भारतीय लोकतंत्र पर डिजिटल टेक्नोलॉजी का क्या प्रभाव है?

वर्तमान में डिजिटल टेक्नोलॉजी का प्रयोग हमारी इच्छा पर निर्भर नही करता वरन् विकास तथा परिवर्तन के लिये यह अपरिहार्य है। डिजिटल टेक्नोलॉजी ने सामाजिक अन्तःक्रिया से लेकर प्रशासन और लोकतंत्र तक मानव जीवन के सभी पहलुओं में अपनी जगह बना ली है। डिजिटल टेक्नोलॉजी को सुशासन के एक साधन के तौर पर देखा गया है, क्योंकि यह शासन में गति, पारदर्शिता तथा जवाबदेही लाती है। हालांकि, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में डिजिटल टेक्नोलॉजी का असर बहुत ज़्यादा है, लेकिन इस पर कम रिसर्च हुई है। लोकतंत्र के काम करने के तरीके पर इसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव हो सकते हैं।

आइ0 जी0 आई0 ग्लोबल (IGI Global) के अनुसार, डिजिटल टेक्नोलॉजी का तात्पर्य है ‘डिजिटल प्रणालियों, साधनों और उपकरणों का प्रयोग है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में सूचना का प्रसंस्करण, भंडारण तथा और संचरण करते हैं। इसमें कंप्यूटर, स्मार्टफोन, सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन जैसी नई टेक्नोलॉजी सहित कई तरह की तकनीकि शामिल हैं।’ अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ईमेल, मोबाइल और अब ए0 आई0 समाज में सबसे लोकप्रिय डिजिटल टेक्नोलॉजी साधन हैं। भारत ने नेशनल ई-गवर्नेंस प्लान (2006), डिजिटल इंडिया मिशन (2015), इंडिया ए0आई0 मिशन (2024) और कई दूसरे प्रशासनिक और कानूनी उपायों के माध्यम से शासन में डिजिटल टेक्नोलॉजी के विकास और प्रयोग को बढ़ावा दिया है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर डिजिटल टेक्नोलॉजी का सकारात्मक प्रभाव

1. चुनावी प्रक्रिया का प्रबन्धन

डिजिटल टेक्नोलॉजी के प्रयोग से चुनावी प्रक्रिया में कुशलता बढ़ती है। उदाहरण के लिए, भारत में 92 करोड़ से अधिक मतदाता है तथा यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत में मतदाताओं के  पंजीकरण, मतदाता सूची को अद्यतन बनाने, वोटिंग प्रक्रिया के प्रबन्धन और समन्वय, तुरंत मतगणना आदि के लिए सफलतापूर्वक डिजिटल टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जा रहा है। नागरिक मतदाता पंजीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं और अपने आवेदन की प्रगति को आनलाइन देख सकते हैं। चुनावों में मतगणना एक थकाऊ प्रक्रिया रही है। अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों ने वोटों की शीघ्र और बिना किसी गलती के गिनती और नतीजों की घोषणा को आसान बना दिया है। 1982 में, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को पहली बार केरल में उपचुनाव के लिए प्रयोग किया गया था। लोक सभा चुनाव की सभी सीटों पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन का प्रयोग सबसे पहले 2004 के लोक सभा चुनावों में किया गया था।

21वीं सदी के पहले दो दशकों में भारतीय चुनावों में डिजिटल तकनीकि का अधिक प्रयोग देखा गया है। चुनाव आयोग ने 17वें आम चुनाव से पहले डिजिटल टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर फायदा उठाया है।

 इस तरह, डिजिटल टेक्नोलॉजी चुनावी प्रकिया का प्रबन्धन व संचालन आसान बनाती है। भविष्य में डिजिटल वोटिंग व्यवस्था लागू हो सकती है, जहाँ नागरिकों को अपने घरों से वोटिंग की सुविधा मिलेगी, जिससे समय के साथ ही प्रशासनिक खर्च भी बचेगा।

2. डिजिटल टेक्नोलॉजी लोकतंत्र में पारदर्शिता बढ़ाती है

डिजिटल टेक्नोलॉजी में चुनावी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में पारदर्शिता लाने की क्षमता है। डिजिटल टेक्नोलॉजी का मुख्य लाभ यह है कि इसमें आसानी से छेड़खानी नहीं की जा सकती है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और ई-वोटर पहचान पत्र के प्रयोग से फर्जी मतदान और बूथ कब्जा करने की संभावना कम हो गई है। बूथ कब्जा लंबे समय से भारतीय चुनावों की एक बड़ी समस्या रही है।

भारत में फोटो युक्त मतदाता सूची सबसे पहले 2009 के आम चुनावों के दौरान प्रयोग में लाई गई थी। अब पूरे देश में फोटो युक्त मतदाता सूची लागू हो गयी है। इससे दूसरे के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मतदान की संभावना कम हो गई है।

वर्ष 2021 में भारत ने पहली बार ई-वोटर पहचान पत्र शुरू किए हैं। इनमें कोई हेरफेर नहीं हो सकता। उल्लेखनीय है कि अगस्त, 2026 में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत के मतदाता पहचान पत्र की प्रशंसा की तथा वहां भी कानून बनाकर मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य किया जा रहा है।

3. मतदाताओं की जागरूकता

डिजिटल टेक्नोलॉजी के प्रयोग से मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया तथा चुनावी मुद्दों के बारे में जागरूक करने में भी मदद मिली है। चूंकि चुनाव से जुड़ी सभी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है, इसलिए मतदाता इसे बटन के एक क्लिक से देख सकते हैं। मतदाता किसी भी गलतफहमी की स्थिति में वास्तविक समय में (रियल टाइम बेसिस पर) अपना फीडबैक भी शेयर कर सकते हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी ने चुनाव एजेंसियों को सभी राज्य वोटरों के साथ रियल टाइम बेसिस पर जानकारी और डेटा शेयर करने में भी मदद की है। भारत में चुनाव आयोग ने नेशनल वोटर सर्विस पोर्टल (NVSP) शुरू किया है, जो एक सुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है। इसका उद्देश्य नागरिकों को मतदाताओं से संबन्धित सभी सेवाओं के लिए सिंगल विंडो सिस्टम के ज़रिए बिना किसी परेशानी के ऑनलाइन सेवाएं देना है।

4. लागत की कमी तथा पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित

लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव व प्रचार व्ययसाध्य कार्य हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी तेज़ होने के साथ-साथ कम लागत वाली तथा पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। डिजिटल टेक्नोलॉजी के प्रयोग से, चुनावी प्रक्रिया में कागज का प्रयोग कम हो जाता है क्योंकि बहुत सारा डेटा और जानकारी इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में सुरक्षित रूप से रखी जा सकती है। कागज़ का उत्पादन व प्रयोग कार्बन-उत्सर्जक है। कागज़ों का इस्तेमाल कम करने से चुनाव प्रकिया पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित मानी जा सकती है।

5.   राजनीतिक दलों के लिए प्रचार में आसानी

चुनावों में, खासकर भारत जैसे बड़े चुनाव क्षेत्रों वाले देशों में, प्रचार करना समय और पैसे की बर्बादी वाला काम है। वर्तमान में राजनीतिक दल भी चुनाव में डिजिटल साधनों का अधिकाधिक प्रयोग कर रहे है, जिससे नागरिकों को राजनीतिक विषयों की जानकारी प्राप्त करने तथा उन पर अपना लोकमत बनाने में मदद मिलती है। डिजिटल टेक्नोलॉजी ने कई सोशल मीडिया साधन दिए हैं, जिनका प्रयोग राजनीतिक दल मतदाताओं तक अपने संदेश और दूसरी जानकारी तुरंत (रियल-टाइम में) पहुँचाने के लिए कर सकते हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी की पहुँच बहुत दूर तक और गतिवान है। राजनीतिक दल मतदाताओं से तुरंत प्रतिक्रिया (फीडबैक) भी पा सकते हैं और इस तरह मतदाताओं और राजनीतिक व्यवस्था के बीच एक कड़ी के रूप में काम कर सकते हैं। चुनाव प्रचार का खर्च एक बड़ा मुद्दा है और यह कई अच्छे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकता है।

एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘एलिगो’ (2024) ने आधुनिक चुनावों में डिजिटल वोटिंग सिस्टम के 10 आश्चर्यजनक फायदे बताए हैं: समय की बचत, कम लागत, सभी मतदाताओं तक पहुँच, बेहतर सुरक्षा, पर्यावरण पर कम प्रभाव, सुविधा और लचीलापन, पारदर्शिता और जवाबदेही, आसान मतदान प्रक्रिया, भागीदारी की दर में बढ़ोतरी, और रियल-टाइम देख-रेख तथा विश्लेषण।

लोकतंत्र में डिजिटल टेक्नोलॉजी के नकारात्मक प्रभाव

जैसा कि ऊपर बताया गया है, डिजिटल टेक्नोलॉजी दोधारी तलवार की तरह है। शक्तिशाली लोगों और राजनीतिक दलों के पक्षपाती राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए इसका गलत प्रयोग और इसमें हेर-फेर किया जा सकता है। इसके कतिपय नकरात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं-

1.   सोशल मीडिया पर पक्षपाती दृष्टिकोण व आख्यान (नरेटिव) का बोलबाला

2.   झूठी खबरें, गलत जानकारी और नफरत फैलाने वाले भाषण (हेट स्पीच)

3.   साइबर सुरक्षा और डिजिटल हेर-फेर की चुनौतियाँ

4.   डिजिटल अंतर (डिजिटल डिवाइड) और पहुँच की समस्या। डिजिटल डिवाइड का तात्पर्य है कि डिजिटल तकनीकि तक समाज के सभी वर्गों की पहुंच समान नही है।

इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के प्रयोग को लेकर विवाद

वर्ष 2024 के लोक सभा के आम चुनावों के दौरान, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) में हेरफेर का मुद्दा सामने आया। कई विपक्षी दलों ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की है। हालाँकि, सरकार ने इस आरोप का पुरजोर खंडन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के स्थान पर पेपर बैलेट की मांग को ‘पीछे ले जाने वाला कदम’ बताया है। ऐसे सवाल दूसरे देशों में भी उठाए जाते हैं। हालाँकि चुनाव संचालन में तकनीकी सुधार काफी लाभदायक हो सकते हैं, लेकिन इन लाभों के साथ-साथ नई कमजोरियों और समस्याओं की संभावनाओं को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए, जिन कई देशों ने ई-वोटिंग का प्रयोग किया था, वे अब सुरक्षा कारणों से पेन और पेपर (पारंपरिक तरीका) पर वापस लौट रहे हैं या अपने ई-वोटिंग के पायलट योजनाओं को बंद कर रहे हैं।

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