लाभ का पद’ (Office of Profit) क्या है? किन संवैधानिक पदाधिकारियों पर ‘लाभ का पद’ के कारण अयोग्यता लागू होती है?

‘संवैधानिक पदाधिकारी’ शब्द का अर्थ है वे पदाधिकारी जिनका उल्लेख भारत के संविधान में किया गया है। निम्नलिखित संवैधानिक पदाधिकारी ‘लाभ का पद’ के कारण अयोग्यता के दायरे में आते हैं-

1. अनुच्छेद 58(2) के तहत भारत के राष्ट्रपति; और अनुच्छेद 66 (4) के तहत भारत के उपराष्ट्रपति, अपने पद पर चुने जाने के लिये अर्ह नहीं हैं यदि वे केंद्र सरकार/राज्य सरकार/स्थानीय प्राधिकरण के अधीन ‘लाभ का पद’ धारण करते हैं। अनुच्छेद 64 में यह भी कहा गया है कि राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान भी कोई ‘लाभ का पद’ धारण नहीं करेंगे।

लेकिन उक्त नियम के कतिपय अपवाद है– उपरोक्त उद्देश्य के लिए, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और केंद्र व राज्य के मंत्रियों के पद को ‘लाभ का पद’ नहीं माना जाएगा। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति इन पदों पर है, तो वह राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के रूप में चुना जा सकता है, लेकिन चुनाव के बाद उसे ये पद छोड़ने होंगे।

2. अनुच्छेद 158 के अन्तर्गत, किसी राज्य का राज्यपाल कोई ‘लाभ का पद’ धारण नहीं करेगा।

3. अनुच्छेद 102(a) के अन्तर्गत संसद (दोनों सदनों) के सदस्य और अनुच्छेद 191(a) के अन्तर्गत राज्य विधानमंडल (दोनों सदनों) के सदस्य चुने जाने या पद पर बने रहने के लिए अयोग्य हो जाते हैं, यदि वे केंद्र/राज्य/स्थानीय सरकार के अधीन कोई ‘लाभ का पद’ धारण करते हैं।

इस संबन्ध में, केंद्र या राज्य के अंतर्गत मंत्री के पद को ‘लाभ का पद’ नहीं माना जाता है।

(a) कृपया ध्यान दें कि ये उक्त दोनों अनुच्छेद क्रमशः संसद और राज्य विधानमंडल के सदस्यों की ‘अयोग्यताओं‘ से संबंधित हैं। संसद के सदस्यों और राज्य विधानमंडल के सदस्यों, दोनों के लिए, नई अयोग्यताएं केवल संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से ही जोड़ी जा सकती हैं।

(b) फिर भी संविधान का अनुच्छेद 102(a) यह प्रावधान करता है कि संसद के सदस्यों के लिए, संसद कानून द्वारा किसी भी पद को ‘लाभ का पद’ की श्रेणी से अलग कर सकती है। इसी तरह, अनुच्छेद 191(a) राज्य विधानमंडल को राज्य विधानमंडल के सदस्यों के संबंध में राज्य सरकार के कुछ पदों को ‘लाभ का पद’ से बाहर करने का अधिकार देता है। कृपया (a) और (b) के बीच अंतर पर ध्यान दें।

संसद (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1959 – भारत की संसद ने अनुच्छेद 102(a) के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए 1959 में यह अधिनियम पारित किया और इसमें कई बार संशोधन करके संसद संसद सदस्यों के संबन्ध में कुछ सरकारी पदों को ‘लाभ के पद’ (office of profit) की श्रेणी से बाहर रखा है। उदाहरण के लिये इनमें से कुछ पद हैं: विपक्ष के नेता का पद, राष्ट्रीय सलाहकार समिति के अध्यक्ष, सरकार की रजिस्टर्ड सोसायटियों और ट्रस्टों के पदाधिकारी, यूनिवर्सिटी सीनेट और ऐसी ही अन्य संस्थाओं के सदस्य आदि।

इसका तात्पर्य यह है कि इन पदों को ‘लाभ का पद’ नहीं माना जाएगा और अगर संसद का कोई सदस्य इन पदों पर रहता है, तो उसे ‘लाभ के पद’ के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

लेकिन राज्य विधानमंडलों ने अनुच्छेद 191(a) के तहत राज्य विधानमंडल के सदस्यों के लिए ‘लाभ के पद’ की श्रेणी से पदों को बाहर रखने वाला कोई कानून नहीं बनाया है। यही कारण है कि ‘लाभ के पद’ से जुड़े ज़्यादातर विवाद राज्य विधानमंडल के सदस्यों के मामले में ही उठते हैं।

यह भी ध्यान रखें कि न्यायपालिका के सदस्यों को सरकारी कर्मचारी नहीं माना जाता है।

विधायिका के सदस्यों के ‘लाभ के पद’ पर रहने पर रोक क्यों?

संसद या राज्य विधानमंडल के सदस्यों के लिए सरकारी पदों पर रोक लगाने का मुख्य उद्देश्य ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) को लागू करना और हितों के टकराव (conflict of interests) से बचना है। तर्क यह है कि यदि विधायिका के सदस्य सरकारी पदों पर भी रहते हैं, तो वे सरकार से स्वतंत्र नहीं रह पाएंगे और अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं कर पाएंगे।

4.अनुच्छेद 317 के अन्तर्गत संघ/राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को भी अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी ‘सवेतन रोजगार’ (सरकारी या निजी) को करने से रोका गया है। हालांकि, इस अनुच्छेद में ‘लाभ के पद’ के बजाय ‘सवेतन रोज़गार’ (paid employment) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। दोनों के बीच अंतर यह है कि संविधान में ‘लाभ के पद’ का तातपर्य सरकार के अधीन किसी भी पद से है, जबकि ‘सवेतन रोज़गार’ में सरकारी रोजगार के अलावा निजी रोजगार भी शामिल है।

ऑफिस ऑफ़ प्रॉफ़िट‘ (लाभ का पद) क्या है?

संविधान में लाभ का पद शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन न तो संविधान में और न ही संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए किसी कानून में इसे परिभाषित किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए कुछ मानक तय किए हैं कि कोई पद लाभ का पद है या नहीं।

लाभ का पद तय करने के लिए पहला विस्तृत पांच-सूत्रीय मानदंड सुप्रीम कोर्ट ने 1964 में गुरु गोविंदा बसु और शंकरी प्रसाद घोषाल के मामले में तय किया था। ये पांच मापदण्ड हैं-

1. नियुक्ति करने वाला अधिकारी (Appointing Authority): क्या सरकार के पास संबंधित पद पर नियुक्ति करने की शक्ति है? यदि हाँ, तो वह पद लाभ का पद है।

2. हटाने की शक्ति (Removal Power): क्या सरकार के पास पद संभालने वाले व्यक्ति को हटाने की शक्ति है? यदि हाँ, तो वह पद लाभ का पद है।

3.पारिश्रमिक का स्रोत (Remuneration Source): पद से जुड़े वेतन या पारिश्रमिक का भुगतान कौन करता है? यदि सरकार पारिश्रमिक का भुगतान करती है, तो वह पद लाभ का पद है।

4. वेतन का निर्धारण (Determination of Pay): क्या भुगतान की राशि तय करने या निर्णय लेने में सरकार की कोई भूमिका है? यदि हाँ, तो वह पद लाभ का पद है।

5. कार्यात्मक नियंत्रण (Functional Control): क्या सरकार पदाधिाकरी के दैनिक कार्यों के निष्पादन पर सीधा नियंत्रण और पर्यवेक्षण रखती है? यदि हाँ, तो वह पद लाभ का पद है।

यदि उपरोक्त शर्तें पूरी होती हैं, तो संबंधित पद लाभ का पद माना जाता है।

बाद के फैसलों में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने काफी हद तक इसी परिभाषा का पालन किया है, लेकिन कुछ बिंदुओं को स्पष्ट भी किया है।

उदाहरण के लिए, जया बच्चन बनाम भारत संघ (2006) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पद संभालने वाले व्यक्ति को वास्तव में मौद्रिक लाभ मिलना ज़रूरी नहीं है। यदि संबंधित पद में मौद्रिक लाभ का प्रावधान है, तो वह लाभ का पद होगा, भले ही उस पद पर आसीन व्यक्ति ने उस पद के लिए कोई पारिश्रमिक न लिया हो।

सुप्रीम कोर्ट ने पी.ए. संगमा बनाम प्रणब मुखर्जी (2013) मामले में स्पष्ट किया कि ‘लाभ’ में आवास या वाहन सुविधा जैसे गैर-मौद्रिक लाभ भी शामिल हैं।

इस प्रकार, अब न्यापालिका अधिकांशतः तक उपरोक्त पांच-सूत्रीय मानदंडों के आधार पर लाभ का पद का निर्धारण करती हैं।

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