दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? आधुनिक संदर्भ में यह कितना प्रासंगिक है?
एकात्म मानववाद का विचार 1960 के दशक में दीनदयाल उपाध्याय ने दिया था। आज एकात्म मानववाद भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा है। हालाँकि, इसे एक अन्य भारतीय विचारक मानवेंद्र नाथ रॉय द्वारा प्रतिपादित ‘उग्र मानवतावाद’ (Radical Humanism) या ‘नव-मानवतावाद’ (Neo-Humanism) के विचार से नहीं मिलाना चाहिए।
उपाध्याय का एकात्म मानववाद मूल रूप से भारत के लिए व्यक्ति और राष्ट्र के समग्र विकास का एक वैकल्पिक मॉडल है। यह दो मुख्य मान्यताओं पर आधारित है:
पहली, हर राष्ट्र का अपना विकास मॉडल होना चाहिए जो उसकी अपनी प्रकृति और आत्मा के अनुकूल हो। बाहरी स्रोतों से लिए गए विकसित मॉडल भारत के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
दूसरी, विकास का अर्थ केवल संसाधनों और क्षमताओं का भौतिक विकास नहीं है, बल्कि इसमें व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का सर्वांगीण विकास शामिल है।
एकात्म विकास के विचार का विकास
दीनदयाल उपाध्याय ने 22-25 अप्रैल, 1965 के दौरान बॉम्बे में दिए गए अपने चार व्याख्यानों की श्रृंखला में एकात्म मानववाद की अवधारणा को विस्तार से समझाया। यह अवधारणा भारतीय संस्कृति और सभ्यता के सार तथा भारत के विकास की आधुनिक आवश्यकताओं की उनकी गहरी समझ पर आधारित है।
पहले व्याख्यान में, पंडित दीनदयाल इस बात पर खेद व्यक्त करते हैं कि स्वतंत्रता के बाद के भारत के पास विकास की अपनी कोई दृष्टि नहीं है और कोई नहीं जानता कि भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा। उनका मानना है कि किसी भी राष्ट्र के लिए अपना विकास ढांचा होना आवश्यक है जो उसकी प्रकृति और आत्मा के अनुकूल हो। इस व्याख्यान में वे यूरोप के प्रमुख विचारों जैसे राष्ट्र, लोकतंत्र, मार्क्सवाद और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की समीक्षा भी करते हैं और व्यक्ति के सभी पहलुओं का ध्यान रखने में उनकी अंतर्निहित कमजोरियों और सीमाओं को प्रदर्शित करते हैं।
दूसरे व्याख्यान में, वे भारतीय संस्कृति और मनुष्य की प्रकृति पर अपने विचारों को विस्तार से बताते हैं। उनका तर्क है कि मनुष्य में चार तत्व होते हैं – शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। यदि पश्चिमी ढांचा केवल शरीर और मन का ध्यान रखता है, तो भारतीय संस्कृति मनुष्य के प्रति समग्र दृष्टिकोण अपनाती है।
तीसरे व्याख्यान में, वे राष्ट्र के विचार और मनुष्य तथा समाज के बीच संबंधों को विस्तार से समझाते हैं। उनका तर्क है कि इंसान की तरह ही राष्ट्र की भी एक आत्मा (चित्ति या मूल भावना) होती है, जो अच्छे और बुरे का पैमाना है और यह भावना उस राष्ट्र के महान लोगों के ज़रिए दिखाई देती है। समाज और राज्य राष्ट्र के अधीन होते हैं। समाज और व्यक्ति के बीच कोई टकराव नहीं होता क्योंकि वे धर्म (कर्तव्य का स्वाभाविक नियम) से निर्देशित होते हैं, जो समाज का आधार है। धर्म कोई मज़हब या ईश्वर की पूजा का कोई खास तरीका नहीं है, बल्कि समाज का सार है, जो सभी को कर्तव्यों और नैतिक दायित्वों में बांधता है।
चौथे लेक्चर में, वे भारत के लिए आर्थिक व्यवस्था पर अपने विचार बताते हैं, जिसकी खासियत है सभी के लिए आजीविका के न्यूनतम साधन, विकेंद्रीकृत आर्थिक ढांचा और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश।
एकात्म मानववाद की मुख्य विशेषताएं क्या हैं?
ऊपर बताए गए चार लेक्चर की बातों के आधार पर, हम एकात्म मानववाद की इन मुख्य विशेषताओं की पहचान कर सकते हैं:
1. व्यक्ति सिर्फ़ शरीर और मन का समूह नहीं है। बल्कि उनमें बुद्धि और आत्मा भी होती है। इसलिए, व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का मतलब है सभी क्षमताओं का विकास।
2. अगर किसी व्यक्ति की आत्मा होती है, तो राष्ट्र की भी एक आत्मा या ‘चित्ति’ होती है। राष्ट्र तब बनता है जब लोगों में एकता की चेतना होती है और वे किसी साझा लक्ष्य से प्रेरित होते हैं। राष्ट्र की ‘चित्ति‘ या मूल चेतना उसे एक अलग पहचान देती है। भारत की ‘चिति’ क्या है? अगर हम भारत के वेदों, महान ऋषियों, बुद्ध, महावीर स्वामी या आधुनिक समय में महात्मा गांधी और अन्य लोगों के विचारों को देखें, तो पाते हैं कि संतुलन, सामंजस्य और तालमेल भारत की पहचान हैं – व्यक्ति के अलग-अलग तत्वों और लक्ष्यों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – के बीच संतुलन; आध्यात्मिक और भौतिक उपलब्धियों के बीच संतुलन; व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन; और व्यक्ति और पर्यावरण के बीच संतुलन। भारत के विकास के किसी भी मॉडल में इस संतुलन, सामंजस्य और तालमेल को शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन दुख की बात है कि भौतिक विकास पर केंद्रित मिश्रित अर्थव्यवस्था का मौजूदा मॉडल भारत की राष्ट्रीय ‘चित्ति‘ को नहीं दिखाता है।
3. पश्चिमी देशों में अपनाए गए समाज के एकांगी दृष्टिकोण् (समाज सिर्फ़ अपने-अपने हितों वाले व्यक्तियों का समूह है) केविपरीत, दीनदयाल समाज के ‘ऑर्गेनिक’ (जैविक) दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं, जहाँ व्यक्ति और समाज के बीच कोई टकराव नहीं होता और वे एक-दूसरे के पूरक होते हैं। समाज का हित सर्वोपरि होता है और व्यक्तिगत हितों को उसी के अनुसार समायोजित किया जाता है।
4. इसके अलावा, पश्चिमी विचारकों द्वारा राज्य को प्राथमिकता देने के विपरीत, दीनदयाल उपाध्याय ‘धर्म राज्य‘ के विचार का समर्थन करते हैं। यह कोई धार्मिक राज्य नहीं, बल्कि धर्म अथवा सार्वभौमिक नियमों पर आधारित राज्य है। दूसरे ब्दों में हम इसे राष्ट्र और समाज के स्वाभाविक नियमों और सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित राज्य कह सकते हैं। अतः उनके अनुसार राज्य इन सार्वभौमिक सिद्धांतों के अधीन होता है।
5. एकात्म मानववाद ऐसी आर्थिक व्यवस्था का समर्थन नहीं करता जो बहुसंख्यक आबादी की बदहाली की कीमत पर कुछ लोगों की बेलगाम उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर टिकी हो। यह ऐसी आर्थिक व्यवस्था की वकालत करता है जो मानव-केंद्रित हो और हर व्यक्ति के लिए जीवन के न्यूनतम स्तर की गारंटी और जीवन स्तर में सुधार की संभावना सुनिश्चित करती हो। उन्होंने ‘अंत्योदय‘ का विचार दिया, जो समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले लोगों के कल्याण की बात करता है।
आधुनिक समय में ‘एकात्म मानववाद‘ (Integral Humanism) कितना प्रासंगिक है?
आधुनिक समय में एकात्म मानववाद की प्रासंगिकता को इन बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
पहला, वैश्वीकरण, उदारीकरण और बाजार के दबदबे पर आधारित आधुनिक आर्थिक विकास मॉडल कुछ लोगों के लिए तो भारी समृद्धि पैदा करता है, लेकिन बहुत से लोगों के लिए दुख और गरीबी का कारण बनता है। विकास की इस विरोधाभासी स्थिति को एकात्म मानववाद पर आधारित विकास मॉडल को अपनाकर हल किया जा सकता है।
दूसरा, आधुनिक सभ्यता इंसान और समाज, एक देश और दूसरे देश, और साथ ही इंसान के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं के बीच संघर्ष और तनाव की नींव पर टिकी है। इसका सीधा सा कारण यह है कि हमने इंसान और समाज के साथ उसके जुड़ाव को समग्र रूप से नहीं देखा है। समग्र विकास और सामंजस्य पर आधारित एकात्म मानववाद संघर्ष और असंतुलन की इस चुनौती का समाधान कर सकता है।
तीसरा, वैश्विक समुदाय जलवायु परिवर्तन के अभूतपूर्व मानव-जनित संकट और असीमित मानवीय इच्छाओं को पूरा करने के लिए बेतहाशा भौतिक विकास के कारण पर्यावरण के भारी नुकसान से जूझ रहा है। अगर हम इंसान और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखें, तो ऐसे संकट पैदा नहीं होंगे। यही एकात्म मानववाद का संदेश है। आज की ज़रूरत प्रकृति पर इंसान का वर्चस्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ इंसान का तालमेल है। एकात्म मानववाद प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर इंसान के समग्र विकास की बात करता है और यही इस संकट का अंतिम समाधान है। समग्र विकास का विचार संसाधनों के उपभोग की हमारी असीमित इच्छाओं को नियंत्रित करेगा।
निष्कर्ष
दीनदयाल का एकात्म मानववाद का विचार भारत के विकास के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है। यह भारत की राष्ट्रीय भावना (‘चित्त्ति’) पर आधारित है और व्यक्ति तथा राष्ट्र के समग्र, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण विकास की वकालत करता है। असंतुलित विकास और बढ़ती असमानता, उपभोक्तावाद पर अत्यधिक जोर और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन को देखते हुए यह आधुनिक समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
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