यक्ष तथा अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी
5.केन्द्रीय सरकारी कम्पनियों के निदेशक तथा अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी
6.ऐसे एन0 जी0 ओ0 जो सरकार से सहायता पा रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि लोकपाल को भ्रष्टाचार के मामलों में जांच करने तथा मुकदमा चलाने दोनों के अधिकार प्राप्त है। इसके लिये लोकपाल में अलग-अलग दो प्रशासनिक शाखाओं की स्थापना की गई है।
लोकपाल की पदमुक्ति-
लोकपाल के अध्यक्ष व सदस्यों को पदमुक्त को पदमुक्त करने की व्यस्था अधिनयम की धारा 37 में दी गई है। इसके अनुसार लोकपाल के अध्यक्ष व सदस्यों को पदमुक्त करने अथवा निलम्बित करने का अधिकार राष्ट्रपित को प्राप्त है। लोकपाल को कम से कम 100 संसद सदस्यों के आवेदन पर सर्वोच्च न्यायलय से जांच के उपरान्त दुर्व्यवहार का आरोप सिद्ध होने पर राष्ट्रपति द्वारा पदमुक्त किया जा सकता है।
Leave a Reply