संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में परमाणु अप्रसार संधि पर 1968 में हस्ताक्षर किये गये थे। यह संधि 1970 में लागू की गई थी। इस संधि का मुख्य उदद्यदेश्य विश्व में परमाणु हथियारों व तकनीकि के फैलाव पर रोक लगाना था। इस संधि के द्वारा दुनिया के सभी देशों को दो वर्गों में बांट दिया गया- पांच परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र तथा अन्य सभी गैर- परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र। भारत को भी गैर- परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र माना गया। इस संधि की महत्वपूर्ण प्रावधान निम्नलिखित है-
1.गैर-परमाणु शक्ति संपन्न देश भविष्य में परमाणु हथियारों का निर्माण अथवा आयात नही कर सकते है।
2. परमाणु शक्ति सम्पन्न देश, गैर-परमाणु शक्ति संपन्न देशों को परमाणु हथियारों व तकनीकि का निर्यात अथवा हस्तांतरण नही करेंगे।
3. गैर-परमाणु शक्ति संपन्न देशों को यह अधिकार दिया गया था कि संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद वे अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी की देख-रेख में परमाणु ऊर्जा का केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिये प्रयोग अवश्य कर सकते हैं।
4. लेकिन इस संधि द्वारा परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्रों द्वारा परमाणु हथियारों के उत्पादन या भंडारण पर कोई रोक नही लगाई गयी।
तमाम दबाओं के बाद भी भारत ने निम्न कारणों से इस संधि पर हस्ताक्षर नही किये-
1.यह संधि भेद-भावकारी व पक्षपातपूर्ण है क्योंकि यह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों पर हथियार रखने व उत्पादन की रोक नही लगाती, जबकि यह गैर-परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों पर परमाणु हथियारो के उत्पादन या अर्जन पर रोक लगाती है।
2. भारत के अनुसार विश्व शान्ति के लिये सभी परमाणु हथियारों को समाप्त किया जाना अथवा सार्वभौमिक परमाणु निःशस्त्रीकरण आवश्यक है। लेकिन यह संधि परमाणु अथियारों को समाप्त करने की बजाय उनके विकास पर रोक लगाती है। संधि के बाद भी पांच बड़े देशों में परमाणु हथियारों का अस्तित्व बना रहेगा तथा विकास होता रहेगा।
3. भारत का तर्क है कि प्रत्येक देश को अपनी सुरक्षा का अधिकार है। चीन के परमाणु खतरे को देखते हुये भारत अपनी सुरक्षा के लिये परमाणु हथियारों का विकल्प बन्द नही कर सकता है। इस संधि पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त भारत का यह विकल्प बन्द हो जायेगा।
इस प्रकार उक्त तथ्यों के आलोक में भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नही किये। भारत के अलावा पाकिस्तान तथा इजराइल ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर नही किये हैं। उत्तरी कोरिया ने इस संधि पर हस्ताक्षर किये थे, लेकिन बाद में वह इस संधि से अलग हो गया है तथा 2006 में ही परमाणु हथियारों की क्षमता अर्जित कर ली है। बाद में भारत तथा पाकिस्तान ने भी परमाणु हथियारों की खमता अर्जित कर ली थी। समीक्षकों का मानना है कि इजराइल ने भी परमाणु क्षमता अर्जित कर ली है, लेकिन भारत, पाकिस्तान तथा उत्तरी कोरिया की भांति उसने इसकी घोषणा नही की है।
अतः वतर्मान (2026) में कुल 9 देशों को परमाणु परमाणु शक्ति संपन्न देश माना जाता है- पूर्व के पांच परमाणु शक्ति संपन्न देश- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस व चीन तथा नये चार देश- भारत, पाकिस्तान, इजराइल व उत्तरी कोरिया।
भारत ने सी0 टी0 बी0 टी0 अथवा व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर हस्ताक्षर क्यों नही किये हैं?
व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर 1996 में हस्ताक्षर किये गये थे लेकिन निधार्रित मात्रा में देशों द्वारा हस्ताक्षर न किये जाने के कारण यह संधि अभी तक प्रभाव में नही आ सकी है। इस संधि का उदद्येश्य परमाणु परीक्षण पर पूरी तरह रोक लगाना है। इसके पहले परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने के लिये 1963 में आंशिक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर हस्ताक्षर किये गये थे, लेकिन इसमें खामियां थी, क्यों कि इसमें भूमि के अन्दर परमाणु परीक्षण पर रोक नही थी। भारत ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर किये थे, लेकिन उसने 1974 में भूमि के अन्दर परमाणु परीक्षण किया था। अतः भारत के इस परीक्षण को 1963 की संधि का उल्लंघन नही माना गया था। इसी कमी को दूर करने के लिये 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि अपनाई गयी थी।
भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि पर हस्ताक्षर इस लिये नही किये कि इस संधि द्वारा उन देशों के हथियारों पर कोई प्रतिबन्ध या कटौती नही की गई थी जिन्होने पूर्व में कई परमाणु परीक्षण कर परमाणु हथयारों की क्षमता अर्जित कर ली थी तथा उन्हें नये हथियार बनाने के लिये किसी नये परीक्षण की आवश्यकता नही थी। भारत विश्व शांति के लिये सभी परमाणु हथियारों की समाप्ति का पक्षधर है। भारत का मानना है कि परमाणु हथियारों पर आंशिक रोक लगाने से परमाणु हथियारों का खतरा समाप्त नही होगा। अमेरिका ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर नही किये हैं। दूसरा, चीन के परमाणु खतरे को देखते हुये भारत को अपनी सुरक्षा के लिये परमाणु हथियारों का विकल्प खुला रखना आवश्यक है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत द्वारा परमाणु अप्रसार संधि, 1968 तथा व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि, 1996 दोनो पर हस्ताक्षर न करने के तर्क लगभग एक जैसे हैं। भारत की नीति यह है कि परमाणु हथियारों को पूरी तरह से समाप्त किया जाये (सार्वभौमिक निःशस्त्रीकरण), तथा इन पर रोक लगाने के उपाय भेद-भावकारी नही होने चाहिये।
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