सुशासन की धारणा का विकास
भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कम सरकार, अधिक शासन‘ (Minimum Government, More Governance) का उद्घोष किया है। इस संबन्ध में सरकार, शासन, तथा सुशासन की धारणाओं को समझना आवश्यक है।
गत तीन दशकों से भारत तथा विश्व स्तर पर नौकरशाही व प्रशासन के संबन्ध में सुशासन अथवा गुड गवर्नेन्स (Good Governance) की धारणा की चर्चा हो रही है। यह धारणा विश्व स्तर पर चल रही वैश्वीकरण निजीकरण तथा उदारीकरण की प्रवृत्ति का परिणाम है। साथ ही संचार के नये साधनों ने भी प्रशासन की भूमिका व कार्यप्रणाली को प्रभावित किया है। वैश्वीकरण के कारण निजी क्षेत्र और बाजार की भूमिका बढ़ गयी है तथा उसी तुलना में राज्य व सरकार की भूमिका प्रभावित हुई है। भारत सहित सभी देशों में वैश्वीकरण के साथ समायोजन के लिए आर्थिक उदारीकरण की नीतियां अपनाई जा रही है। बाजरू प्रतियोगिता के आने से राज्य को भी अपनी सेवा प्रदान करने वाली प्रणालियों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। इनके प्रबन्धन के लिए नई तकनीकों का विकास हो रहा है। नव-लोक प्रबन्धन (New Public Management-NPM) इसी का परिणाम है। इसी के साथ बाजार और प्रशासन दोनो के केन्द्र में व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। नागरिक समाज संगठनों का भी महत्व राज्य के कार्यक्षेत्र में कमी के कारण बढ़ा है। अतः वर्तमान में सरकार, बाजार तथा नागरिक समाज के बीच बेहतर समायोजन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। सुशासन की धारणा इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विकसित की गयी है।
शासन (Governance) तथा सरकार (Government) में क्या अन्तर है?
वर्तमान सन्दर्भ में शासन (Governance) का विचार पहली बार 1989 में विश्व बैंक की रिपोर्ट में शामिल किया गया था। हालांकि पियरे और पीटर के अनुसार इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांस में 14वीं शताब्दी में किया गया था तथा उस समय इसका तात्पर्य सरकार से ही था। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विश्व बैंक ने दक्षिणी अफ्रीका के देशों में विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा लागू किये गये वित्तीय सुधारों की असफलता के उपरान्त एक नये व वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में शासन के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया था।
इस धारणा को समझने के लिए शासन तथा सरकार के अंतर को समझना आवश्यक है। शासन सरकार की तुलना में अधिक व्यापक धारणा है क्योंकि इसमें निर्णय-निर्माण में सरकार के अतिरिक्त बाजार तथा नागरिक समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। रोजीनो के शब्दों में ‘शासन सरकार की तुलना में अधिक व्यापक परिदृश्य को समेटे हुए है। इसकी प्रक्रिया में सरकारी संस्थाओं के साथ अनौपचारिक तथा गैर-सरकारी अभिकरण व संस्थायें शामिल होती है।’ अतः शासन की प्रक्रिया में सरकार केवल एक तत्व है। केटल ने सरकार और शासन में अंतर करते हुए लिखा है कि सरकार का सम्बन्ध सरकारी संस्थाओं के कार्य और ढ़ांचे से है जबकि शासन का तात्पर्य उस तरीके से है जिसके द्वारा यह कार्य सम्पन्न किया जाता है। संक्षेप में शासन का संबन्ध सरकार के आउटकम से है।
बोलचाल की भाषा में हम कह सकते है कि सरकार में जहां केवल सरकार की संस्थायें तथा ढ़ाचे शामिल है, वहीं शासन में सरकार की प्रक्रियायें तथा उनका प्रभाव या आउटकम शामिल है। सरकार औपचारिक ढ़ांचा है लेकिन सरकार उसका प्रभाव तथा परिणाम है।
इस संबन्ध में भारत के प्रधानमंत्री मोदी के उद्घोष- ‘कम सरकार, अधिक शासन‘ (minimum government, maximum governance) पर विचार करना आवश्यक है। इस उद्घोष का तात्पर्य यह है कि सरकार के ढ़ांचे तथा कर्मचारी कम हो तथा उनके कार्य का परिणाम अथवा आउटकम अधिक हो। कुल मिलाकर शससन की धारणा सरकार के आकार की बजाये उसके आउटकम या परिणामों पर ध्यान केन्द्रित करती है।
सुशासन की परिभाषा व विशेषतायें
सुशासन का विचार भी विश्व बैंक द्वारा सबसे पहली बार 1992 में प्रकाशित अपनी वार्षिक रिपोर्ट में दिया गया था। विश्व बैंक के अनुसार सुशासन का तात्पर्य किसी देश में विकास के लिए आर्थिक व सामाजिक संसाधनों के प्रबन्धन के संदर्भ में शक्ति के प्रयोग के तौर-तरीके से है। विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘गवर्नेन्स तथा डेवलपमेन्ट’ में एक मजबूत और समतापूर्ण विकास के लिए उचित वातावरण तैयार करने के साधन के रूप में सुशासन की चर्चा की गयी थी तथा इसे अच्छी आर्थिक नीतियों का आवश्यक अंग माना गया था।
प्रसिद्ध विद्वान लेफ्टविच के अनुसार, ‘‘सुशासन में एक दक्ष लोकसेवा, एक स्वतंत्र न्यायपालिका तथा अनुबन्ध को लागू करने वाला ठोस कानूनी फ्रेमवर्क, जवाबदेह प्रशासन, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी एक स्वतंत्र लोक लेखा परीक्षण, सरकार के प्रत्येक स्तर पर कानून तथा मानव अधिकारों का सम्मान, एक बहुलवादी संस्थागत ढ़ांचा तथा स्वतंत्र संचार माध्यम शामिल है।
सुशासन की विशेषतायें
सुशासन का सम्बन्ध सशक्तीकरण, सहभागिता, जवाबदेही, समता तथा न्याय के द्वारा शासन की गुणवत्ता को बढ़ाना है। विश्व बैंक अनुसार सुशासन के मुख्य तत्व हैं- राजनीतिक जवाबदेही; शासन की प्रक्रिया के सम्बन्ध में समुदाय बनाने और भागीदारी की स्वतंत्रता; मानव अधिकारों तथा सामाजिक न्याय की सुरक्षा के लिए विधि के शासन व न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित कानून प्रणाली; नौकरशाही की जवाबदेही जिसमें प्रशासन में खुलापन शामिल है; सरकार के नीतियों के निर्माण, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन के सम्बन्ध में सूचना की स्वतंत्रता; प्रशासनिक दक्षता एवं प्रभावशीलता तथा सरकार व नागरिक समाज संगठनों के बीच सहयोग। इस प्रकार विश्व बैंक के अनुसार यदि कोई शासन उक्त विशेषताओं से युक्त है तो उसे सुशासन कहा जायेगा। दूसरे शब्दों में, एक विशेष प्रकार का शासन ही सुशासन है। विभिन्न विद्वानों के विचारों के आधार पर सुशासन की निम्नलिखित आठ विशेषताओं का उल्लेख किया जा रहा हैं-
1. सहभागिता- सुशासन के अंतर्गत नागरिकों तथा नागरिक समाज संगठनों को सरकार के निर्णय-निर्माण में भाग लेने के लिए आवश्यक सुविधायें व स्वतंत्रतायें प्रदान की जाती है। उनके हितों को इस प्रकार निर्मित नीतियों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है।
2. विधि का शासन- सुशासन में सत्ता के दुरूपयोंग के लिए स्थान नही है। इसमें सत्ता का प्रयोग निर्धारित कानूनों के अनुसार होना चाहिए तथा कानूनों को लागू करने के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका भी होनी चाहिए, जिससे लोगो में शासन के प्रति विश्वास उत्पन्न हो सके।
3. खुलापन- सुशासन सरकारी प्रक्रियाओं व गतिविधियों में खुलेपन अथवा पारदर्शिता का हिमायती है। खुलेपन का विचार इस तर्क पर आधारित है कि सरकारी निर्णयों से जो लोग प्रभावित होते है, उन निर्णयों के बारे में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। इससे नागरिकों को सरकार की गतिविधियों पर निगरानी करने का अवसर प्राप्त होगा।
4. संवेदनशीलता (Responsiveness)- पहले सरकार में निर्णय निर्माण में सभी प्रभावित पक्ष भाग नही लेते थे। वर्तमान समय में तर्क यह है कि जो लोग सरकारी निर्णयों से प्रभावित है, सरकार उनकी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील रहे। अर्थात सुशासन में सरकार को नागरिकों की आवश्यकताओं की अनदेखी नही करनी बल्कि उसे अपनी गतिविधियों के केन्द्र में रखते हुए उसकी जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता का दृष्टिकोण अपनाना है।
5. समता तथा समेकन (Equity and Inclusion)- किसी समाज का वास्तविक कल्याण इस बात पर निर्भर करता है कि उसका प्रत्येक सदस्य व वर्ग यह अनुभव करे कि शासन में उसकी भी भागीदारी है। वह शासन से अपने को अलग अनुभव न करे। अतः सुशासन का उद्देश्य समता और समेकन को अपनाते हुए सभी को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है।
6. दक्षता और प्रभावशीलता (Efficiency and Effectiveness) – सुशासन और नव-लोकप्रबन्ध दोनो संसाधनों के प्रयोग में दक्षता व प्रभावशीलता के पक्षधर है। सुशासन परिणामोन्मुखी है तथा वह प्रशासनिक कार्यों में कुशलता व प्रभावशीलता की दृष्टि से सुधार चाहता है।
7. जवाबदेही (Accountability)- जवाबदेही सुशासन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इसमें केवल सरकारी संस्थाओं की नही बल्कि बाजार तथा नागरिक समाज संगठनांे की जवाबदेही को भी सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। इसके पीछे मुख्य विचार यह है कि यदि सरकार के पास नीतियों को बनाने तथा लागू करने की शक्ति है तो उनके प्रति जवाबदेह होना चाहिए, जिन्हें ये नीतियां प्रभावित करती है। उल्लेखनीय है कि खुलापन और विधि के शासन के अभाव में जवाबदेही को लागू नही किया जा सकता।
8. मौलिक लक्ष्यों पर आम सहमति- सुशासन के अंतर्गत एक समाज के विभिन्न हितों और समुदायों के बीच समाज के मौलिक लक्ष्यों के प्रति आम सहमति का विकास किया जाता है। इस आम सहमति में जीवन्त, मानव विकास तथा उसे प्राप्त करने के साधनों पर विभिन्न हितों व समुदायों में आम सहमति प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
सुशासन की आधारभूत शर्तें
विश्व बैंक के अनुसार सुशासन की उक्त सभी विशेषतायें एक-दूसरे से सम्बन्धित है तथा एक-दूसरे की प्रभावशीलता को बढ़ाती है। चूंकि वर्तमान में विश्व के कई देश सुशासन की स्थापना के लिए अपने यहां पर प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव का प्रयास कर रहे है, अतः विश्व बैंक ने इन प्रयासों की सफलता के लिए कतिपय पूर्व शर्तों का उल्लेख किया है, जिनका विवरण निम्नलिखित हैं-
1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित ऐसी कानूनी व्यवस्था जो बाजार की कार्यप्रणाली को सुविधाजनक बनाती हो।
2. लोक नीतियों का ऐसा परिवेश जो आर्थिक विकास और गरीबी निवारण को प्रोत्साहित करता हो। इसके लिए आर्थिक व वित्तीय नीतियों का समायोजन में उदारीकरण जरूरी है।
3. मानव संसाधनों के विकास में सरकार द्वारा पर्याप्त निवेश किया जाना चाहिए। साथ ही ढ़ांचागत सुविधायंे भी विकसित होनी चाहिए।
4. सामाजिक सुरक्षा के उपायों द्वारा कमजोर वर्गों का संरक्षण होना चाहिए। 5. पर्यावरण का संरक्षण, ताकि आर्थिक विकास से पर्यावरण का विघ
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