त्वरित टिप्पणी
अभी तक सामरिक समीक्षक पश्चिम एशिया तथा दक्षिण एशिया में भारत की कूटनीति की समीक्षा अलग-अलग परिवेश में करते रहे हैं, लेकिन अब ऐसा करना समीचीन नहीं होगा, क्योंकि अब इन दोनो क्षेत्रों के बीच नई सामरिक कड़िया जुड़ रही हैं, जिनको अनदेखा नही किया जा सकता है-
- बांग्लादेश ने गत 21 अगस्त, 2026 को मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते की सदस्यता ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की है। उल्लेखनीय है कि मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते पर तीन देशों- पाकिस्तान, साउदी अरब तथा तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को साउदी अरब के शहर मक्का में हस्ताक्षर किये थे। इस समझौते में नाटो की तरह यह प्रावधान है कि यदि एक देश पर बाहरी आक्रमण होता है तो वह तीनों देशों पर आक्रमण माना जायेगा तथा तीनो उसका मिलकर सामना करेंगे।
उल्लेखनीय है कि इस सैनिक गठबन्धन में शामिल तीनों देशों की सैनिक क्षमतायें एक-दूसरे की पूरक है। जहां साउदी अरब वित्तीय क्षमता तथा सामिरक भूभाग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, वहीं तुर्की विकसित सैनिक उद्योगों की क्षमता से युक्त है, तथा पाकिस्तान बड़ी सेना तथा परमाणु क्षमता से युक्त है। यद्यपि इन तीनों देशों ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह गठबन्धन किस देश के संभावित खतरे के विरूद्ध बनाया गया है, लेकिन सामरिक माहौल के हिसाब से ईरान, इजराइल अथवा भारत अथवा इनमें से कोई भी गठबन्धन के देशों की सुरक्षा के लिये खतरा हो सकते हैं।
दो दृष्टिकोण
जहां तक भारत का संबन्ध है, मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते को लेकर दो द़ष्टिकोण सामने आये हैं-
पहला दृष्टिकोण के अनुसार इन तीनो देशों के बीच अभी तक कोई संयुक्त सैनिक ढ़ांचा नही है, अतः व्यवहार में इन देशों द्वारा किसी बाहरी सैनिक संघर्ष की स्थिति में कोई संयुक्त सैनिक कार्यवाही किया जाना संभव नही है। अतः मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते को केवल सामरिक नाकेबन्दी के रूप में देखा जाना चहिये। यह नाटो की तरह एक प्रभावी सैनिक गठबन्धन नही है। अतः भारत को इसके प्रति अधिक प्रतिक्रिया करने से बचना चाहिये।
दूसरा द़ष्टिकोण यह कि भले ही मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते की संयुक्त सैनिक क्षमता क्रियाशाील न हो, लेकिन यह समझौता भारत के लिये एक सामिरक चुनौती अवश्य है। यदि भविष्य में भारत व पाकिस्तान के बीच कोई सैनिक संघर्ष होता है तो साउदी अरब तथा तुर्की भले ही पाकिस्तान के समर्थन में अपनी सेनायें न भेंजें, लेकिन उनके द्वारा पाकिस्तान को कूटनीतिक, हथियारों की आपूर्ति आदि का समर्थन देने की संभावना से इन्कार नही किया जा सकता है। तुर्की ने तो आपेरेशन सिन्दूर के दौरान भी मई 2025 में पाकिस्तान की कूटनीतिक तथा सैनिक मदद की थी। दूसरा, इस समझौते के बाद भारत के लिये आतंकवाद के नाम पर पाकिस्तान को कम से कम इस क्षेत्र में अलग-थलग करना मुश्किल होगा, जैसा कि भारत अभी तक करता आया है।
इसी बीच भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि वे इस सामरिक घटना का गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं।
अब यदि भविष्य में बांग्लादेश भी मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते में शामिल हो जाता है तो इस गबन्धन की पहुंच भारत के पश्चिम तथा पूरब दोनो क्षेत्रों में हो जायेगी। ऐसी स्थिति में इस बात की संभावना से इन्कार नही किया जा सकता है कि भविष्य में मालदीव तथा खाड़ी के अन्य देश भी मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते को ज्वाइन कर सकते हैं।
यदि उक्त परिवेश में दोनो दृष्टिकोणों को देखा जाये तो दूसरा दृष्टिकोण ही सही व यथार्थवादी प्रतीता होता है।
2. इस घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया तथा दक्षिण एशिया में भारत की वर्तमान सामरिक स्थिति पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। वर्तमान में पश्चिम एशिया में संयुक्त अरब अमीरात, ओमान तथा इजराइल के साथ भारत के घनिष्ठ सामरिक संबन्ध हैं। भारत ने इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात तथा अमेरिका के साथ 2021 में यू02 आई02 नामक आर्थिक सहेाग संगठन भी बनाया था, लेकिन ट्रम्प की अनिश्चित नीतियां तथा ईरान’-अमेरिका युद्ध के कारण यह संगठन अनिश्चतता का शिकार हो गया है। ईरान युद्ध के दौरान भारत के ढ़ुलमुल रवैये के कारण ईरान भी भारत के प्रति अधिक आश्वस्त नही होगा। इसका प्रभाव चाबहार बन्दरगाह पर भारत के अधिकारों पर अवश्य होगा।
3. जहां तक दक्षिण एशिया का संबन्ध है, भारत व बांग्लादेश के बीच तनाव बना हुआ तथा उसने पाकिस्तान तथा चीन दोनो के साथ अपने सामिरक संबन्ध मजबूत करने का प्रयास किया है। नेपाल भी समय-समय पर चीन के प्रभाव में सीमा संबन्धी विवाद को तूल देता रहता है। लेकिन दक्षिण एशिया में भारत की मुख्य चुनौती चीन की निरन्तर बढ़ रही सामरिक व आर्थिक घुसपैठ है।
इस प्रकार वर्तमान में पश्चिम एशिया तथा दक्षिण एशिया दानो ही क्षेत्रों में भारत की कूटनीति अलग-अलग कारणों से चुनौती का सामना कर रही है। अब मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते व उसके दक्षिण एशिया में संभावित विस्तार के कारण इन दोनों क्षेत्रों में सामिरक कड़ियां जुड़ती जा रही हैं। इससें भारत की कूटनीतिक मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं। अतः भारत को इस क्षेत्र में नई सामरिक पहल करने की अवश्यकता है।
Leave a Reply