राजनीति विज्ञान में उत्तर-व्यवहारवाद की वतर्मान स्थिति क्या है?

एक बौद्धिक प्रक्रिया के रूप में राजनीतिक सिद्धान्त का विकास भी काफी हद तक राजनीतिक प्रभुत्व का अनुशरण करता है। इसका कारण यह है कि राजनीतिक प्रभुत्व को अपने औचित्य के लिये तथा उसके विरोधियों को विरोध के लिये राजनीतिक सिद्धान्त की आवश्यकता होती है । द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति में ब्रिटेन का प्रभुत्व समाप्त हुआ तथा उसका स्थान यूरोप व उत्तरी अमेरिका में अमेरिका ने प्राप्त कर लिया।  अतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीतिक सिद्धान्त का विाकस अमेरिका में तेजी से हुआ।

यह एक महज संयोग नही है कि अमेरिका के राजनीतिक विद्वानों ने ही राजनीति के दो प्रमुख दृष्टिकोणों- व्यवहारवाद (Behaviouralism)    तथा उत्तर-व्यवहारवाद (Post-Behaviouralism) का प्रतिपादन किया। यहां दृष्टिकोण (Approach) तथा शोध विधि (Research Method) में अन्तर करना आवश्यक है। जहां दृष्टिकोण विषय के प्रति समग्र नजरिया प्रस्तुत करता है, वहीं शोध विधि अध्ययन अथवा शोध का तरीका है। सामान्य तौर पर शोध विधि का विकास किसी दृष्टिकोण के अन्तर्गत होता है।

उत्तर-व्यवहारवाद का विकास क्यों हुआ?

द्वितीय विश्व युद्ध पहले राजनीतिविज्ञान का अध्ययन मूलतः अदर्शात्मक अथवा नार्मेटिव था जिसमें तथ्यों की अधिक गुजांइस नही थी। उस समय अमेरिका के विद्वानों  जैसे चार्ल्स मेरियम तथा डैविड ईस्टन आदि ने इसे राजनीति विज्ञान की कमजोरी माना तथा इसके विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप व्यवहारवाद का विकास किया। व्यवहारवाद ने माना की राजनीतिक प्रक्रियाओं तथा घटनाओं में भी कतिपय पैटर्न तथा नियिमतता निहित होती है। अतः राजनीति विज्ञान का अध्ययन भी भौतिक विज्ञानों की तरह किया जा सकता है। इसी आधार पर इन विद्वानों ने व्यवहारवाद के अन्तर्गत रातनीति विज्ञान के वैज्ञानिक तथा तथ्यपरक अध्ययन की वकालत की। लेकिन व्यवहारवाद की मुख्य कमी यह थी कि इसमें वैज्ञानिकता व सिद्धान्त निर्माण पर जोर था, भले ही उन सिद्धान्तों का संबन्ध समाज की मुख्य चुनौतियों से है अथवा नही।

व्यवहारवादी दृष्टिकोण की उक्त कमी तब उजागर हुई, जब 1960 के दशक में अमेरिका मे ही सामाजिक उथल-पुथल, नागरिक अधिकार आन्दोलन तथा वियतनाम युद्ध का विरोध जैसी समस्यायें सामने आगई थी। व्यवहारवादी दृष्टिकोण से प्रभावित तथा अतिवैज्ञानिकता से ग्रसित व सामाजिक सरोकारों से दूर राजनीति विज्ञान के पास इन समस्याओं का कोई समाधान नही था। अतः इस स्थिति के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप डेविउ ईस्टन ने ही उत्तर-व्यवहारवाद का प्रतिपादन किया।

उत्तर-व्यवहारवाद की प्रमुख विशेषतायें क्या है ?

वर्ष 1969 में डेविड ईस्टन अमेरिकी पालिटिकल साइन्स एसोसिएसन के अध्यक्ष थे। इसी वर्ष अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने अमेरिका की सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिये उत्तर-व्यवहारवादी दृष्टिकोण की निम्न सात विशेषताओं का उल्लेख किया, जिन्हें क्रेडो आफ रिलेवेन्स के नाम से जाना जाता हैः

  1. राजनीतिक शोध में अध्ययन पद्धति के स्थान पर अध्ययन के विषय पर जोर दिया जाना चाहिये।
  2. राजनीत विज्ञान में मूल्यों अथवा आदर्शों की अवहेलना नही की जा सकती है। अतः उत्तर-व्यवहारवाद ने व्यवहारवाद की मूल्य निरपेक्षता के स्थान पर मूल्य सापेक्षता का समर्थन किया।
  3. राजनीतिक शोध को यथा स्थिति के स्थान पर सामाजिक बदलाव पर ध्यान देना चाहिये।
  4. राजनीति विज्ञान को सामाजिक वास्तविकताओं के प्रित संवेदनशील होना चाहिये।
  5. राजनीति िवज्ञान के विद्वानों को अपनी सामाजिक जिममदारी का अहसास होना चाहिये।
  6. राजनीति विज्ञान का अध्ययन ऐसा होना चाहिये जिसे व्यवहार में नतियों के रूप में लागू किया जा सके। राजनीतिक शोध केवल सिद्धानत निर्माण तक सीमित नही होना चाहिये।
  7. राजनीति के विद्वानों का राजनीतिकरण समय की आवश्यकता है। इससे परहेज करने की अवश्यकता नही है। इससे तात्पर्य यह है कि राजनीति के विद्वान राजनीतिक व्यवस्था की नीतियों के बदलाव में सक्रिय भूमिका निभायेंगे।

उक्त सात विशोषताओं का निहितार्थ यह है कि उत्तरव्यवहारवाद के अन्तर्गत राजनीति विज्ञान को अतिवैाानिकता से बाहर निकालकर सामाजिक सरोकारों से जोडा गया तथा उसे भैतिक विज्ञान के स्थान पर एक सामाजिक विज्ञान के रूप में स्वीकार किया गया।

उत्तर-व्यवहारवाद की वर्तमान स्थिति क्या है?

उत्तर-व्यवहारवाद के आने के बाद यह समझना भूल होगी की व्यवहारवाद का महत्व पूरी तरह समाप्त को गया है।

वर्तमान स्थिति यह है कि राजनीति विज्ञान के अध्ययन में व्यवहारवाद के तथ्यपरक अध्ययन तथा उत्तर-व्यवहारवाद के सामाजिक सरोंकारो के प्रति संवेदनशाीलता का मिला दिया गया है। इससे उत्तर-व्यवहारवाद की वतर्मान स्थिति की निम्न विशेषतायें स्पष्ट होती है-

  1. राजनीति विज्ञान के शोध में उन विषयों का चयन किया जाना चाहिये जो समाज के लिये महत्वपूर्ण हों।
  2. राजनीतिक शोध के द्वारा नये मूल्यों व आदर्शों की स्थापना की जा सकती है।
  3. राजनीतिक अध्ययन में नीतिगत निष्कर्ष भी निकाले जा सकते है।
  4. लेकिन उक्त आदर्श तथा नीतिगत निष्कर्ष तथ्यों पर आधारित होने चाहिये
  5. अतः वर्तमान में तथ्य आधारित वैज्ञानिक अध्ययन तथा उस अध्ययन की सामाजिक उपयोगिता दोनो का समान महत्व है।

अगर हम विचार करें तो व्यवहारवाद की वर्तमान स्थिति का भी यही उत्तर है, क्योंकि वर्तमान में राजनति  विज्ञान में व्यवहारवाद व उत्तर-व्यवहारवाद के सह-अस्तित्व को मान्यता अथवा स्वीकार्यता प्राप्त हो गई है।

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