क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils) विधायी (Statutory) संस्थायें हैं, क्योंकि इनका गठन संसद द्वारा 1956 में पारित राज्य पुनर्गठन अधिनियम के भाग तीन की धारा 15-22 के अन्तर्गत किया जाता है। इसी अधिनयम के अन्तर्गत क्षेत्रीय परिषदों का गठन भारत में पहली बार 1957 में किया गया था। वैसे तो इन परिषदों का अस्तित्व 1957 से बना हुआ है, लेकिन 2014 के बाद इनकी बैठकों तथा क्रिया-कलापों में अधिक सक्रियता दिखाई दे रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 से लेकर अगस्त 2026 तक इन परिषदों तथा उनकी स्थाई समितियों की 64 बैठकें संपन्न हो चुकी है।
भारत में कुल 6 क्षेत्रीय परिषदें है, जिनमें से पांच का गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अन्तर्गत् किया गया है तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिये एक अलग उत्तर-पूर्व क्षेत्रीय परिषद का गठन उत्तर-पूर्व परिषद अधिनियम, 1971 के अन्तर्गत किया गया है। इन परिषदों में शामिल राज्यों तथा क्रेन्द्र-शासित प्रदेशों का विवरण निम्नवत् है-
- उत्तरी क्षेत्रीय परिषद– मुख्यालय- दिल्ली। सदस्य- पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा क्रेन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली, चन्डीगढ़, जम्मू व कश्मीर तथा लद्दाख
- केन्द्रीय क्षेत्रीय परिषद– मुख्यालय- प्रयागराज । उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उततराखण्ड, तथा छत्तीसगढ़
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद- मुख्यालय- कोलकाता- सदस्य- पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिसा
- पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद– मुख्यालय- मुम्बई- सदस्य- महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, तथा दादरा नागर हवेली तथा दमन एवं दिव
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद– मुख्यालय- चैन्नई– तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, लक्षदीव, पुडुचेरी, तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।
- उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय परिषद- मुख्यालय- गुहावटी, सदस्य- असम, नागालैंड, मनीपुर, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोराम, अरूणाचल प्रदेश, तथा सिक्कम
क्षेत्रीय परिषदों का कार्यचलन
प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद में उसमें शामिल राज्यों के मुख्यमंत्री तथा क्रेन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल भाग लेते हैं। सभी परिषदों की बैठकों की अध्यक्षता केन्द्र के गृह मंत्री द्वारा की जाती है। क्षेत्रीय परिषदों की बैठकों का कोई समय अन्तराल निर्धारित नही है। वर्तमान में आमतौर पर प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद की बैठक साल में एक बार हो रही है।
क्षेत्रीय परिषदों के कार्य
क्षेत्रीय परिषदें सलाहकारी संस्थायें है तथा ये विचार-विमर्श का एक मंच प्रदान करती हैं। इन परिषदों के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-
- सदस्य राज्यों अथवा केन्द्र व राज्यों के बीच विवादों का समाधान। भारत में राज्यों के बीच जल बंटवारे के विवाद आमतैार पर पाये जाते हैं।
- संबन्धित क्षेत्र के विकास के लिये साझा विषयों पर विचार करना तथा सन्तुलित विकास सुनिश्चत करना।
- क्षेत्र की आन्तरिक सुरक्षा चुनौतियों के बारे में राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना।
- क्षेत्र के भाषायी अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना।
सहकारी संघवाद में क्षेत्रीय परिषदों की भूमिका
भारत में सहकारी संघवाद के विचार को लागू किया गया है, जिसमें एक ओर राज्यों के बीच तथा दूसरी ओर राज्यों व क्रेन्द्र सरकार के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया जाता है। क्षेत्रीय परिषदें सदस्य राज्यों तथा क्रेन्द्र को एक मंच प्रदान करती है जिसमें वे अपने विवादों का समाधान कर सकें तथा क्षेत्र के विाकस हेतु अपनी नीतियों मे समन्वय स्थापित कर सकें। इन परिषदों में सभी निर्णय आम सहमित तथा विचार विमर्श के आधार पर लिये जाते है, जिससे राज्यों व क्रेन्द्र के बीच सहयोग की भावना का विकास होता है। यदि हम इन परिषदों के कार्यों पर गौर करें तो हम कह सकते हैं कि क्षेत्रीय परिषदें सहकारी संघवाद को सफल बनाने के लिये एक प्रभावी मंच हैं।
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