यूरोपीय संघ का विकास कैसे हुआ? इसके उद्देश्य तथा प्रमुख अंग क्या हैं?

सन्दर्भ

26 जनवरी 2026 को भारत के गण्तंत्र दिवस में यूरोपीय संघ कर संस्था यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयन तथा यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा दोनो को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर 27 जनवरी 2026 को भारत -यूरोपीय शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया था तथा इसी दिन भारत व 27 देशों के संगठन यूरोपीय संघ के बीच एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते पर भी हस्ताक्षर किये गये। समीक्षकों ने इस समझौते को ‘मदर डील‘ की संज्ञा दी है, क्योंकि भारत सहित 28 देश शामिल हैं, जिनकी सम्मिलित जनसंख्या 2 बिलियन है तथा जिनका सम्मिलित सकल राष्ट्रीय उत्पाद 27 ट्रिलियन डालर है, जो विश्व के कुल सकल राष्ट्रीय उत्पाद की 25 प्रतिशत है।

उक्त सन्दर्भ में यूरोपीय संघ के विकास तथा संगठन को समझना आवश्यक है।

यूरोपीय संघ का विकास

एक आर्थिक समुदाय के रूप में यूरोपीय संघ की स्थापना एक लम्बे विकास का परिणाम है। इसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

अ.सहयोग का आरम्भ तथा रोम की संधि

यूरोप में आर्थिक एकीकरण व सहयोग की प्रक्रिया का आरम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से माना जाता है। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास 1950 में यूरोप के 6 देशों द्वारा यूरोपीय कोयला व स्टील समुदाय ¼European Coal and Steel Community) की स्थापना करके किया गया। ये 6 देश थे – बेल्जियम, इटली, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, लक्जमबर्ग, तथा नीदरलैण्ड। यूरोपीय कोयला व स्टील समुदाय का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के राष्ट्रीय कोयला और स्टील उद्योगों पर केन्द्रियकृत नियन्त्रण की व्यवस्था करना था। इस प्रयास को यूरोप में संघ की स्थापना को पहला कदम कहा गया है। बाद में 1957 में रोम की संधि के द्वारा कोयला व स्टील समुदाय के साथ-साथ अन्य आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया गया तथा इस संधि के द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय (European Economic Community)  की स्थापना की गई। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य इसके सदस्य देशों के मध्य व्यापार तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों में सहयोग को मजबूत करना था। रोम संधि के द्वारा ही कस्टम यूनियन तथा अणविक ऊर्जा के विकास में सहयोग हेतु यूरोपीय आणविक ऊर्जा समुदाय (European Atomic Energy Community)  की स्थापना की गई। ये सभी संस्थायें 1958 में रोम की संधि के प्रभावी होते ही अस्तित्व में आ गयी।

ब. सदस्यता का विस्तार

यूरोप के छः देश-बेल्जियम, इटली, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, लक्जमबर्ग, तथा नीदरलैण्ड यूरोपीय संघ के संस्थापक देश है। सहयोग की सफलता से प्रभावित होकर अन्य यूरोपीय देशों ने भी बाद में इसकी सदस्यता ग्रहण की। वास्तव में यूरोपीय आर्थिक समुदाय की सदस्यता में व्यापक विस्तार सोवियत साम्यवादी व्यवस्था के समाप्ति के बाद तब हुआ जब पूर्वी यूरोप के देशों तथा सोवियत संघ से टूट कर आये नये गणराज्यों ने लोकतंत्र तथा नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाया। परिणामतः पूर्वी यूरोप के देशों तथा पूर्व सोवियत गणराज्यों ने यूरोपीय संघ के सदस्य बन गये।

वर्तमान में 27 देश ही यूरोपीय संघ के सदस्य है।

            इस प्रकार यूरोपीय संघ ने उत्तर शीतयुद्ध काल में अपना विस्तार सम्पूर्ण यूरोप में कर लिया है। पूरब में इसकी सीमाएं सोवियत संघ तक पहुंच गयी है। तुर्की कों यूरोप का बीमार व्यक्ति कहा जाता है। वह लम्बे समय से यूरोपीय संघ की सदस्यता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत् रहा है परन्तु यूरोप से राजनीतिक व सांस्कृतिक भिन्नता के कारण उसे अभी तक उसे सदस्यता प्राप्त नही हो सकी।

स. यूरोपीय संघ में ढ़ाचागत बदलाव

वैश्वीकरण की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए यूरोपीय संघ के ढ़ांचे में भी परिवर्तन किया गया है तथा आवश्यकतानुसार सहयोग की नई संस्थाओं व प्रणालियों का विकास किया गया है। इनका उल्लेख नीचे किया गया है-

1. मास्ट्रिक्ट संधि, 1993- सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 1993 में लागू की गई इस सन्धि के द्वारा किये गये-

अण. ’यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ का नाम बदलकर इसका नया नाम ‘यूरोपीय समुदाय’ कर दिया गया।

2. संधि की व्यवस्था के अनुसार यूरोपीय संघ के कार्यक्षेत्र के तीन स्तंभ निर्धारित किए गए है। 2009 में लिस्बन संन्धि के लागू हाने के बाद इस कार्यक्षेत्र को बदलकर नई व्यस्था की गई है।

2. एमस्टरडम संधि, 1997 तथा नाइस सन्घि, 2001-  सन् 1997 में प्रभावी एमस्टरडम संधि तथा 2001 में प्रभावी नाइस  संधि द्वारा इन तीनों स्तंभों के आपसी अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन किया गया। एमस्टरडम संधि द्वारा तीसरे स्तंभ के अन्तर्गत आने वाले कतिपय मामलों जैसे राजनीतिक शरण, आव्रजन, तथा सिविल मामलों में न्यायिक सहयोग को पहले स्तंभ के अधिकार क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। 2009 में लिस्बन सन्धि के प्रभावी होने के बाद उक्त व्यवस्था भी अब समाप्त हो गई है।

3. लिस्बन सन्धि–  2007– यूरोपीय एकीकरण के ढ़ांचे में बदलाव की दृष्टि से यह संघि सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें यूरोपीय संघ का संविधान भी शामिल है। अतः इसे संवैधानिक संन्धि भी कहा जाता है। सभी सदस्य देशों के अनुमोदन के उपरान्त यह संधि 1 दिसम्बर 2009 को प्रभाव  में आ गई तथा इसके ही पूर्व की सभी सन्धियाँ समाप्त हो गई। इस संन्धि की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं-

1.   इस संधि के द्वारा यूरोपीय समुदाय का नाम बदलकर यूरोपीय संघ कर दिया गया, जो इसका वर्तमान नाम है। साथ ही संघ को एक स्वतंत्र कानूनी  व्यक्तित्व प्रदान किया गया। अतः अब यूरोपीय संघ अन्य देशों के साथ एक राष्ट्र की तरह संबंध स्थापित कर सकता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना स्वतंत्र प्रतिनिधित्व कर सकता है।

2.लिस्बन संधि के द्वारा यूरोपीय संघ के अधिकार क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित कर दिया।

(अ)  पहले भाग में यूरोपीय संघ के अनन्य अधिकार क्षेत्र (Exclusive Competence)  में आने वाले पांच विषयों को शामिल किया गया-

1. कस्टम यूनियन,

2. सदस्य देशों के आन्तरिक बाजार के संचालन हेतु आवश्यक प्रतियोगिता नियमों का निर्धारण करना,

3. उन सदस्य देशों की मौद्रिक नीति का निर्धारण जिन्होंने यूरो करेंसी को अपना लिया है, अब तक यूरोपीय संघ के 17 देशों ने यूरो को अपनी मुद्रा के रूप में अपना लिया है।

4. सामान्य मछली उत्पादन नीति के अन्तर्गत समुद्री जैविक संसाधनों के संरक्षण मामले,

5. सदस्य देशों के लिए सामान्य व्यवसायिक नीति।

 ये सभी मामले ऐसे है जिन में यूरोपीय संघ को अकेले ही कार्यवाही करने तथा अन्तर्राष्ट्रीय समझौते करने का अधिकार है।

(ब)  दूसरे भाग में उन मामलों को शामिल किया गया है जिन पर यूरोपीय संघ तथा सदस्य राष्ट्रों को साझा अधिकार क्षेत्र (Shared Competence) प्राप्त है। ये मामले दो प्रकार के है। प्रथम श्रेणी में वे मामले आते है जिन पर यदि यूरोपीय संघ ने अपन अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर लिया है तो बाद में सदस्य राष्ट्र अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नही कर सकते है। ये मामले है – सदस्य देशों के आन्तरिक बाजार, सामाजिक नीति, आर्थिक सामाजिक तथा क्षेत्रीय एकता, समुद्री जैविक संशाधनों को छोड़कर कृषि तथा मछली उत्पादन, पर्यावरण, उभोगता संरक्षण, यातायात, ट्रान्स यूरोपीय नेटवर्क, स्वतंत्रता सुरक्षा तथा न्याय के क्षेत्र तथा जनस्वस्थ्य के संबंध में सामान्य सुरक्षा के मामले। साझा अधिकार क्षेत्र की दूसरी श्रेणी में वे मामले आते है जिन पर यूनियन द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र को प्रयोग करने के बावजूद भी सदस्य देशों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया जा सकता है। इस श्रेणी में सम्मिलित मामले है – अन्तरिक्ष, तकनीकि, तथा विकास संबंधी शोध, विकास सहयोग तथा मानवीय सहायता।

(स)  तीसरे भाग में वे मामले सम्मिलित है जिनमें यूरोपीय यूनियन को सहयोगी अधिकार क्षेत्र (Supporting Competence) प्राप्त है। अर्थात जिनके बारे में यूरोपीय संघ सदस्य राज्यों को सहयोग देने के लिए उनके अनुसार कार्यवाही कर सकता है। ये मामले है – मानवीय स्वास्थ्य का सुधार एवं संरक्षण, उद्योग, संस्कृति, पर्यटन, शिक्षा, युवा खेलकूद एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण, नागरिक संरक्षण तथा प्रशासनिक सहयोग। वर्तमान में यूरोपीय संघ का उक्त ढ़ांचा ही कार्यरत है।

यूरोपीय संघ के उद्देश्य

            यूरोपीय संघ के मौलिक उद्देश्यों का उल्लेख लिस्बन संघि, 2007-2009 की प्रस्तावना तथा उसके अनुच्छेद 3 में किया गया है। ये उद्देश्य निम्नलिखित है-

1. यूरोप में शांति, जनकल्याण तथा यूरोपीय संघ के मूल्यों को प्रोत्साहित करना।

2. संघ के नागरिकों को स्वतंत्रता, सुरक्षा तथा न्याय प्रदान करना।

3. सदस्य राष्टों के मध्य आर्थिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करना।

4. यूरोपीय संघ की जनता के मध्य एकता को मजबूत करना तथा उसकी इतिहास, संस्कृति व परम्पराओं का सम्मान करना।

5. सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाना तथा उनके मध्य समनवय बनाते हुये एक आर्थिक और मौद्रिक संघ की स्थापना करना।

6. जीवन्त विकास के सिद्धान्त के आधार पर यूरोप में आर्थिक व सामाजिक उन्नति को बढ़ाना तथा आर्थिक एकीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करना।

7. यूरोपीय महाद्वीप में विभेदों को समाप्त करना तथा भविष्य के यूरोप के निर्माण के लिए ठोस आधार तैयार करना।

8.   यूरोपीय संघ में सामान्य सुरक्षा व विदेश नीति को लागू करना ताकि यूरोपीय पहचान मजबूत हो सकें तथा विश्व और यूरोप में शांति सुरक्षा व उन्नति को बढ़ावा मिल सकें।

यूरोपीय संघ के प्रमुख अंग तथा संस्थायें

यूरोपीय संघ के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये निम्न सात संस्थाओं की स्थापना की गयी है-

1.        यूरोपीय संसद (European Council) 751 सदस्यों वाली यूरोपीय संसद का निर्वाचन हर 5 साल बाद सदस्य देशों के नागरिकों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक सदस्य देश के लिए यूरोपीय संसद में सीटे आवंटित होती है। यद्यपि यूरोपीय संसद के सदस्यों का निर्वाचन राष्ट्रीय आधार पर होता है तथापि वे राष्ट्रीयता के आधार पर नही बल्कि एक राजनीतिक समूह के आधार पर कार्य करते है। यह यूरोपीय संघ का विधायी अंग है। संसद का मुख्य कार्य यूरोपीय संघ के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों के बारे में कानूनों का निर्माण व समयानुसार उनका संशोधन करना है। यह अपने विधायी कार्यों का निष्पादन यूरोपीय संघ की परिषद के साथ मिलकर करती है।

2. यूरोपीय परिषद (European Council) – यूरोपियन परिषद को यूरोपीय संघ की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता कहा जाता है, जबकि यूरोपीय संघ की परिषद संघ का अर्धविधायी अंग है। इसके द्वारा यूरोपीय संझा की नीतियों तथा प्राथमकिताओं का र्निधरण कयिा जाता है।

            यूरोपीय परिषद में इसका एक अध्यक्ष, यूरोपीय आयोग का अध्यक्ष तथा प्रत्येक देश से एक प्रतिनिधि होता है। यह प्रतिनिधि आमतौर पर उस देश का राष्ट्राध्यक्ष अथवा शासनाध्यक्ष होता है। एक सामूहिक संस्था के रूप में यह अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों व संधियों का अनुमोदन करती है तथा संघ ें सदस्यों अथवा उसकी संस्थाओं के मध्य विवादों तथा अन्य राजनीतिक संकटों का समाधान करती है।

3.यूरोपीय आयोग ( European Commission) सही अर्थों में यूरोपीय आयोग ही संघ की कार्यपालिका है। सैद्धान्तिक अर्थों में आयोग यूरोपीय संघ का सामूहिक प्रतिनिधित्व करता है। इसका मुख्य कार्य सहयोग के लिए कानूनी उपायों का मसौदा तैयार करना तथा यूरोपीय संघ की दिन प्रतिदिन की कार्यवाहियों का संचालन करना है। इसमें प्रत्येक देश से एक प्रतिनिधि होता है। जिसे आयुक्त कहा जाता है।

4. यूरोपीय संघ की परिषद (Council of European Union) इसमें सदस्य देशों के मंत्री सदस्य होते है। यह यूरोपीय संसद के साथ मिलकर विधायी कार्यों का निष्पादन करती है। यह यूरोपीय संघ की आधी संसद की तरह है। इसकं अतिरिक्त यह परिषद सामान्य विदेश एवं सुरक्षा नीति के संबंध में कार्यपालिका के दायित्वों का निर्वाह भी करती है।

5.यूरोपीय संघ का न्यायालय (Court of Justice of the European Union)- संघ का अपना एक अलग न्यायालय भी है, जिसका मुख्य कार्य संघ के कानूनों व संधियों को लागू करना तथा उनकी व्याख्या करना है।

6.यूरोपीय केन्द्रिय बैंक (European Central Bank) यूरोपीय संघ का एक केन्द्रिय बैंक भी है जो संघ की मौद्रिक नीति बनाता है तथा उसका प्रशासन भी करता है।

7.यूरोपीय लेखा परीक्षकों का कोर्ट (European Court of Auditor) यह वित्तीय मामलों में यूरोपीय संघ की एक महत्वपूर्ण संस्था है। इसके महत्वपूर्ण कार्य है- बजट का समुचित लेखा तैयार करना, लेखों की विश्वनीयता को सुनिश्चित करना, तथा वितीय जालसाजी को रोकना।

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