भारत 12-13 सितंबर, 2026 को ब्रिक्स (BRICS) का 18वां शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है। यह चौथी बार है जब भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में भारत द्वारा ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन आयोजित किए गए थे। 2026 का शिखर सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत को अगला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित करने का मौका शायद एक दशक या उससे अधिक समय के बाद ही मिलेगा, क्योंकि ब्रिक्स के सदस्यों की संख्या अभी पांच से बढ़कर 11 हो गई है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसके सदस्यों द्वारा बारी-बारी से (रोटेशन के आधार पर) आयोजित किए जाते हैं, और अब यह रोटेशन 11 सदस्यों के बीच होगा।

ब्रिक्स 2026 का लोगो तथा थीम। चित्र साभारः दा स्टेट्समैन
2026 के शिखर सम्मेलन के लिए भारत ने इसकी थीम तय की है – ‘लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability) और साथ ही कमल के आकार का लोगो भी तैयार किया है। इस शिखर सम्मेलन की तैयारी के तौर पर, मई 2026 से ही भारत ने सदस्य देशों के कई मंत्री-स्तरीय सम्मेलन आयोजित किए हैं, ताकि शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर चर्चा की जा सके। ऐसा लगता है कि अन्य बातों के अलावा, भारत इस शिखर सम्मेलन में ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करेगा, जैसा कि उसने जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान 2023 में किया था। हालाँकि, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आयोजन को लेकर वैसा उत्साह नहीं दिख रहा है जैसा तीन साल पहले जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान देखा गया था। इसके कारण गहरे हैं। हो सकता है कि भारत ने ब्रिक्स के बदलते स्वरूप पर खुलकर अपनी आपत्ति न जताई हो, लेकिन बदलाव साफ दिख रहा है, जिसका सामना भारत को कभी न कभी करना ही होगा।

चित्र साभारः इन्स्टाग्राम
ब्रिक्स की स्थापना क्यों की गई थी?
ब्रिक्स की स्थापना 2006 में गोल्डमैन सैक्स ग्रुप के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा पेश किए गए ‘ब्रिक’ (BRIC) थीसिस से प्रेरित होकर की गई थी। इस थीसिस में कहा गया था कि चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं – चीन, भारत, ब्राजील और रूस – 2050 तक कुल जीडीपी (GDP) के मामले में विकसित देशों की जगह ले लेंगी। इसमें यह भी कहा गया था कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं (प्रतिस्पर्धी नहीं), इसलिए वे एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगी। उदाहरण के लिए, रूस के पास ऊर्जा संसाधन हैं, ब्राजील के पास कच्चा माल और कृषि उत्पाद हैं, चीन के पास विनिर्माण क्षमता है और भारत के पास जनशक्ति और मानव संसाधन हैं। ‘पूरक’ होने का मतलब है कि जिस चीज़ की कमी एक देश में है, उसे दूसरा देश पूरा करता है। इसी सोच के साथ, ऊपर बताए गए चार देशों ने बातचीत शुरू की और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में अपना पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया। 2010 में दक्षिण अफ्रीका को पांचवें सदस्य के तौर पर शामिल किया गया और इसी के साथ ब्रिक (BRIC) का नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया, जो आज भी यही है।
ब्रिक्स का का मुख्य उद्देश्य क्या है?
ब्रिक्स का अपना कोई संविधान या औपचारिक ढांचा नहीं है, लेकिन इसकी गतिविधियों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शुरुआत में इसका ध्यान तीन मुख्य उद्देश्यों पर थे:
1. सदस्य देशों के बीच बहुआयामी सहयोग को बढ़ावा देना।
2. अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के दबदबे वाली व्यवस्था की जगह एक ऐसी बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था की मांग करना जो सबको साथ लेकर चले।
3. पश्चिमी देशों के दबदबे वाले वैश्विक वित्तीय ढांचे की जगह व्यावहारिक और वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय संस्थान विकसित करना।
इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ब्रिक्स ने दो संस्थायें बनाई- न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (Contingency Reserve Agreement)। न्यू डेवलपमेंट बैंक के लिए शुरुआती समझौते पर 15 जुलाई 2014 को ब्राजील के फोर्टालेजा में छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन बैंक ने जुलाई 2015 में काम करना शुरू किया। एक तरह से यह विश्व बैंक का विकल्प था। आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था की स्थापना 2015 में 100 अरब डॉलर के फंड के साथ की गई थी ताकि सदस्य अर्थव्यवस्थाओं को अल्पकालिक भुगतान संतुलन के दबाव और वैश्विक तरलता के झटकों से बचाया जा सके। आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकल्प के तौर पर देखा गया।
बाद में ब्रिक्स ने अपने क्षेत्र का विस्तार करते हुये अन्य मामलों जैसे जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महिला सशक्तीकरण, जीवन्त विकास लक्ष्य आदि को भी अपनी गतिविधियों में शामिल कर लिया है।
ब्रिक्स में क्या बदलाव आया है?
अपनी सदस्यता में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण ब्रिक्स के स्वरूप व आकार में परिवर्तन हो रहा है। रूस में 2024 के शिखर सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स ने दूसरी बार अपनी सदस्यता का बड़े पैमाने पर विस्तार किया। तब से छह नए सदस्य जोड़े गए हैं –संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, इथियोपिया, मिस्र, इंडोनेशिया और सऊदी अरब। अतः वर्तमान में ब्रिक्स में 11 सदस्य हैं। अर्जेन्टाइना को भी शामिल किया गया था, लेकिन वहां की नई सरकार ने 2025 में ब्रिक्स की सदस्यता लेने से मनाकर दिया है, क्योंकि नई सरकार अमेरिका के प्रभाव में है तथा अमेरिका का ट्रम्प प्रशासन ब्रिक्स को अमेरिका तथा पश्चिमी देशों का विरोधी मानता है।
कई अन्य देश भी सदस्यता लेने के इच्छुक थे। लेकिन भारत ने इसका विरोध किया। आखिरकार, उन्हें शामिल करने के लिए ‘साझीदार देशों’ (Partner Countries) नाम की एक नई श्रेणी बनाई गई। इस तरह, 2025 में दस साझीदार देश ब्रिक्स में शामिल हुए: बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम।
सदस्यता और साझीदार श्रेणी में यह विस्तार ब्रिक्स की मूल सोच से प्रेरित नहीं था – जिसमें ब्रिक्स को तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह माना जाता था। बल्कि उक्त बदलाव दो प्रमुख सदस्यों, रूस और चीन, की राजनीतिक सोच से प्रेरित था। असल में, यूक्रेन- रूस युद्ध में अमेरिका और यूरोपीय देश यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं, तथा चीन, उत्तर कोरिया व ईरान आदि देश रूस का समर्थन कर रहे हैं। इस प्रकार इस युद्ध ने दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच वैश्विक ध्रुवीकरण को और तेज़ कर दिया है। रूस, चीन और ब्राज़ील की अगुवाई में, ब्रिक्स ने डॉलर की जगह एक वैकल्पिक वैश्विक मुद्रा व्यवस्था को प्रोत्साहित करने की कोशिश की है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस कदम का विरोध किया। उन्होंने धमकी भी दी कि अगर ब्रिक्स के सदस्य डॉलर को वैश्विक मुद्रा के तौर पर बदलने की कोशिश करते हैं, तो उन पर अतिरिक्त व्यापार शुलक लगाए जाएंगे। इस तरह, चल रहे ध्रुवीकरण को देखते हुए ब्रिक्स एक अमेरिका-विरोधी मंच बनता जा रहा है। यह ब्रिक्स थीसिस के तहत प्रस्तावित इसके मूल उद्देश्य से बिल्कुल अलग है। इसके अलावा, ब्रिक्स की बढ़ती सदस्यता भी इसके आपसी तालमेल पर असर डालती है।पहले, चीन और भारत ब्रिक्स के अंदर तनाव को संभाल लेते थे, लेकिन अब इसके अंदर नए तनाव पैदा होने की संभावना है। उदाहरण के लिए, मई 2026 में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान अंतिम घोषणापत्र पर सहमत नहीं हो सके और इसे जारी नहीं किया जा सका। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के दौरान, ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब पर कई हमले किए हैं।
इस बदलाव का भारत पर क्या प्रभाव हो सकता है?
पिछले दो सालों में ब्रिक्स का तेज़ी से अमेरिका-विरोधी या पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में बदलना भारत के लिए सही नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के करीबी रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। जबकि चीन, रूस तथा इरान जैसे देश ब्रिक्स को अमेरिका तथा पश्चिम विरोधी मंच बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर भारत जारी ध्रुवीकरण के बीच ब्रिक्स में संयम बरतने की बात करता है, तो चीन और रूस समर्थित नए सदस्य धीरे-धीरे भारत को किनारे कर सकते हैं। ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी मंच के तौर पर पेश किए जाने से दोनों पक्षों के बीच भारत के लिए संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसलिए, भारत 2026 के शिखर सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स की अमेरिका-विरोधी बयानबाज़ी को कम करने की कोशिश कर सकता है। अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो यह भारत के लिए असहज और चुनौतीपूर्ण होगा। ये तनाव 2026 के शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आएंगे। फिलहाल, ब्रिक्स के भीतर जो हालात हैं, वे भारत की संतुलन बनाने वाली कूटनीति के अनुकूल नही हैं।
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