वन नेशन वन इलेक्शन का तात्पर्य है कि भारत में लोक सभा व राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होंगे। वन नेशन वन इलेक्शन की व्यवस्था को लागू करने के लिये केन्द्र सरकार ने दिसम्बर 2024 में लोकसभा में 129वां संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया है। इस विधेयक पर विचार करने करने के लिये दिसम्बर 2024 में ही पी0 पी0 चौधरी की अध्यक्षता में दोनो सदनों की एक 39 सदस्यीय (27 लोक सभा तथा 12 राज्य सभा) संयुक्त समिति का गठन किया था। समिति ने अगस्त 2026 तक अपनी रिपार्ट नही दी है, लेकिन अगस्त 2026 में समिति के अध्यक्ष ने यह वक्तव्य दिया है कि पूर्व न्यायाधीशों तथा विशेषज्ञों ने वन नेशन वन इलेक्शन के प्रस्ताव का समर्थन किया है। समिति की रिपार्ट आने के बाद इस विधेयक पर संसद के दोनो सदनों में वचार किया जायेगा।
वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक की पृष्ठभूमि
वन नेशन वन इलेक्शन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिये क्रेन्द्र सरकार ने सितम्बर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। समिति ने व्यापक विचार विमर्श के बाद एक साल बाद अपनी रिपोर्ट सैोंपी, जिसे केन्द्र सरकार द्वारा सितम्बर 2024 में स्वीकार कर लिया गया। इस समिति की प्रमुख संस्तुतियों निम्नवत हैं-
- पहले चरण में लोक सभा तथा राज्य विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराये जायें
- दूसरे चरण में स्थानीय संस्थाओं जैसे पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के चुनाव भी इन्हीं के साथ कराये जायें।
- लोक सभा तथा विधान सभा के चुनाओं के लिये एक ही मतदाता सूची तैयार की जाये।
उल्लेखनीय है कि भारत में वन नेशन वन इलेक्शन का विचार नया नही है।
सबसे पहले 1983 में चुनाव आयोग ने लोक सभा व विधान सभा चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया था।
इसके बाद 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में यह सुझाव दिया था कि लोक सभा व विधान सभा के चुनाव एक साथ कराये जायें लेकिन यदि किसी विधान सभा का तब तक कार्यकाल पूरा नही हुआ हो तो चुनाव के परिणाम उसका कार्यकाल पूरा हाने के बाद घोषित किये जायें। बाद में 2018 में विधि आयोग ने पांच साल में केवल दो बार चुनाव कराने का सुझाव दिया था तथा सभी चुनाव इन दो बार में ही करा लिये जायें।
नीति आयोग ने 2017 में अपने विमर्श पत्र में भी वन नेशन वन इलेक्शन का समर्थन किया था।
वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक से संविधान के कौन से अनुच्छेद प्रभावित होंगे?
इस विधेयक द्वारा सेविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ा जायेगा, तीन अनुच्छेदों में संशोधन होगा तथा केन्द्र शासित प्रदेशों की विधान सभाओं के लिये तीन कानूनों में संशोधन किया जायेगा, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
- नया अनुच्छेद 82 अ जोड़ा जायेगा जिसमें निम्न बातें शामिल होंगी-
राष्ट्रपति नई लोक सभा के गठन के बाद उसकी पहली बैठक की तिथि को नियत तिथि अथवा अपाइन्टेड डेट घोषित करेगे तथा इसी तिथि से लोक सभा व राज्य विधान सभाओं का पांच वर्ष का कार्यकाल गिना जायेगा। इस तिथि से पांच वर्ष की अवधि पर दोनो के चुनाव एक साथ कराये जायेंगे।
यदि कोई विधान सभा किसी करण जैसे अविश्वास प्रस्ताव आदि के कारण पांच वर्ष के पहले भंग हो जाती है तो उनका चुनाव पांच साल के िलये नही वरन नियत तिथि तक बचे हुये कार्यकाल के लिये ही कराया जायेगा। चुनाव आयोग किसी विशेष परिस्थिति में किसी राज्य के विधान सभा चुनाव को रोक भी सकता है।
ऐसी व्यवस्था वर्तमान में पंचायतों व नगरपालिकाओं के चुनाव में लागू है।
ब– तीन अनुच्छेदों में संशोधन
अनुच्छेद 83 में लिखा जायेगा कि यदि लोक सभा किसी कारण पांच वर्ष के पहले भंग हो जाती है तो उनका चुनाव पांच साल के लिये नही, वरन नियत तिथि तक बचे हुये कार्यकाल के लिये ही किया जायेगा। लेकिन इसे नई लोक सभा माना जायेगा।
अनुच्छेद- 172 में लिखा जायेगा कि यदि विधान सभा किसी कारण पांच वर्ष के पहले भंग हो जाती है तो उनका चुनाव पांच साल के लिये नही, वरन नियत तिथि तक बचे हुये कार्यकाल के लिये ही किया जायेगा।
अनुच्छेद 327 में संशोधन कर संसद को एक साथ चुनाव (Simultaneous Elections) कराने के लिये भी कानून बनाने का अधिकार दिया जायेगा।
स. तीन कानूनों में संशोधन
भारत के तीन केन्द्र शासित प्रदेशों में विधान सभा का गठन किया गया है। इन विधान सभाओं के चुनाव भी लोक सभा के चुनाओं के साथ कराने का प्रावधान इस विधेयक में है। अतः तीन केन्द्र शासित प्रदेशों में विधान सभा के गठन का प्रावाधन जिन तीन कानूनों में किया गया है उनमें भी संशोधन किया जायेगा। ये तीन कानून हैं-
केन्द्र-शासित प्रदेश सरकार अधिनयम 1963 (पंडिचेरी विधान सभा)
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अधिनयम, 1991 (दिल्ली विधान सभा)
जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (जम्मू व कश्मीर विधान सभा)
वन नेशन वन इलेक्शन के सकारात्मक पक्ष
सरकार तथावन नेशन वन इलेक्शन के समर्थक निम्न तर्कों के आधार पर उसका समर्थन करते हैं-
- समय व प्रशासनिक व्यय में कमी- एक साथ चुनाव कराने से उस व्यय में कमी आयेगी जो अलग-अलग चुनावों में होती है। इससे समय की बचत भी होगी।
- नीति की निरन्तरता- चुनावों की घोषणा के समय चुनाव आचार संहिता लगने के कारण नीतिगत निर्णय स्थगित कर दिये जाते है, जिससे नीतियों की निरन्तरता में व्यवधान आता है।
- विकास कार्यों में रोक नही– बार-बार चुनाव होने सेविकास कार्यों में भी व्यवधान होता है, क्योंकि प्रशासन तथा सरकार सभी चुनावों में संचालन में व्यस्त रहते है।
वन नेशन वन इलेक्शन के विरोध में तर्क
- आरंभ में अधिक व्यय- भारत में एक साथ चुनाव कराने के लिये बड़े पैमाने पर वोटिंग मशीनों तथा अन्य ढ़ांचागत सुविधाओं का इन्तजाम करना होगा, जिसमें आरंभ में अधिक धन के व्यय की आवश्यकता होगी।
- मध्यावधि चुनाव बार-बार होने से भी व्यय अधिक होगा- वन नेशन वन इलेक्शन में किसी कारण से यदि लोक सभा अथवा विधान सभायें बीच में भंग होती हैं तो नये चुनाव पांच साल के लिये नही वरन बचे हुये समय के लिये होंगे। यदि ऐसा बार-बार होता है तो व्यय में कोई बचत नही होगी।
- क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को नुकसान- एक साथ चुनाव होने पर क्षेत्रीय मुद्दे चुनाव में दब जायेंगे तथा क्षेत्रीय दलों को इससे नुकसान होगा। साथ ही क्षेत्रीय समस्याओं की ओर ध्यान कम हो जायेगा।
- संघात्मक व्यवस्था की भावना के विपरीत– भारत की संघात्मक व्यवस्था में संविधान के अन्तर्गत राज्यों की विधान सभा का अलग अस्तित्व है। विधान सभाओं के कार्यकाल को लोक सभा के कार्यकाल पर निर्भर बना देना संघात्मक भावना के विपरीत है।
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