क्या भारत की संसद सम्प्रभु (Sovereign) है? संसद की विधायी शक्तियों पर क्या सीमायें हैं?
भारत की संसद सम्प्रभु नही है
भारत की संसद को सम्प्रभु अथवा सर्वोच्च मानना सही नही है। इसका कारण यह है कि भारत में ब्रिटेन की तरह संसदीय सर्वोच्चता का सिद्धान्त नही अपनाया गया है। संसद की सर्वोच्चता का सिद्धान्त ब्रिटेन में लागू है। इसका तात्पर्य यह है कि ब्रिटिश संसद द्वारा बनाये गये कानून सर्वोच्च है तथा उन पर न्यायालय या संविधान द्वारा कोई सीमा नही लगाई जा सकती है।
भारत में इसके विपरीत संविधान की सर्वोच्चता का सिद्धान्त अपनाया गया है। संविधान की सर्वोच्चता का तात्पर्य यह कि सरकार के सभी अंग, सभी सरकारी प्राधिकारी तथा विधायिका के कानून तथा सरकारी आदेश संविधान के अधीन होंगे।
संसद की विधायी शक्ति पर सीमायें
संविधान की सर्वोच्चता के कारण भारतीय संसद की विधायी शक्तियां भी असीमित नही है। संसद की विधायी शक्ति में मुख्य रूप से दो शक्तियां शामिल हैं-
- कानून बनाने की शक्ति
- संविधान में संशोधन करने की शक्ति
भारतीय संसद की कानून बनाने की शक्ति पर निम्न सीमायें हैं-
- भारत में संघात्मक व्यवस्था को अपनाया गया है, जिसके अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्यों के बीच संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी शक्तियों का बंटवारा किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में संसद केवल संघ सूची तथा समवर्ती सूची के विषयों पर ही कानून बना सकती है, राज्य सूची के विषयों पर नही।
- संसद के कानून संविधान के प्रावधानों का उल्ल्ंघन नही कर सकते है। संविधान के उल्लंघन की दशा में न्यायपालिका द्वारा अपनी न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति के अन्तर्गत संसद के कानूनों को अवैध घोषित किया जा सकता है।
संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर निम्न सीमा है-
संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर लम्बे समय तक संसद व न्यापालिका के बीच विवाद चलता रहा है।
- वर्ष 1967 से पहले यह निर्धारित था कि संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संविधान में कोई भी संशोधन किया जा सकता है। लेकिन 1967 में गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य में सर्वोच्च न्यायालय की 11 सदस्यीय बेंच ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नही कर सकती है।
- वर्ष 1973 में केशवानन्द भारती केस में सर्वोच्च न्यालय की 13 सदस्यीय बेंच ने अपने निर्णय द्वारा पुनः इस स्थिति में बदलाव करते हुये यह प्रतिपादित किया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है, लेकिन संसद संविधान के मौलिक ढ़ांचे (Basic Structure) में संशोधन नही कर सकती है। वर्तमान में यही सिद्धान्त लागू है।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आधिकारिक तौर पर यह सूची नही जारी की कि मौलिक ढ़ांचे में कौन से विषय शामिल है। इसका निर्धारण प्रत्येक मामले में न्यायालय द्वारा किया जाता है। अब तक के सर्चोच्च न्यायालय के निर्णयों से यह पता चलता है कि पंथ निरपेक्षता तथा न्यापालिका की स्वतंत्रता मौलिक ढ़ांचे में शामिल हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग न्यापालिका द्वारा विधायिका के कानूनों की वैधता देखने के लिये किया जात है, लेकिन मौलिक ढ़ांचे के सिद्धान्त का प्रयोग सर्वोच्च न्यायलय द्वारा केवल संसद की संविधान संशोधन की सीमा निर्धारित करने के लिये किया जाता है। न्यायिक पुनरावलोकन तथा मौलिक ढ़ांचे के सिद्धान्त दोनो में यही अन्तर है। दोनो एक नही हैं।
ससंद की विधायी शक्तियों परउक्त सीमाओं के कारण हम कह सकते हैं कि भारत की संसद सम्प्रभु नही है।
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