काक्रोच जनता पार्टी के 2026 के छात्र आन्दोलन से एक बार फिर जन आन्दोलनों की भूमिका चर्चा में है। इस आन्दोलन से भारत में सामाजिक व नीतिगत बदलाव में युवा शक्ति का अहसास होता है। वर्तमान में प्रत्येक राजनीतिक दल युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है। उक्त छात्र आन्दोलन भारत में उभर रहे नयेे सामाजिक आन्दोलन का ही एक रूप है। अतः इस लेख में नये सामाजिक आन्दोलनों की प्रकृति व स्वरूप का सैद्धान्तिक विवेचन गया है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह शान्तिपूर्ण विरोध का अवसर प्रदान करती है तथा समाज में शान्तिपूर्ण परिवर्तनों का अवसर प्रदान करती है। सामाजिक आन्दोलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की देन है। नये सामाजिक आन्दोलनों का तात्पर्य उन आन्दोलनों से है जो सामाजिक परिवर्तन के लिये आवश्यक नये सरोकारों को उठाते हैं नयी मागों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन का सामूहिक प्रयास करते हैं। इस अध्याय में भारत के कतिपय नये सामाजिक आन्दोलनों का अध्ययन किया जायेगा।
सामाजिक आन्दोलन क्या है?
सामाजिक आन्दोलन का तात्पर्य एक निश्चित उद्देश्य को प्राप्त किये जाने वाले सामूहिक प्रयास से है। इसका उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य को प्राप्त करना है। लोकतंत्र में सामूहिक प्रयास शांतिपूर्ण ही हो सकते है। अतः सामाजिक आन्दोलन के अन्तर्गत शांतिपूर्ण सामूहिक प्रयासों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का प्रयास किया जाता है। सामाजिक आन्दोलन की निम्न विशेषतायें हैं-
1. सामाजिक आन्दोलन एक गैर-सरकारी तथा जनता का स्वैच्छिक प्रयास है।
2. सामान्यतः यह आन्दोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था में संचालित होते है।
3. सामाजिक आन्दोलन एक सामूहिक प्रयास है।
4. सामाजिक आन्दोलन का उद्देश्य किसी सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति से होता है। जैसे- महिलाओं की स्थिति में सुधार, मानवाधिकारों की रक्षा, कमजोर वर्गों का कल्याण व विकास आदि।
5. आमतौर पर लोकतंत्र में यह आन्दोलन शांतिपूर्ण साधनों को अपनाते है, लेकिन यदा-कदा यह आन्दोलन हिंसक रूप भी ग्रहण कर सकते है।
नये सामाजिक आन्दोलन क्या है?
नये सामाजिक आन्दोलन सामाजिक आन्दोलन का ही एक रूप है। 1960 के दशक में पश्चिमी देशों में औद्वोगिक समाज के पश्चात की (Post-Industrial Society) परिस्तिथयों में जिन सामाजिक आन्दोलनों का उदय हुआ उन्हें नये सामाजिक आन्दोलन कहा जाता है। इन आन्दोलनों का नयापन इस बात में था कि इनका उद्देश्य पूर्व के आन्दोलनों (उदाहरण के लिये श्रमिक आनदोलन ) की भांति आर्थिक लाभ प्राप्त करना न होकर सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव अथवा किसी सामाजिक हित की पूर्ति करना होता है। उदाहरण के लिये महिलाओं अधिकारों की रक्षा पर्यावरण अथवा मानवाधिकारों की रक्षा के लिये चलाये गये आन्दोलनों को नये आन्दोलन कह जाता है। प्रसिद्ध विचारक हबरमास ने इन्हे ’नई राजनीति’ की संज्ञा दी है।भारत में इस तरह के आन्दोलनों का विकास 1970 के दशक में आपातकाल की परिस्थिति में नागरिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था। तब से लेकर अब तक भारत में सामाजिक हितों की पूर्ति के लिये ऐसे आन्दोलनों का निरन्तर विकास होता रहा है। ये आन्दोलन भारत में नागरिक समाज अथवा सिविल सोशायटी के विकास का भी अ्रग हैं। नागरिक समाज का तात्पर्य सामाजिक हित में किये गये सभी गैर-सरकारी प्रयासों से है। नागरिक समाज जितना विकसित होगा, सरकार की मनमानी पर उतना ही अंकुश लगेगा तथा लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
नये सामाजिक आन्दोलन तथा पुराने सामाजिक आन्दोलनों में क्या अन्तर है?
1. पुराने आन्दोलनों के विपरीत नये सामाजिक आन्दोलनो का उद्देश्य आर्थिक लाभ न होकर सामाजिक व सांस्कृतिक हितो की पूर्ति करना होता है।
2. नये आन्दोलन स्वैच्छिक आधार पर चलाये जाते हैं। लोक हित से इनका संबन्ध होने के कारण इन्हें जनता का अपने आप समर्थन प्राप्त होता है।
3. पुराने आन्दोलनों के विपरीत नये आन्दोलनों का संगठन शिथिल होता है। इनका कोई औपचारि कसंगठन नही होता। जब तक जनता का समर्थन प्राप्त होता रहता है, ये आन्दोलन स्वतः चालते रहते हैं।
4. ये आन्दोलन राजनीतिक नही होते और न ही किसी राजनीतिक विचारधारा से बंधे होते। इनके विचार इनके मुख्य मुद्दे के अनुसार होते है।
नये सामाजिक आन्दोलनों के उदय के क्या कारण हैं?
भारत में नये सामाजिक आन्दोलनों की शुरूआत 1970 व 1980 के दशक में हुई है। इन आन्दोलनों के उदय व विकास के निम्नलिखित कारण महत्वपूर्ण हैं-
1. आर्थिक असंतोष व असमानता- भारत में आजादी के बाद नियोजित विकास की रणनीति अपनाई गयी। आरंभ की तीन पंचवर्षीय योजनाओं में यद्यपि देश का आर्थिक विकास हुआ, लेकिन देश में गरीबी, बेरोजगारी तथा कुपोषण की समस्याओं का समाधान नही हो सका। विकास के साथ ही देश के विभिन्न वर्गों व क्षेत्रों में आर्थिक असमानता बढ़ी है। इन समस्याओं तथा असमानता के कारण समाज के विभिन्न वर्गों विशेषकर कमजोर वर्गों में सामाजिक असंतोष बढ़ा है। नये सामाजिक आन्दोलन इसी असंतोष की अभिव्यक्ति है।
2. राजनीतिक व्यवस्था की असफलता – भारत में जो लोकतंत्र का स्वरूप है, उसके संचालन में राजनीतिक दलों की मुख्य भूमिका है। लेकिन राजनीतिक दल आन्तरिक प्रजातंत्र के अभाव, भ्रष्टाचार तथा गुटबन्दी जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। अतः आजादी के बाद जिस राजनीतिक संस्कृति का विकास हुआ, उससे जनता का मोह भंग होने लगा। 1975 में देश में आपात काल को लागूकिया गया। आपात काल देश की सामाजिक व आर्थिक समस्याओं के समाधान में राजनीतिक व्यवस्था की असफलता का प्रतीक है। इसने भारतीय लोकतंत्र के समथा नई चुनौती खड़ी कर दी। राजनीतिक क्रियाकलापों पर रोक लगा दी गयी। इस परिप्रेक्ष्य में भारत में नये नागरिक समाज संगठनों के विकास का अवसर प्राप्त हुआ। नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु कई स्वैच्छिक संगठन इस काल में गठित किये गये।पुनः राजनीतिक व्यवस्था द्वारा देश की महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान में न तो संवेदनशीलता का प्रदर्शन किया गया और न ही इन समस्याओं के प्रभावी समाधान के उपाय अपनाये गये। अतः इन समस्याओं के समाधान के लिए जनता को कतिपय नये उपायों की आवश्यकता अनुभव हुई। कई सामाजिक आन्दोलन इस तरह के उपायों के प्रतीक ही है।
3. जनता में बढ़ती जागरूकता- आजादी के भारत में लोकतंत्र के क्रियान्वयन, संचार माध्यमों के विकास तथा शिक्षा के विस्तार के कारण जन-जागरूकता में वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप जनता के विभिन्न वर्ग अपने अधिकारों तथा दायित्वों के प्रति अधिक सचेत हो गये है। ऐसे कमजोर वर्ग जो लम्बे समय तक शोषण के शिकार रहे है, उन्होंने अपने अधिकारों की मांग शुरू की है। दलित आन्दोलन इसी प्रकार का एक आन्दोलन है। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा तथा कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा में चलाये गये आन्दोलन काफी हद तक भारत में बढ़ती जन-जागरूकता का परिणाम है।
4. वैश्वीकरण तथा नई आर्थिक नीतियां- 1990 के दशक से पूरी दुनिया में वैश्वीकरण तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की जड़े मजबूत हुई है। भारत ने भी 1991 में उदारवादी आर्थिक नीतियों को अपनाया है। इन नीतियों के कारण जहां निजीकरण व बाजारू प्रतियोगिता को बढ़ावा मिला है, वहीं दूसरी तरफ कमजोर वर्गों के कल्याण में सरकार की भूमिका भी कम हुई है। इसके साथ ही वैश्वीकरण ने देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता को बढ़ावा प्रदान किया है। तीव्र आर्थिक विकास के साथ-साथ गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, क्षेत्रीय असंतुलन, पर्यावरण विघटन आदि की चुनौतियां खड़ी हो गयी है। अतः सामाजिक आन्दोलनों को चलाने के लिए नये मुद्दें व सरोकार सामने आ गये है। इन मुद्दों व चुनौतियों ने नये सामाजिक आन्दोलनों को गति प्रदान की है।
5. आधुनिक संचार माध्यम- भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के कारण आजादी के बाद से ही विभिन्न संचार माध्यमों को स्वतंत्रता प्राप्त रही है। लेकिन सूचना क्रांति के वर्तमान युग में नये संचार साधनों जैसे- इण्टरनेट, ई-मेल, कम्पयूटर, एस.एम.एस. आदि ने समाज में व्यक्ति तथा सामाजिक अन्तःक्रिया का दायरा बढ़ा दिया है। संचार के ये नये साधन नये सामाजिक आन्दोलनों के संचालव व विकास में सहायक है। 2011 व 2012 में अरब देशों में जो लोकतांत्रिक आन्दोलन चलाये गये हैं उनमें आन्दोलन को विस्तार देन तथा संगठित करने में नये संचार माध्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन लोकतांत्रिक आन्दोलनों को ‘अरब स्प्रिंग’ के नाम से जाना जाता है।
निष्कर्ष
भारत में नये सामाजिक आन्दोलनों का उदय और विकास 1970 के दशक से आरंभ होता है। इन आन्दोलनों द्वारा कई नये मुद्दों जैसे- पर्यावरण रक्षा, मानवाधिकार, महिलाओं तथा कमजोर वर्गों के अधिकार, भ्रष्टाचार आदि को उठाया गया है। चिपको आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, अन्ना हजारे का 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन, तथा काक्रोच जनता पार्टी का 2026 का छात्र आन्दोलन आदि नये सामाजिक आन्दोलनों के प्रमुख उदाहरण हैं। इन आन्दोलनों से हमें निम्न सीख प्राप्त होती हैं-
1. ये आन्दोलन भारत की लोकतांत्रिक राजनीति को समझने में सहायक है। इन्हें लोकतंत्र में समस्या न मानकर राजनीति का आवश्यक अंग समझा जाना चाहिए। वास्तव में बहुत से ऐसे सामाजिक समूह व उनके विशिष्ट हित है, जिनका समाधान चुनावी राजनीति के अंतर्गत नही हो सका था। अतः सामाजिक आन्दोलनों के माध्यम से इन सामाजिक समूहों के नये मुद्दों को उठाया गया है। अतः इन सामाजिक आन्दोलनों के कारण ही भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक संघर्ष तथा असंतोष की हिंसक अभिव्यक्ति की संभावना को कम किया जा सका है। इन आन्दोलनों ने लोकतंत्र मंे जनसहभागिता को व्यापक रूप प्रदान किया है तथा उसे मजबूत बनाने मंे सहायक सिद्ध हुये है।
2. इन आन्दोलनों में यदि जनसहभागिता के स्वरूप को देखा जाये तो स्पष्ट होता है कि इनमें मुख्य रूप से समाज के पिछड़े व कमजोर वर्गों की भागीदारी अधिक रही है। अतः ये आन्दोलन समाज के वंचित और कमजोर वर्गों के हितों की पूर्ति में काफी हद तक सहायक सिद्ध हुये है। इन आन्दोलनों के कारण ही कुछ सीमा तक कमजोर वर्गों की आवाज राजनीति की मुख्य धारा तक पहुंचने में सफल हो सकी है।
3. 1990 के दशक से भारत में वैश्वीकरण के अंतर्गत आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को अपनाया गया। वर्तमान में भारत के सभी राजनीतिक दल आर्थिक उदारीकरण की नीति को लागू करने में अपनी सहमति व्यक्त कर चुके है। लेकिन आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण समाज के कमजोर वर्गों पर जो विपरीत प्रभाव पड़ेगा, उसकी ओर राजनीति में अधिक ध्यान नही दिया जा रहा है। इन सामाजिक आन्दोलनों का एक प्रमुख योगदान यह है कि ये वैश्वीकरण तथा आर्थिक उदारीकरण के नकारात्मक परिणामों की ओर हमारा ध्यान खीचतें है तथा उसके समाधान के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करते है। अतः वैश्वीकरण के युग में इन आन्दोलनों का विशेष महत्व है।
4. नये सामाजिक आन्दोलनों मंे केवल विरोधी और सामूहिक कार्यवाही के तत्व ही शामिल नही है, बल्कि इनके द्वारा समाज के कमजोर वर्गों, महिलाओं आदि में उनके अधिकारों तथा भूमिका के प्रति जागरूकता भी उत्पन्न की गयी है। अतः इन आन्दोलनों ने भारत में लोकतंत्र के विस्तार में सहायता पहुंचाई है। नागरिकों की जागरूकता के बिना लोकतंत्र सफल नही हो सकता।
5. नये सामाजिक आन्दोलनों की एक प्रमुख भूमिका यह भी रही है कि इन्होंने उपेक्षित मुद्दों की ओर सरकार का ध्यान खीचने में सफलता प्राप्त की है। इन सामाजिक आन्दोलनों के कारण सरकार में जवाबदेही व खुलापन को बढ़ावा मिला है। अतः नये सामाजिक आन्दोलन सुशासन (ळववक ळवअमतदंदबम) की धारणा व्यावहारिक रूप देने के लिए आवश्यक है।
6. वर्तमान समय में सरकार (ळवअमतदउमदज), बाजार (डंतामज) तथा नागरिक समाज (ब्पअपस ैवबपमजल) को लोक व्यवस्था के तीन स्तम्भ माना गया है। नये सामाजिक आन्दोलन भारत में नागरिक समाज के विकास मंे सहायक है। नागरिक समाज का तात्पर्य उन सभी गैर-सरकारी संगठनों व सामूहिक प्रयासों से है, जो जनहित की पूर्ति का कार्य करते है। भारत में नागरिक समाज अभी शैशवास्था में है। ये आन्दोलन भारत में नागरिक समाज के मजबूत होते आधार का संकेत देते है तथा उसके विकास में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
7. लेकिन जहां तक सरकारी नीतियों का संबंध है, उनके निर्माण में इन आन्दोलनों की सीमित भूमिका रही है। इसका कारण यह है कि ये आन्दोलन किसी एक अथवा स्थानीय मुद्दें को लेकर चलाये गये है, जिसमें कई बार किसी एक विशिष्ट समूह क हितों की पूर्ति का प्रयास किया गया है। इसीलिए सरकार ने नीति निर्माण में इन आन्दोलनों की मांगों को शामिल करने का प्रयास नही किया। अतः आवश्यकता इस बात की है कि भारत के लोकतांत्रिक राजनीति में इस तरह के सामाजिक आन्दोलनों का एक व्यापक गठबन्धन तैयार हो। तभी नीति निर्माण में इनकी प्रभावी भूमिका को सुनिश्चित किया जा सकता है। अभी इस तरह के गठबन्धन के आसार नही दिखायी दे रहे है। भारत में राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी कमजोर वर्गों के सरोकारों के प्रति संवेदनशील नही है। अतः भारत में नये सामाजिक आन्दोलनों का दायरा सीमित रह गया है। भारत में नये सामाजिक आन्दोलनों तथा राजनीतिक दलों के बीच सम्बन्धों की कड़ी अत्यंत कमजोर है, जिससे मुख्य धारा की राजनीति में नये सरोकारों के प्रति शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की एक प्रमुख समस्या है। इस सम्बन्ध में एक नया विकास यह देखने में आया है कि कतिपय सामाजिक आन्दोलन ही राजनीतिक दल का रूप ग्रहण कर सकते है। उदाहरण के लिए 1985 में आसाम में चलाये गये अवैध अप्रचासी आन्दोलन से असम गण परिषद का उदय हुआ था। यह पार्टी आज भी असम राज्य में सक्रिय है। इसी तरह अन्ना हजारे द्वारा जो भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन 2011 में चलाया गया था, जिससे 2012 में आम आदमी पार्टी इसी का उदय हुआ। इस तरह के परिवर्तन के द्वारा राजनीतिक प्रक्रिया में सामाजिक सरोकारों को केन्द्रीय स्थान प्राप्त हो सकता है।
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