विदेश नीति में बहुसंलग्नता अथवा बहु संरेखण (Multi-alignment) की नीति क्या है? क्या भारत बहुसंलग्नता की नीति पर चल रहा है?

बहुसंलग्नता की नीति का तात्पर्य किसी देश द्वारा ऐसी नीति का अनुशरण करना है, जिसके अन्तर्गत वह एक समय में विभिन्न तथा कई बार आपस में विरोधी राष्ट्रों के साथ अपनी साझेदारी व संबन्धों की स्थापना करता है। अगर मुख्य राष्ट्रों के मध्य अत्यिधक घ्रुवीकरण होता है तो बहुसंलग्नता की नीति का पालन करना कठिन होता है। इसीलिये शाीतयुद्ध काल (1945-1991) में बहुसंलग्नता की नीति दृष्टिगोचर नही होती है, क्योंकि विश्व दो तीव्र विरोधी गुटों में विभाजित था, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में द्विध्रुवीयता के नाम से जाना जाता है। लेकिन शाीतयुद्ध की समाप्ति के बाद आरंभ में लगभग एक दशक तक विश्व राजनीति में अमेरिका का वर्चस्व रहा, जिसे एकध्रुवीयता के नाम से जानते हैं। लेकिन 21वीं शताब्दी के आरंभ से ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था बहुध्रुवीयता की ओर अग्रसर है, क्योंकि अब राजनीतिक शक्ति का क्रेन्द्र केवल अमेरिका तथा रूस अथवा वर्तमान में चीन तक सीमित नही है, वरन भारत, जापान, जर्मनी, ब्राजील जैसे देश भी विश्व राजनीति में प्रभावी हो गये हैं। ऐसी स्थिति में बहुसंलग्नता की नीति का अनुशरण करना संभव है। अतः बहुसंलग्नता की नीति वर्तमान बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है।

क्या बहुसंलग्नता भारत की पूर्व की गुटनिरपेक्षता की नीति की विरोधी है?

दोनो में अन्तर अवश्य है, लेकिन ऐसा कहना उचित नही होगा कि बहुसंलग्नता की नीति पूर्व की गुटनिरपेक्षता की नीति की विरोधी है। वास्तव में बहुसंलग्नता की नीति, गुटनिरपेक्षता की नीति का विस्तार है। गुटनिरपेक्षता की नीति के अन्तर्गत भी किसी मामले पर गुण-दोष के आधार पर फैसला लिया जाता है। हां दोनो में इतना अनतर अवश्य है कि बहुसंलग्नता की नीति, गुटनिरपेक्षता की नीति की तुलना में अधिक व्यवहारिक, सक्रिय तथा वैचारिक प्रतिबद्धताओं से मुक्त है। उदाहरण के लिये गुटनिरपेक्षता की नीति में सैनिक गुटबन्दी से दूर रहने की बात एक वैचारिक धारणा थी, लेकिन वर्तमान में बहुसंलग्नता ऐसी किसी वैचारिक प्रतिबद्धता से बंधी हुई नही है। बहुसंलग्नता में संबन्धों का आधार केवल और केवल राष्ट्रीय हित है।

क्या भारत बहुसंलग्नता की नीति का पालन कर रहा है?

यह बात सच है कि भारत वर्तमान में बहुसंलग्नता की नीति का पालन कर रहा है। इस बात को निम्न आधारों पर सिद्ध किया जा सकता है-

प्रथम, भारत की सामरिक स्वायत्तता की नीति इस बात का समथर्न करती है कि भारत अपने महत्वपूर्ण हितों की पूर्ति के लिये स्वतंत्र निर्णय ले सकता है, तथा ऐसे मामलों में भारत किसी बाहरी शक्ति के दबाव में नही आयेगा। भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता की नीति के आधार अपने हितों की रक्षा के लिये किसी भी देष से संबन्ध बाने के लिये स्वतंत्र है।

दूसरा, भारत वर्तमान में प्रत्येक प्रकार के आपस में विरोधी संगठनों का सक्रिय सदस्य है। उाहरण के लिये जहां भारत अमेरिका तथा पश्चिमी देशों से सामिरक साझेदारी बनाये हुये है तथा जी-20, जी-7, तथा क्वाड जैसे संगठनों में भाग ले रहा है, वही दूसरी ओर भारत इनके विरोधी रूस के साथ भी अपनी सामरिक साझेदारी बनये हुये है तथा रूस व चीन के प्रभुत्व वाले संगठनों जैसे ब्रिक्स तथा शंघाई सहयेाग संगठन का भी सदस्य है। यही बात कई विरोधी देशों जैसे इजराइल व अरब देशों दोनो के साथ घनिष्ठ सगन्धों के बारे में भी कही जाती है।

तीसरा, भारत की विदेश नीति पहले की तुलना में इस समय अधिक व्यवहारमूलक है, जिसमें राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुये प्रत्येक मामले में गुण-दोष के आधर पर भारत द्वारा अपनी नीति का निर्धारण किया जाता है। उदाहरण के लिये भारत लोकतंत्र का समर्थक है लेकिन अपने व्यापक हितों की रक्षा के लिये भारत म्यांमार के सैनिक शासन के साथ भी अपने संबन्ध मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। इसी तरह भारत ने अफगानिस्तान की तालीबान सरकार को मान्यता नही प्रदान की है, लेकिन पाकिस्तान की कूटनीति को देखते हुये भारत ने भारत ने अफ्रानिस्तान की तालीबान सरकार के साथ भी आपसी लाभकारी संबन्ध स्थापित किये हैं।

निष्कर्षतः हम कह सकते है कि भारत बर्तमान में बहुसंलग्नता की नीति का अनुशरण कर रहा है तथा वर्तमान बहुध्रुवीय अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में यह एक सर्वथा उचित नीति है।

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