वैश्वीकरण समकालीन विश्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता रही है। आज वेश्विक मामलों का प्रत्येक पहलू वैश्वीकरण की प्रक्रिया से प्रभावित है। अतः वैश्वीकरण को समझे बिना विश्व की वर्तमान प्रकृति व गतिविधियों को समझना मुश्किल है। यद्वपि वैश्वीकरण की प्रक्रिया अत्यंत पुरानी है लेकिन ’वैश्वीकरण’ शब्द का प्रयोग 1980 के दशक के मध्य से तथा विशेषकर 1990 के दशक के मध्य से अधिक लोकप्रिय हुआ है।
सामान्य अर्थों में वैश्वीकरण का तात्पर्य विश्व स्तर पर वस्तुओं, सेवाओं, व्यक्तियों, विचारों तथा पूंजी के आदान-प्रदान की बारंबारता तथा मात्रा में वृद्धि की प्रक्रिया से है। दूसरे शब्दों में वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत विश्व के विभिन्न समुदायों और देशों के मध्य आदान-प्रदान की प्रक्रिया में तेजी से वृद्धि होती है। विभिन्न विद्वानों ने वैश्वीकरण की अलग-अलग परिभाषायें दी हैं।
मार्टिन अल्र्बो तथा एलिजाबेथ किंग के अनुसार, ‘‘वैश्वीकरण का तात्पर्य उन सभी प्रक्रियाओं से है, जिसमें विश्व के सभी लोग एक विश्व समाज में समाहित हो जाते है।’’
एन्थोनी गिडेन्स ने अपनी पुस्तक ’दी कान्सिक्वेन्सेस आफ माडरनिटी’ में लिखा है कि वैश्वीकरण का तात्पर्य ’’विश्व स्तर पर सामाजिक सम्बन्धों का इस प्रकार विस्तार है, जिससे दूर स्थित समाज आपस में जुड़े जाते है तथा स्थानीय घटनायें दूर की घटनाओं से प्रभावित होने लगती है।’’
डेविड हेल्ड ने अपनी पुस्तक ’ग्लोबल ट्रांसफारमेशन्स’ में माना है कि वैश्वीकरण स्थानीय, राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय प्रक्रियाओं को अंतिम चरण है। इसके अंतर्गत मानव सम्बन्धों का संगठन व संचालन विभिन्न क्षेत्रों व महाद्वीपों के स्तर पर होता है।
प्रसिद्ध पत्रकार थामस फ्रीडमैन ने वैश्वीकरण की बढ़ती प्रक्रिया के कारण वर्तमान विश्व को ’फ्लैट वल्र्ड’ अर्थात समतल विश्व की संज्ञा दी है।
इसी प्रकार विश्व के देशों व समुदायों में बढ़ती अन्तःक्रिया के कारण मैकलुहान ने विश्व को एक वैश्विक गांव (ग्लोबल विलेज) की संज्ञा दी है। इस प्रकार वैश्वीकरण का तात्पर्य विश्व के देशों, लोगों तथा समुदायों के मध्य बढ़ती हुई अन्तःक्रिया तथा आदान-प्रदान की प्रक्रिया से है।
वैश्वीकरण के कारण
जहां तक वैश्वीकरण के विकास का संबंध है, कुछ विद्वान इसे 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध की प्रक्रिया मानते है। जबकि कतिपय अन्य विद्वान यह मानते है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया का आरंभ तब हुआ, जब पुनर्जागरण के बाद वैज्ञानिक अविष्कारों के साथ-साथ विश्व के नये क्षेत्रों की खोज हुई। इसके विपरीत अन्य विद्वान वैश्वीकरण की प्रक्रिया का आरंभ ईसापूर्व तीसरी शताब्दी से मानते है, जब यूनान की सभ्यता का विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार किया गया। यह सत्य है कि विश्व के देशों तथा समुदायों के मध्य आदान-प्रदान की प्रक्रिया इतिहास मंे लगातार आगे बढ़ती रही है, लेकिन संचार के आधुनिक साधनों ने उसे एक नई गति और तीव्रता प्रदान की है। अतः वर्तमान रूप में वैश्वीकरण को 20वीं शताब्दी की एक विशिष्ट प्रवृत्ति मानना ही उचित है। वैश्वीकरण की वर्तमान प्रवृत्ति के उदय तथा विकास के निम्न कारण हैं-
1. संचार के नये साधनों का विकास- वर्तमान युग संचार क्रांति का युग है। प्रसिद्ध उपन्यासकार अल्विन टाफलर ने अपने उपन्यास ’थर्ड वेव’ में इसे तीसरी क्रांति की संज्ञा दी है। वर्तमान में संचार के नये दु्रतगामी साधनों जैसे- ईमेल, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, फैक्स तथा तीव्र गति वाले जेट विमानों का अविष्कार हुआ है, जिसके कारण विश्व के विभिन्न देशों व व्यक्तियों के मध्य विभिन्न स्तरों पर अन्तःक्रिया में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। संचार के आधुनिक साधनों के बिना वैश्वीकरण की प्रक्रिया मजबूती प्राप्त नही कर सकती।
2. राष्ट्रों के मध्य बढ़ती पारस्परिक निर्भरता– 20वीं शताब्दी के आरंभ से ही व्यापारिक सुरक्षा तथा सांस्कृतिक मामलों में राष्ट्रों के मध्य पारस्परिक निर्भरता का तेजी से विकास हुआ है। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध तथा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों के प्रबन्धन के लिए नयी वैश्विक संस्थाओं जैसे- लीग आफ नेशन्स 1920 व संयुक्त राष्ट्र संघ 1945 की स्थापना इसके प्रमुख उदाहरण है। राष्ट्रों के मध्य बढ़ती पारस्परिक निर्भरता ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को मजबूत आधार प्रदान किया है।
3. वैचारिक कारण तथा सोवियत रूस का विघटन- 20वीं शताब्दी में विश्व मंे दो प्रमुख आर्थिक विचारधाराओं- पूंजीवाद तथा समाजवाद का अस्तित्व रहा है। पूंजीवाद जहां निजीकरण व बाजारू शक्तियों की प्रमुखता पर आधारित है, वहीं समाजवाद उत्पादन व वितरण के साधनों पर राज्य के नियन्त्रण की धारणा पर आधारित है। पूंजीवाद में बाजार के प्रभाव के कारण प्रतियोगिता का तत्व अधिक प्रबल है। परम्परागत रूस से पश्चिमी देश पूंजीवाद के समर्थक रहे है तथा सोवियत संघ व पूर्वी यूरोप के देश समाजवाद के पोषक रहे है। 1991 में ही सोवियत संघ के विघटन के साथ-साथ समाजवादी अर्थव्यवस्था का भी अंत हो गया तथा उसके स्थान पर नव-उदारवादी विचारधारा पर आधारित पूंजीवाद का वर्चस्व स्थापित हो गया।
प्रसिद्ध विद्वान फ्रांसिस फुकुयामा ने इसे ’इतिहास के अंत अर्थात एण्ड आफ हिस्ट्री की संज्ञा दी है। वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया नव-उदारवादी विचारधारा से प्रेरित तथा पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित है। निजीकरण, आर्थिक उदारीकरण, बाजारू प्रतियोगिता आदि इसकी प्रमुख विशेषतायें है। अतः 1990 के दशक में नव-उदारवाद तथा पूंजीवादी विचारधाराओं ने वैश्वीकरण को नयी गति प्रदान की है।
वैश्वीकरण के तीन आयाम
वैश्वीकरण के निम्नलिखित तीन आयाम माने जाते हैं।
1. राजनीतिक आयाम
वैश्वीकरण का राजनीतिक आयाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैश्वीकरण के कारण जहां राज्य की क्षेत्रीय संप्रभुता प्रभावित हुई है वहीं उसका कार्यक्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। इस संबंध में तीन बिन्दु उल्लेखनीय है-
अ. राज्यों की क्षेत्रीय संप्रभुता का ह्रास- वैश्वीकरण के अंतर्गत आधुनिक संचार साधनों ने राज्य की संप्रभुता को प्रभावित किया है। आज विश्व में अनेक ऐसी घटनायें हो रही है, जो राज्य के नियन्त्रण से बाहर है तथा राज्य उन पर अपनी संप्रभुता का प्रभावी प्रयोग नही कर सकता।
ब. राज्य के कल्याणकारी कार्यों में कमी- वैश्वीकरण की प्रक्रिया आर्थिक उदारीकरण व बाजारू प्रतियोगिता पर आधारित है। जिसे निजीकरण के द्वारा व्यवहारिक रूप दिया जाता है। आर्थिक क्षेत्र में राज्य की भूमिका की कमी के साथ-साथ उसकी कल्याणकारी भूमिका भी कम हुई है।
स. परा-राष्ट्रीय संस्थाओं का बढ़ता महत्व- राष्ट्रों के मध्य बढ़ती पारस्परिक निर्भरता के कारण विश्व मामलों को प्रबन्धन अब एक वैश्विक मुद्दा बन गया है। विश्व की वर्तमान चुनौतियांे जैसे- मानवाधिकारों को उल्लंघन, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक संकटों का समाधान आदि के लिए नयी परा-राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की जा रही है। विश्व अर्थव्यवस्था के प्रबन्धन में विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, जी-20 समूह आदि की भूमिका का विस्तार हुआ है। प्रत्येक राष्ट्र को अपने आन्तरिक मामलों का संचालन भी वैश्विक मापदण्डों के अनुसार करना पड़ रहा है।
2. आर्थिक आयाम
वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण व दृष्टिगोचर है। निजीकरण, उदारीकरण तथा बाजारू प्रतियोगिता ने विश्व अर्थव्यवस्था को नया रूप दिया है। इनका विवरण निम्नलिखित हैं-
अ. विश्व व्यापर तथा निवेश में वृद्धि- वैश्वीकरण के युग में व्यापारिक उदारीकरण के कारण राष्ट्रों के मध्य व्यापार तथा निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। विश्व व्यापार संगठन द्वारा व्यापार व निवेश के नियम भी उदार बनाये जा रहे है। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में हुई थी। इसके द्वारा 2001 में व्यापार नियमों को सरल बनाने के लिये दोहा व्यापार वार्ताओं का आरंभ किया गया था, जिसके अन्तर्गत अबतक विश्व के देशों मध्य मंत्रिमण्डलीय स्तर की 9 चक्र की वातायें संपन्न हो चुकी हैं। 9वें चक्र की वार्तायें दिसम्बर 2013 में इण्डोनेशिया के शहर बाली में संपन्न हो चुकी है। विश्व व्यापार संगठन द्वारा आयोजित वार्ताओं में सेवाओं, बौद्धिक सम्पदा तथा निवेश को भी शामिल कर लिया गया है। आरंभ में विकासशील तथा गरीब देशों ने बौद्धिक सम्पदा तथा सेवाओं में व्यापार को वैश्विक वार्ताओं में शामिल करने का विरोध किया था।
वैश्वीकरण के अंतर्गत प्रत्येक राष्ट्र की विदेश नीति का उद्देश्य अपने व्यापार तथा निवेश को बढ़ाना है। इसी कारण इस क्षेत्र में राष्ट्रों के मध्य तीव्र प्रतियोगिता देखी जा रही है। कई राष्ट्रों ने आपसी व्यापारिक लाभ के लिये द्विपक्षीय व बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों की व्यवस्था को लागू किया है जिसके अन्तर्गत समझौते में शामिल देश आपसी व्यापार में सभी प्रतिबन्धों को समाप्त कर देते हैं अथवा उनहें कम कर देते हैं। व्यापार व निवेश का उदारीकरण वैश्वीकरण की एक महत्वपूर्ण अर्थिक विशेषता है।
विश्व में व्यापार व निवेश के नियमों में अदारीकरण का लाभ उठाकर कई विकासशील देशों जैसे चीन, भारत दक्षिण कोरिया, इण्डोनेशिया, ब्रजील, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों ने गत दो दशकों में तीव्र आर्थिक प्रगति अर्जित की है तथा इन देशों की गणना आज विश्व की उभरती हुई शक्तियों में की जा रही है। विश्व अर्थव्यवस्था का केन्द्र अब यूरोप से खिसककर एशिया की ओर खिसक रहा है।
ब. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व आर्थिक गतिविधियों का वैश्विक स्वरूप– वैश्वीकरण के युग में आर्थिक उत्पादन तथा वितरण का रूप वैश्विक हो गया है। श्रम का विभाजन भी वैश्विक आकार ले रहा है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी आर्थिक गतिविधियों को उन क्षेत्रों में केन्द्रित कर रही है जहां उन्हें सस्ता श्रम तथा बड़ा बाजार उपलब्ध है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कंपनियां कईबार अपने कुछ कारोबार को सस्ते श्रम वाले देशों की कम्पनियों को स्थान्तरित कर देते हैं। इसे व्यापारिक भाषा में आउटसोर्सिंग कहा जाता है। इन कम्पनियों का नेटवर्क विश्व के कई देशों में फैला होता है। ये व्यापार, निवेश आदि के संबन्ध में अन्तराष्ट्रीय नियमों के आधार पर कार्य करती हैं। अतः जिन देशों में ये कार्य करती हैं उनका भी इनकी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नही होता है। इस प्रकार वैश्वीकरण में आर्थिक गतिविधियों का स्वरूप वास्तविक अर्थों में वैश्विक हो गया है।
स. बाजारू प्रतियोगिता का बढ़ता प्रभाव- वैश्वीकरण के वर्तमान युग में बाजारू प्रतियोगिता सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रवृत्ति है। उत्पादन, वितरण तथा कीमतों का निर्धारण बाजार के हिसाब से होता है। निजीकरण की प्रक्रिया ने विभिन्न देशों की घेरलू आर्थिक नीतियों को भी प्रभावित किया है। भारत ने भी 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की है, जिसके अंतर्गत अब तक राज्य के नियन्त्रण में रहे कई आर्थिक क्षेत्रों को निजी क्षेत्र में दे दिया गया है। बाजारू प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक प्रभावी है।
द. वस्तुओं व सेवाओं की वैश्विक उपलब्धता – वैश्वीकरण का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि आर्थिक प्रतियागिता के कारण सेवाओं व वस्तुओं की उत्पादन लागत में कमी आयी हैं तथा विश्व अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास हुआ है। इसका लाभ यह है कि उपभोक्ताओं को विश्व स्तरीय वस्तुयें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं।
3.सांस्कृतिक आयाम
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में गत 35 वर्षों में राष्ट्रों के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी तेजी आयी है। आज विद्वान विश्व संस्कृति की चर्चा कर रहे है। लेकिन यह विश्व संस्कृति अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की संस्कृति का बढ़ता हुआ प्रभाव है। आज सम्पूर्ण विश्व में विकसित देशों के सांस्कृतिक प्रतीक कोका कोला, मैकडोनाल्ड, शांपिग माल, वालमार्ट आदि का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आलोचकों ने इसे विश्व संस्कृति के अमेरिकीकरण अथवा पश्चिमीकरण की संज्ञा दी है। विकासशील और गरीब देशों में अपने सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने की चिन्ता भी बढ़ रही है। विश्व संस्कृति की यह बढ़ती हुई एकरूपता छोटी संस्कृतियों के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा है। वैश्वीकरण के युग में मूलनिवासी, आदिवासी तथा अन्य छोटे समूह अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित करने के लिये प्रयासरत हैं।
संचार के साधनों के विकास के कारण पश्चिमी सांस्कृतिक प्रतीकों का आदान-प्रदान तेजी से हो रहा है। वैश्विक संस्कृति विकासशील व गरीब देशों के सांस्कृतिक मूल्यों, आदर्शों तथा रूचियों को प्रभावित कर रही है। जो देश आर्थिक दृष्टि से संपन्न होते हैं वे गरीब व कमजोर देशों पर अपनी संसकृति को थोपने में सफल हो जाते है।
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक मूल्य नव-उदारवाद तथा पूंजीवाद की विचारधारा पर आधारित हैं। अतः वर्तमान में भौतिक प्रगति तथा व्यक्तिवाद की धारणाओं को बल मिला है। वर्तमान में निरन्तर बलवती हो रही उपभोक्तावादी संस्कृति वैश्वीकरण की देन है।
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