राष्ट्रों द्वारा सैनिक शक्ति के प्रयोग के संबन्ध में नियमों की व्यवस्था संयुक्तराष्ट्र चार्टर के अन्तर्गत की गई है। इस संबन्ध में निम्न बिन्दु महत्वपूर्ण हैं-
अ. आम परिस्थितियों में राष्ट्रों द्वारा आपसी संबन्धों में शक्ति का प्रयोग बजिर्त है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर की धारा 2 (4) में यह कहा गया है कि सदस्य देश आपसी संबन्धों में सैनिक शक्ति का प्रयोग नही करेंगे और न ही शक्ति के प्रयोग की धमकी देंगे।
ब. केवल आत्मरक्षा के लिये राष्ट्रों द्वारा दूसरे देश के विरूद्ध कतिपय सैनिक शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
चार्टर की धारा 51 के अनुसार एक देश द्वारा केवल अपनी आत्म रक्षा के लिये ही दूसरे देश के विरूद्ध शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। इसधारा के अनुसार प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत थवा सामूहिक तौर पर अपनी सुरक्षा के उपाय अपनाने का अधिकाकर है। इसी धारा के अन्तगर्त ही सामूहिक सुरक्षा के नाम पर नाटो जैसे संगठनों का गठन किया गया है।
लेकिन आत्म- रक्षा के अधिकार के अन्तर्गत सैनिक शक्ति के प्रयोग पर धारा 51 में निम्न शर्तें भी लगायी गयी हैं-
- कोई देश दूसरे देश के विरूद्ध तभी सैनिक शक्ति का प्रयोग कर सकता है जब उसके विरूद्ध दूसरे देश द्वारा सैनिक आक्रमण किया गया हो।
- सैनिक शक्ति का प्रयोग उतनी मात्रा में किया जाना चाहिये जो अपनी रक्षा के लिये आवश्यक है। आश्यकता से अधिक शक्ति का प्रयोग बर्जित है।
- आ-त्म रक्षा में की गई उक्त सैनिक कार्यवाही की सूचना तत्काल सुरक्षा परिषद को दी जानी चाहिये तथा उसके बाद सुरक्षा परिषद के निर्देशों के अनुसार आगे की कार्यवाही संपन्न होगी।
इस प्रकार आत्म-रक्षा का अधिकार देशों को व्यक्तिगत तौर तथा सामूहिक दोनो तौर पर प्राप्त है। सामूहिक तैार का मतलब यह है कि सदस्य देश आत्म रक्षा के लिये नाटो जैसे सामूहिक संगठन भी बना सकते हैं।
क्या ईरान पर अमेरिका का फरवरी 2026 में किया गया आक्रमण कानून रूप से उचित है?
उक्त आत्म रक्षा के अधिकार के अनुसार अमेरिका द्वारा ईरान के विरूद्ध आक्रमण गैर-कानूनी है, क्योंकि अमेरिका के विरूद्ध पहले ईरान ने कोई आक्रमण् नही किया था, जिससे अमेरिका की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया हो।
लेकिन अमेरिका ने आत्म रक्षा के अधिकार की तोड़मरोड़ कर व्याख्या की है तथा अपने आक्रमण को उचित ठहराया है। इसके लिये अमेरिका ने एक नया सिद्धान्त प्रतिपादित किया है, जिसे संभावित आत्म रक्षा (प्रोस्पेक्टिव सेल्फ-डिफेन्स) का सिद्धान्त कहा जाता है। इसके अनुसार अमेरिका का तर्क है कि उसे ईरान के परमएणु हथयारों से भविष्य मे खतरा हो सकता था, इसीलिये उसने ईरान पर आक्रमण किया है। लेकिन समीक्षकों ने अमेरिका के तर्क को गलत माना है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर केवल उसी स्थिति में किसी देश को दूसरे देश के विरूद्ध सैनिक याक्ति के प्रोग की अनुमति देता है जब उसके विरूद्ध वर्तमान में वास्तव में आक्रमण हुआ हो। इसमें भविष्य में हाने वाला संभावित आक्रमण शामिल नही है।
स. क्या मानवीय आधार (Humanitarian Ground) पर एक देश दूसरे देश के विरूद्ध सैनिक शक्ति का प्रयोग कर सकता है?
मानवीय आधार पर सानिक हस्तक्षेप से तात्पर्य यह है कि यदि किसी देश में नरसंहार हो रहा हो अथवा मानवाधिकारों का व्यापक उल्लंघन हो रहा हो तो क्या दूसरे देश वहां सैनिक हसतक्षेप कर सकते हैं अथवा नहीं।
मानवीय आधार पर दूसरे देश के विरूद्ध सैनिक शक्ति के प्रयोग का विचार अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अन्तर्गत विवादास्पद है। इस प्रकार के सैनिक हस्तक्षेप की स्पष्ट व्यस्था संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में नही की गई है।
इस संबन्ध में नियमों का विकास हो रहा है। इस संबन्ध में सर्वमान्य नियम यह है कि किसी देश दरा दूसरे देश के विरूद्ध मानवीय आधार पर सैनिक हस्तक्षेप नही किया जा सकता है।
इस प्रकार का हस्तक्षेप केवल सामूहिक रूप से केवल दो परिस्थितियों में किया सकता है-
- पहला सुरक्षा परिषद द्वारा, यदि सुरक्षा परिषद इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि किसी देश में मानवीय स्थिति इतनी खराब है कि उससे विश्व शान्ति को खतरा उत्पन्न हो गया है।
- वर्ष 2005 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित रिस्पान्सिबिलिटी टू प्रोटेक्ट (Responsibility to Protect- R2P) के आधार पर। इस प्रस्ताव में यह व्यवस्था की गई है कि चार स्थितियों- सामूहिक नरसंहार, जातीय सफाई, युद्ध अपराध, तथा मानवता के विरूद्ध अपराध, (genocide, war crimes, ethnic cleansing, and crimes against humanity) में संयुक्त राष्ट्र की देख रेख में सामूहिक सैनिक कार्यवाही सैकी जा सकती है।
लेकिन किसी भी स्थिति में मानवीय आधार पर सैनिक हसतक्षेप का अधिकार किसी एक देश को प्राप्त नही है।
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