पंथ निरपेक्षता का क्या अर्थ है ? भारतीय संविधान में इसे कैसे लागू किया गया है तथा इसकी क्या चुनौतियां हैं ?

पंथनिरपेक्षता की पश्चिमी धारणा

पंथनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) एक पाश्चात्य धारणा है। सेक्युलर (secular) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के सैक्युलम (saeculum) शब्द से हुई, जिसका शाब्दिक अर्थ है- इहलौकिक अथवा (पारलौकिक जगत के विपरीत) इस संसार से संबन्धित। 13वीं शताब्दी में यह शब्द पुरानी फ्रांसीसी भाषा के सेकुलेर (seculer) केरूप में आया तथा इसका अर्थ सांसारिक को पारलौकिक को अलग करने के रूप में या जाने लगा। वर्तमान में फ्रांस में पंथनिरपेक्षता को साइसीटे (Laicite) के रूप में क्रियान्वित किया गया है, जिसका अर्थ है पंथ को राजनीति से पृथक करना तथा पंथ के प्रति राज्य की तटस्थता।  लगभग इसी अर्थ में अन्य पश्चिमी देशों में पंथनरिपेशता का अर्थ लिया जाता है। पंथनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग सबसे पहले ब्रिटिश विचारक जार्ज होलियोक (George Holyoake) ने 1851 में किया था।

निष्कर्षतः पश्चिमी धारणा में पंथनिरपेक्षता का तात्पर्य है राजनीति व धर्म के बीच अलगाव करना तथा पंथ के मामले में राज्य की तटसथता बनाये रखना। यह विचार वास्तव में यूरोप में आधुनिक युग में चर्च की राजनीतिक मामलों में अधिक सत्ता के विरूद्ध प्रतिक्रियास्वरूप विकसित हुआ है।

पंथनिरपेक्षता की भारतीय धारणा

लेकिन भारत में पंथ निरपेक्षता की धारणा पश्चिमी धारणा से भिन्न है। इसका समझनें के पहले यह जानना आवश्यक है कि भारत का धर्म शब्द अग्रेजी के रिलीजन का हिन्दी रूपान्तर नही है, क्योंकि जहां रिलीजन अथवा पंथ का तात्पर्य पारलौकिक शक्तिों में विश्वास तथा पूजा-पाठ की विशेष पद्धति से है, वहीं धर्म का तात्पर्य कर्तव्य तथा नैतिक आचरण से है। अतः सेक्युलरिजम के लिये पंथनिरपेक्षता के स्थान पर धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग अनुचित है।

भारत में पंथनिरपेक्षता की धारणा का भारतीय परिस्थितियों के आलोक में विकास संविधान निर्माण के समय हुआ। पश्चिमी देशों के विपरीत भारत एक बहुधर्मी देश है तथा यहां धार्मिक भावनायें भी अधिक मजबूत हैं। इस धारणा के विकास में राजनीति में पंथ के स्थान पर गांधी व नेहरू के विचारों का विशेष योगदान है। गांधी जी के अनुसार पंथनिरपेक्षता कातात्पर्य है- सर्व धर्म समभाव, अर्थात सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार। इसके विपरीत नेहरू के अनुसार पंथनिरपेक्षता का तात्पर्य पंथ के प्रति राज्य की तटसथता व अलगाव से है। इन दोनो विचारों के समन्वय से ही भारत में पंथनिरपेक्षता की धारणा का विकास हुआ है।

फिर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाये तो सर्वधर्म समभाव ही भारतीय पंथ निरपेक्षता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।

इस प्रकार हम कह सकते है कि यूरोप में पंथ निरपेक्षता की धारणा नकारात्मक है, क्यांकि वह पंथ को राजनीति से न मिलाने तक सीमित है। इसके विपरीत भारत की पंथनिरपेक्षता की धारणा सकारात्मक है, क्योंकि वह सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार का समर्थन करती है। भारत में राज्य को कोई राज्य पंथ नही है, लेकिन पश्चिम की तरह भारत का राज्य पंथ की ओर पूरी तरह से उदासीन भी नही है।

भारतीय संविधान में पंथ निरपेक्षता

यद्यपि भारत के संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता शब्द 42वें संविधान संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया लेकिन भारत का संविधान आरंभ से ही पंथनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर आधारित रहा है। प्रस्तावना के अलावा संविधान के निम्न तत्व पंथनिरपेक्षता की स्थापना करते हैं-

  1. अन्य देशों की तरह भारत के संविधान के अन्तर्गत भारत में राज्य का कोई अपना राज्य पंथ (स्टेट रिलीजन) नही है।
  2. धर्म के आधार पर  नागरिको के बीच भेद-भाव की मनाही- अनुच्छेद14, 15, तथा 16. इसका तात्पर्य है कि राज्य की दृष्टि में सभी धर्म के लोग समान हैं।सर्वधर्म समभाव ही भारतीय पंथनिरपेक्षता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
  3. सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार; अनुच्छेद 25-28
  4. अल्पसंख्यकों की भाषा, संस्कृति तथा अनय अधिकारों का संरक्षण- अनुच्छेद 29-30
  5. बोम्माई वाद, 1994 में अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को सेविधान के आधारभूत ढ़ांचे (Basic Structure) का अंग माना है।  

उक्त तत्वों को भारत की पंथनिपेक्षता की विशेषतायें भी कहा जा सकता है।

भारत में पंथनिरपेक्षता की चुनौतियां

भारत में पंथनिरपेक्षता की दो आधारभूत चुनौतियां है-

  1. प्रमुख राजनीतिक समूहों/दलों के बीच पंथनिरपेक्षता के व्यवहारिक रूप पर मतैक्य का अभाव- भारत के राजनीतिक दलों में इस बात की सहमति नही पैथनिरपेक्षता का व्यवहारिक स्वरूप क्या हो।
  2. पंथनिरपेक्षता की राजनीतीकरण- राजनीतिक दलों द्वारा अपने राजनीतिक लाभ की दृष्टि से पंथनिरपेक्षता को लागू किया जाता है।

उक्त दोनो तत्वों का मिलाजुला प्रभाव यह है कि जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी नीतियों को वास्तविक पंथनरिपेक्षता का रूप बताती है तथा विपक्षी दलों विशेषकर कांग्रेस पंथनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण का अरोप लगाती है, वहीं विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी पर हिन्दू राष्ट्रवाद को प्रोतसाहित करने का आरोप लगाते हैं। कोई भी राजनीतिक दल अपना राजनीतिक समर्थन बढ़ानें के लिये जनता की धार्मिक भावनाओं का प्रयोग करने से नही चूकता। इस प्रकार भारत की राजनीति में पंथनरिपेक्षता वोट की राजनीति का शिकार हो गई है।

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