लोकतंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली का क्या महत्व है? भारत की निर्वाचन प्रणाली की क्या विशेषतायें हैं?

स्वतंत्र व निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली का महत्व

 लोकतंत्र के दो रूप होते है- प्रत्यक्ष लोकतंत्र व अप्रत्यक्ष लोकतंत्र। प्रत्यक्ष लोकतंत्र में निर्वाचन की आवश्यकता नही होती, क्योंकि इसमें जनता स्वयं कानूनों का निर्माण करती है। लेकिन यह प्रणाली छोटे राज्यों में ही संभव है। प्रत्यक्ष प्रणाली प्राचीन काल में यूनान के छोटे नगर-राज्यों में प्रचलित थी। जनसंख्या वृद्धि के कारण आजके बड़े राज्यों में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र संभव नहीं है। अतः वर्तमान में अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र हर सभी राज्यों में प्रचलित है। इसे प्रतिनिधि लोकतंत्र भी कहते हैं क्योंकि इसमें जनता के चुने हुये प्रतिनिधियों द्वारा शासन किया जाता है। अतः आधुनिक युग में लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सही जनप्रतिनिध्यिों का चुनाव किया गया है अथवा नही।

संक्षेप में निम्नलिखित कारणों से लोकतंत्र में एकनिष्पक्ष व स्वतंत्र निर्वाचन प्रणाली का होना आवश्यक है-

1. इससे लोकतंत्र में जनता का विश्वास बढ़ता है तथा लोकतंत्र कर जड़ें मजबूत होती हैं।

2. यह चुनावों व अन्य राजनीतिक गतिविधियों में जनता की भागीदारी बढ़ाने में सहायक है।

3. इससे राजनीति में सुयोग्य व लोक हित से प्रेरित व्यक्तियों का प्रवेश अधिक होगा।

4. इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार में तथा आपराधिक तत्वों की भूमिका में कमी आयेगी।

5. इससे जनप्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेही बढे़गी।

6. इससे राजनीतिक अस्थिरता की सम्भावना कम होगी तथा तानाशाही प्रवृत्तियों पर रोक लग सकेगी, क्योंकि कई देशों में चुनाव में हुई धांधली के परिणामस्वरूप राजनीतिक अस्थिरता तथा तानाशाही शासनों की स्थापना हुई है।

भारतीय निर्वाचन प्रणाली

            किसी भी देश के निर्वाचन प्रणाली में निम्न विषयों की व्यवस्था की जाती है-

1. किसको चुनाव लड़ने के लिए अर्ह माना जाये?

2. मतदान का अधिकार किसे दिया जाये?

3. निर्वाचन का संचालन व नियन्त्रण किसके द्वारा किया जाये?

4. निर्वाचन की कौन सी प्रणाली या विधि को अपनाया जाये?

            भारतीय निर्वाचन प्रणाली में भी उक्त बातों की व्यवस्था की गयी है। भारत के संविधान निर्माता इस बात से जागरूक थे कि ब्रिटिशकाल में मतदान का अधिकार अत्यन्त सीमित था तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ-साथ मनोनीत प्रतिनिधि भी व्यवस्थापिका में काम करते थे। अतः लोकतंत्र की दृष्टि से उन्होंने एक स्वतंत्र व निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था करने का प्रयास किया है। भारत में निर्वाचन प्रणाली का महत्व इसी से स्पष्ट है कि संविधान अनुच्छेदों 324-329 में निर्वाचन सम्बन्धी महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किये गये है।

            भारत के निर्वाचन प्रणाली का नियमन

भारत के निर्वाचन प्रणाली का नियमन दो तरह की कानूनी व्यवस्थाओं से होता है-

1. संविधान के प्रावधान- भारतीय संविधान के भाग 15 में अनुच्छेद 324 से लेकर 329 तक चुनाव सम्बन्धी कतिपय सामान्य प्रावधान तथा निर्वाचन आयोग के गठन आदि का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त संविधान में विभिन्न पदाधिकारियों जैसे- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद के दोनो सदनों के सदस्य तथा विधानमण्डल के दोनो सदनों के सदस्य आदि के निर्वाचन के सम्बन्ध में कतिपय प्रावधान उनके गठन के साथ ही दिये गये है।

2. संसद द्वारा पारित अधिनियम- उक्त संवैधानिक प्रावधानों के अतिरिक्त अन्य मामलों में चुनाव सम्बन्धी कानूनों के निर्माण का अधिकार भारतीय संसद को दिया गया है। भारतीय संसद ने निर्वाचन सम्बन्धी निम्न दो कानूनों का निर्माण किया है-

            अ. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950– इस अधिनियम में मतदाताओं की योग्यतायें तथा चुनाव सूचियों के तैयार करने सम्बन्धी प्रावधान दिये गये है। इसमें लोक सभा व विधान सभाओं के चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन आदि की व्यवस्था भी की गयी है। इसी अधिनियम के अंतर्गत केन्द्र सरकार ने 1950 में ही कतिपय नियमों का भी निर्माण किया है।

            ब. जनप्रतिनिधित्व कानून 1951– इस अधिनियम में चुनावों के संचालन तथा उनसे जुड़े अन्य मामलों जैसे- चुनाव के लिए प्रशासनिक मशीनरी, मतदान, चुनाव विवाद, उप-चुनाव आदि की व्यवस्था की गयी है। इस अधिनियम के अंतर्गत भी केन्द्र सरकार ने कतिपय नियमों का निर्माण किया है।

            उक्त दो प्रकार के प्रावधानों के अंतर्गत ही भारत में चुनाव प्रक्रिया का संचालन होता है। संविधान तथा कानूनों में समय-समय पर संशोधन भी किये गये है। इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण संशोधन यह है कि पहले विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के लिए अलग-अलग मतदाता सूचियां होती थी, लेकिन अब दोनो के लिए एक ही मतदाता सूची का प्रयोग किया जा रहा है। इससे समय व धन दोनो की बचत हो रही है।

            भारतीय निर्वाचन प्रणाली की विशेषतायें

संविधान और कानून के उक्त प्रावधानों के अंतर्गत भारत में जिस निर्वाचन प्रणाली की स्थापना की गयी है, उसकी मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित है-

  1. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार- भारत में संविधान के अन्तर्गत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था को अपनाया गया है। अर्थात एक निश्चित आयु पूरी करने के बाद बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक व्यक्ति को मतदान का अधिकार प्राप्त होगा। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश शासन काल में मताधिकार सीमित था तथा प्रत्ये व्यक्ति को मताधिकार प्राप्त नही था। संविधान के अनुच्छेद 326 में कहा गया है कि लोकसभा व राज्यसभा के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। 61वें संविधान संशोधन अधिनियम 1988 द्वारा मतदान की आयु को घटाकर 21 वर्ष से 18 वर्ष कर दी गयी है।

            फिर भी अनुच्छेद 326 के प्रावधानों के अनुसार कतिपय आधारों पर किसी नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। ये आधार हैं-

लम्बे समय तक निवास न करना,

पागल होना,

अपराध, भ्रष्टाचार अथवा अवैध व्यवहार में संलग्न होना।

इन तीन आधारों पर कानून बनाकर किसी नागरिक को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है। 2011 में भारत सरकार ने कानूनों में संशोधन करके उन भारत से बाहर निवास कर रहे भारतीय नागरिकों (एन आर आई) को मतदान का अधिकार देने की व्यवस्था की है यदि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में अपना पंजीकरण करा लेते है। पहले लम्बी अवधि तक भारत में निवास न करने के कारण ऐसे व्यक्तियों के नाम मतदाता सूचियों में नही शामिल किये जाते थे। ध्यान देने योग्य बात यह ळै कि इसमें अप्रवासी भारतीय शामिल नही है। अप्रवासी भारतीय वे भारतीय मूल के व्यक्ति है  जो वर्तमान में विदेशी नागरिक है। अप्रवासी भारतीयों को 2005 में कानून में संशोधन कर कतिपय अन्य शैक्षणिक तथा व्यवसायिक अधिकार दिये गये है, लेकिन इन्हें मतदान तथा चुनाव लड़ने का अधकार नही दिया गया है। कुल मिलाकर एये किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार प्राप्त नही है जो भारतीय नागरिक नही है।

            2. स्थानों का आरक्षण, लेकिन संयुक्त निर्वाचक मण्डल- भारतीय संविधान में लोकसभा व विधानसभा दोनों के चुनावों में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या में स्थान आरक्षित किये गये है। लेकिन इन आरक्षित सीटों पर चुनाव के लिए संयुक्त चुनाव सूची का प्रयोग किया गया है, जिसका तात्पर्य यह है कि इन आरक्षित सीटों के चुनाव में सभी वर्गों के व्यक्ति मतदान कर सकेंगे। संयुक्त सूची की व्यवस्था अनुच्छेद 325 में की गयी है। संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था आजादी के पूर्व भारत में लागू साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था से भिन्न है। साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था में आरक्षित स्थानों पर केवल उसी समुदाय के मतदाता ही मतदान कर सकते थे, जिस समुदाय के लिए वह सीट आरक्षित है। भारत ने इस प्रणाली को बदलकर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली को अपनाया है।

            3. एकल सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र– भारत में लोकसभा व विधानसभा के चुनाव के लिए एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों को अपनाया गया है। अतः एक निर्वाचन क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि निर्वाचित होगा। एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र का मुख्य लाभ यह है कि इससे जनप्रतिनिधि की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ती है। इसके विपरीत कई देशों मंे बहु-सदस्यीय निर्वाचन प्रणाली अपनाई गयी है तथा वहां जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही निर्धारित करना कठिन है।

            उल्लेखनीय है कि भारत में प्रथम व द्वितीय लोकसभा चुनावों के समय 91 लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्र द्विसदस्यीय थे। इस तरह की व्यवस्था कतिपय विधानसभा चुनाव क्षेत्रों पर भी लागू थी, लेकिन संसद द्वारा कानून में बदलाव करके 1961 में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब सारे देश मंे एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था लागू है।

            4. गुप्त मतदान- मतदाताओं द्वारा मतदान की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए गुप्त मतदान की व्यवस्था को अपनाया गया है। इससे मतदाता अपने मत का प्रयोग निर्भीक होकर स्वैच्छा से कर सकते है।

            5. चुनाव के लिए एक स्वतंत्र अभिकरण- भारत में निर्वाचन प्रक्रिया को संचालित करने व नियन्त्रित करने का अधिकार एक स्वतंत्र निकाय निर्वाचन आयोग को दिया गया है। जिसकी व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में की गयी है। निर्वाचन आयोग बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव की व्यवस्था करता है।

            6. प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणालियों का समन्वय- भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा तथा विधानसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से होता है। इसके लिए समानुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय पद्धति अपनाई जाती है। इसके विपरीत लोकसभा व विधानसभा के सदस्यों का चुनाव मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। प्रत्यक्ष चुनाव के लिए सबसे अधिक मत पाने वाले प्रत्याशी की जीत का नियम अपनाया गया है। इस नियम को जो सबसे आगे है वही जीता (थ्पतेज च्ंेज जीम च्वेज ैलेजमउ) प्रणाली भी कहते है। प्रत्यक्ष निर्वाचन में इसी नियम का पालन किया जाता है।

            7. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व- भारत में भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर एक क्षेत्र विशेष में रहने वाली जनता के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी है। इसे प्रादेशिक प्रतिनिधित्व कहा जाता है। इसके विपरीत व्यवसायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था होती है, जिसमें विभिन्न व्यवसायों में संलग्न व्यक्तियों को अपने अलग-अलग प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होता है। व्यवसायिक प्रतिनिधित्व का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे विशिष्ट हितों की पूर्ति हो सकती है, लेकिन सामान्य हितों की पूर्ति के लिए यह प्रणाली बाधक है। साथ ही व्यवसायिक प्रतिनिधित्व में समाज का विभाजन विभिन्न वर्गों में हो जाता है तथा समाज में समरसता का अभाव हो जाता है।

            8. स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था- 73वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव के लिए अनुच्छेद 243के के अन्तर्गत प्रत्येक राज्य में एक अलग निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गयी है। इसके पहले स्थानीय निकायों के निर्वाचन राज्य सरकारों द्वारा कराये जाते थे। स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की व्यवस्था एक महत्वपूर्ण कदम है।

            निष्कर्षतः भारत की निर्वाचन प्रणाली में उक्त चारों प्रश्नों का उत्तर निहित है। भारत में सभी मतदाताओं को वयस्क मताधिकार के आधार पर मत देने का अधिकार है। भारत के नागरिक निश्चित योग्यताओं को पूरी करने के उपरान्त चुनाव लड़ सकते है। इन योग्यताओं में जाति, धर्म अथवा अन्य कोई भेद-भाव नही रखा गया है। जहां तक चुनाव कराने वाले अभिकरण का सम्बन्ध है यह कार्य भारत के निर्वाचन आयोग को दिया गया है। जहां तक निर्वाचन प्रणाली का सम्बन्ध है भारत में अप्रत्यक्ष व प्रत्यक्ष दोनो प्रकार की प्रणालियों को अपनाया गया है।

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