पाकिस्तान ने साउदी अरब तथा तुर्की के साथ मिलकर 07 अगस्त 2026 को मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।
यह समझौता नाटो की तरह का एक सैनिक गठबन्धन है, क्योंकि इसमें भी यही कहा गया है कि एक देश पर बाहरी आक्रमण तीनो के विरूद्ध सैनिक आक्रमण माना जायेगा। सैद्धान्तिक व कानूनी दृष्टि से इसका मतलब यह है कि यदि भविष्य में भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध होता तो साउदी अरब तथा तुर्की पाकिस्तान की सैनिक मदद करेंगे। यह बात भारत के लिये चिन्ता की हो सकती है,क्योंकि भारत व पाकिस्तान के बीच सैनिक टकराव की संभावना हमेशा बनी रहती है। सैनिक टकराव नही भी हुआ तो भी पाकिस्तान को इस सैनिक गठबन्धन से सामरिक लाभ मिल सकता है तथा अपना अलगाव समाप्त करने में मदद मिल सकती है।
पाकिस्तान के लिये इतिहास की सीख क्या है?
इतिहास के बारे में यह कहा जाता है कि इतिहास कभी दोहराता नही है। यह बात इतिहास की घटनाओं के बारे में तो सही हो सकती है, इतिहास की सीख (Lessons) के बारे में नही। इतिहास की सीखें भिन्न घटनाओं में भी अपने को दोहराती रहती हैं। इसीलिये इतिहास से आधी-अधूरी सीख लेना हानिकारक है। लेकिन इतिहास से बिल्कुल सीख न लेना और अधिक हानिकारक है। पाकिस्तान मक्का सैन्य गठबन्धन में शामिल होकर सही भूल कर रहा है।
यह पहली बार नही है कि पाकिस्तान किसी सैनिक गठबन्धन का सदस्य बना है। जब शीत युद्ध अपनी चरम सीमा पर था तो पाकिस्तान ने ईरान, ईराक तुर्की, तथा ब्रिटेन के साथ मिलकर 24 फरवरी 1955 को बगदाद पैक्ट नामक सैनिक गठबन्धन पर हस्ताक्षर किये थे। बाद में जब 1959 में ईराक ने इस गठबन्धन को छोड़ दिया था तो इसका नाम बदलकर सैन्टो अथवा सेण्ट्रल ट्रीटी आर्गनाइजेशन (CENTO- Central Treaty Organization) रख दिया गया था। इस सैनिक गठबन्धन में भी यही प्रावधान था कि एक देश के विरूद्ध बाह्य सैनिक आक्रमण सभी देशों के विरूद्ध सैनिक आक्रमण माना जायेगा तथा सभी उसका मिलकर सामना करेंगे। इसी सैनिक गठबन्धन की सदस्यता के कारण पाकिस्तान गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का सदस्य नही बन पाया, क्योंकि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की सदस्यता की पहली शर्त यह थी कि उस देश को किसी सैनिक गठबन्धन में शामिल नही होना चाहिये।
इस सैनिक गठबन्धन का मूल उद्देश्य यह था कि पश्चिम एशिया में सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के साम्यवादी प्रभाव को रोक जाये। लेकिन पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य यह था कि किस प्रकार इस गठबन्धन से भारत की सैनिक बराबरी की जाये तथा उस पर सामरिक नाकेबन्दी की जाये।
इसी तरह पाकिस्तान ने इसके पहले 1954 में एक अन्य सैनिक संगठन सीटो अर्थात साउथ ईस्ट एशिया संन्धि संगठन (SEATO- South East Asia Treaty Organization) की सदस्यता ग्रहण की थी। इसमें अमेरिका भी था तथा साउथ ईस्ट एशिया के अन्य देश शामिल थे।
सेण्टो और सीटो की परीक्षा की घड़ी 1971 में आ गई, जब बांग्लादेश की स्वतंत्रता को लेकर भारत व पाकिस्तान के बीच बड़ा युद्ध हुआ। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस युद्ध में सेण्टो गठबन्धन के सहयेागी देश इसकी सैनिक मदद करेंगे। लेकिन सेण्टो गठबन्धन का कोई सदस्य देश पाकिस्तान की सैनिक मदद के लिये सामने नही आया। हां, अमेरिका ने इस युद्ध में आरभ में पाकिस्तान के समर्थन में भारत को धमकाने की कोशिश अवश्य की थी, लेकिन रूस के भारत के समर्थन में सामने आने पर वह भी पीछे हट गया। पाकिस्तान को अकेले भारत से युद्ध लड़ाना पड़ा। इस युद्ध में अपमानजनक हार के साथ ही पाकिस्तान को बांग्लादेश का क्षेत्र भी खोना पड़ा।
वर्ष 1977 में सीटो को भंग कर दिया गया। इसके बाद 1979 में सेण्टो को भंग कर दिया गया था। पाकिस्तान का सैनिक गठबन्धनों से मोह भंग हो गया तथा उसने 1979 में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की सदस्यता गहण कर ली। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन सदैव इस प्रकार के सैनिक गठबन्धनों का विरोधी रहा है।
सेण्टो को भंग हुये चार दशक से भी अधिक का समय हो गया है, और लगता है कि पाकिस्तान इतिहास की इस महत्वपूर्ण सीख को भूल गया है कि अपनी सुरक्षा के लिये अपनी क्षमता का होना आवश्यक है। इसीलिये पाकिस्तान ने 07 अगस्त 2026 को एक मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौता नामक एक नये गठबन्धन की सदस्यता ग्रहण कर ली है। मक्का संयुक्त प्रतिरक्षा समझौता में तीन सदस्य देशों की सैनिक क्षमतायें तो एक दूसरे की पूरक है, लेकिन तीनो के उद्देश्य अलग -अलग हैं। साउदी अरब एक तरफ ईरान तो दूसरी तरफ इजराइल से चिन्तित है, तुर्की इस क्षेत्र में अपना सामरिक प्रभाव बढ़ाने के साथ- साथ अपने प्रतिरक्षा उद्योग के लिये बड़ा बाजार खोज रहा है, वहीं पाकिस्तान इस समझौते से भारत के विरूद्ध सामिरक नाकेबन्दी कर भारत के साथ सैनिक बराबरी (Parity) खोज रहा है।
अपने जन्म से ही पाकिस्तान की भारत के साथ बराबरी करने की इच्छा इतनी प्रबल रही है कि उसे पाने के लिये वह हमेशा बाह्य शक्तियों की शरण खोजता रहा है- 1950 व 1960 के दशक में सेण्टो, 1970 व 1980 के दशक में अमेरिका, उसके बाद चीन तथा अब मक्का समझौता। भारत के साथ बराबरी का सपना पाकिस्तान के नीति निर्माताओं पर इतना अधिक हावी है कि वे अपनी नीतियों तथा इतिहास दोनो की कभी निष्पक्ष व्याख्या नही कर पाये।
पूर्वाग्रह से ग्रसित चाहे कोई व्यक्ति हो अथवा कोई देश हो, वह इतिहास से कभी भी सीख नही ले सकता है।
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