शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त का प्रतिपादन 18वीं शताब्दी के प्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक मान्टेसक्यू ने किया था। दो अन्य विचारकों रूसो तथा वाल्टेयर के साथ मान्टेस्क्यू की गिनती फ्रांस की क्रान्ति (1789) के तीन विचारकों में होती है। इन तीनों विचारकों के विचारों ने फ्रांस की क्रान्ति को वैचारिक आधार प्रदान किया, जिसके कारण यह क्रान्ति संभव हो सकी। फ्रांस की क्रान्ति के तीन नारे थे- स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारा (Liberty] Equality and Fraternity) । इसीलिये यह माना जाता है कि फ्रांस की क्रान्ति के द्वारा लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों को प्रोत्साहन मिला। इन तीनों विचारकों की एक ही केन्द्रीय विषय था- व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन लेकिन तीनों विचारकों ने वव्यक्ति की स्वतंता का समर्थन करने के लिये अलग-अलग तर्क प्रदान किये।
मान्टेस्क्यू का मानना था कि यदि सरकार के तीन अंगों की शक्तियों का केन्द्रीकरण होगा तो सरकार मनमानी कर सकती है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित नही रहेगी। अतः उन्होंने 1748 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘दा स्प्रिरिट आफ लाज‘ (The Spirit of Laws) में शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार सरकार के तीन अंगों- व्यस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका (Legislature, Executive, and Judiciary) की शक्तियां अलग- अलग होनी चाहिये, जिससे सरकार के तीन आंगों की शक्तियां बंटी हुई होंगी तथा सरकार का कोई अंग मनमानी शक्ति का प्रयोग नही कर सकेगा। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी।
उन्होंने अपने विचार के समर्थन में ब्रिटेन के संविधान का उदाहरण दिया, जोकि पूरी तरह सही नही था। ब्रिटेन में नागरिक स्वतंत्रता तो है, लेकिन इसका कारण शक्ति पृथक्करण नही है, क्योंकि वहां संसदात्मक व्यवस्था होने के कारण व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ संबन्ध पाये जाते हैं। इसी आधार पर मान्टेस्क्यू की आलोचना की जाती है। लेकिन इस आलोचना के बाद भी वर्तमान में उनके सिद्धान्त का स्थाई महत्व है।
शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त का क्रियान्वयन
वर्तमान में सभी लोकतांत्रिक देशों में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है तथा सरकार के तीनों अंगों की शक्तियों का पृथक्करण किया गया है। लेकिन इस सिद्धान्त को लागू करने में यह कठिनाई थी कि इससें सरकार की एकरूपता बाधित हो सकती तथा सरकार के तीनों अंगों में आपसी टकराव की संभावना बढ़ जाती है। इस स्थिति से निबटने के इस सिद्धान्त में व्यवहारिक दृष्टि से इसमें एक संशोधन किया गया है। संशोधन यह कि इसके साथ नियंत्रण व सन्तुलन (Checks and Balances) का नियम लागू किया जात है। नियंत्रण व संतुलन के नियम के अनुसार तीनों अंगों की शक्तियों को अलग- अलग करने के साथ ही नियंत्रण भी स्थापित किया जाता है। इसी संशोधन के साथ इस सिद्धान्त को वर्तमान शासन व्यवस्थाओं में लागू किया जाता है।
यह भी उल्लेखनीय हे कि शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त अध्यक्षात्मक शासन (Presidential System)व्यवस्था में अधिक उपयुक्त है क्योंकि इसमें व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ संबन्ध नही होते। चूंकि अमेरिका महाद्वीप के अधिकांश देशों ने अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अपनाई है, अतः इस सिद्धान्त को पूरी तरह इन देशों में लागू किया गया है। इसके विपरीत भारत तथा ब्रिटेन जैसे देशों में संसदात्मक प्रधाली (Parliamentary System) में व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ संबन्ध हाते है तथा इस सिद्धान्त को सीमित रूप से लागू किया गया है।
शक्ति पृथक्करण तथा एक अन्य मिलते-जुलते शब्द ‘शक्ति विभाजन‘ (Division of Powers) में अन्तर समझना आवश्यक है। शक्ति पृथक्करण में जहां सरकार के तीन अंगों में शक्तियों का बंटवारा किया जाता है, वहीं शक्ति विभाजन में केन्द्रीय सरकार तथा प्रान्तीय सरकरों में शक्तियो का बंटवारा किया जाता है। शक्ति विभाजन वास्तव में संघात्मक व्यवस्था (Federal System) की विशेषता है। शक्ति विभाजन केवल संघात्मक देशों में पाया जाता है। इसके विपरीत शक्ति पृकथक्करण किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो सकता है।
भारत में शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को किस रूप में लागू किया है?
भारत के संविधान में इस सिद्धान्त को दो स्तरों पर लागू किया गया है।
पहले स्तर पर सरकार के प्रत्येक अंग की मुख्य अथवा अनन्य (Exclusive) शक्तfयों का उल्लेख है। उदाहरण के लिये व्यवस्थापिका अर्थात संसद का मुख्य कार्य कानून बनाना है। कार्यपालिका तथा न्यायपालिका द्वारा कानून नही बनाये जा सकते हें। इसी प्रकार कार्यपालिका का अनन्य कार्य कानूनों का क्रियान्वयन तथा नीति निर्माण करना है तथा न्यायपालिका का अनन्य कार्य कानूनों तथा संविधान की व्याख्या करना तथा संबन्धित विवादों का निबटारा करना है।
दूसरे स्त्तर पर प्रत्येक अंग का दूसरे अंगों पर कतिपय नियंत्रण स्थापित किया गया है।
उदाहरण के लिये व्यवस्थापिका, कार्यपालिका को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटा सकती है तथा प्रतिवर्ष उसका बजट पारित करती है। दूसरी तरफ, व्यवस्थापिका अथवा संसद न्यायपालिका के न्यायाधाीशों को उनके पद से हटा सकती है।
इसी प्रकार कार्यपालिका संसद के कानूनों को लागू करती है तथा नीति का निर्धारण करती है तथा न्यायपालिका के सदस्यों की नियुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसी तरह न्यापालिका एक तरफ संसद के कानूनों की व्याख्या करती है तथा न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के आधार पर उन्हें अवैध घोषित कर सकती है। न्यापालिका संविधान तथा कानून का उल्लंघन करने पर कार्यपालिका के आदेशों पर भी रोक लगा सकती है तथा उन्हें अवैध घोषित कर सकती है।
यह उल्लेखनीय है कि भारत में चूंकि संसदात्मक (Parliamentary System) प्रणाली अपनाई गई है, जिसमें व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका में घनिष्ठ संबन्ध पाये जाते हैं, इसीलिये शक्ति पृथक्ककरण का सिद्धान्त अध्यक्षात्मक व्यवस्था (Presidential system) वाले देशों जैसे अमेरिका की तरह पूरी तरह से लागू नही किया सकता है। इसके बावजूद भारत की शासन व्यवस्था व संविधान शक्ति पृथक्कण के सिद्धान्त पर आधारित है।
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