भारत ने 2025 में सरदार वल्लभभाई पटेल (1875-1950) की 150वीं जयंती मनाई। सरदार पटेल ने देश को एकजुट करने और भारत में एक स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था बनाने का रास्ता तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। सरदार वल्लभभाई पटेल को एक महान स्वतंत्रता सेनानी, भारत की एकता का प्रतीक, व्यावहारिक सोच रखने वाले दूरदर्शी और आधुनिक भारत के संकट-मोचक (crisis manager) के तौर पर देखा जाता है।
उनकी विरासत के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित है-
- एक महान स्वतंत्रता सेनानी: खेड़ा और असहयोग आंदोलन
पटेल ने बॉम्बे प्रांत के गोधरा, बोरसद और आनंद में बैरिस्टर के तौर पर अपना करियर शुरू किया। बाद में, उन्होंने लंदन के मिडिल टेम्पल में 36 महीने का लॉ कोर्स पूरा किया। इंग्लैंड से लौटने के बाद, वे अहमदाबाद चले गए, जहाँ वे जल्द ही एक प्रमुख बैरिस्टर बन गए और अपनी दलीलों में कुशल और ज़बरदस्त माने जाने लगे। लेकिन किस्मत में उनके लिए एक बड़ी भूमिका लिखी थी; अक्टूबर 1917 में गोधरा में हुई गुजरात पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस के दौरान वे पहली बार महात्मा गांधी के संपर्क में आए। खेड़ा सत्याग्रह को संगठित करने में गांधी के बाद दूसरे प्रमुख व्यक्ति के तौर पर पटेल को चुना गया, क्योंकि गांधी चंपारण और अन्य जगहों पर कई ज़रूरी कामों में व्यस्त थे। खेड़ा के किसान फसल खराब होने और प्लेग की महामारी के कारण अंग्रेजों द्वारा लगाए गए भारी टैक्स नहीं चुका पा रहे थे। पटेल ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को ज़मीन का लगान न देने के लिए प्रोत्साहित किया । पटेल के साथ बातचीत के बाद, अधिकारी न केवल एक साल के लिए टैक्स की वसूली रोकने पर सहमत हुए, बल्कि टैक्स की दर कम करने पर भी सहमत हो गए।
खेड़ा में मिली सफलता के बाद, 1920 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आह्वान के दौरान पटेल बॉम्बे प्रांतों में एक प्रमुख नेता के रूप में उभरे। इस आंदोलन के दौरान पटेल ने पश्चिमी कपड़े छोड़ दिए और खादी अपना ली; उन्होंने 3 लाख से ज़्यादा वॉलंटियर्स को भर्ती किया और आंदोलन के लिए 15 लाख रुपये का फंड इकट्ठा किया।
1923 में, ब्रिटिश सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर भारतीय झंडा फहराने पर रोक लगा दी। पटेल ने इस रोक का विरोध करने के लिए वॉलंटियर्स की मदद से नागपुर में कई जुलूस निकाले। आखिरकार, उन्होंने सरकार के साथ एक समझौता किया जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों पर भारतीय झंडा फहराने की अनुमति मिल गई। इसे ‘झंडा सत्याग्रह’ के नाम से जाना जाता है।
- बारदोली सत्याग्रह: ‘सरदार‘ का उदय
एक बेहतरीन संगठनकर्ता और निर्भीक नेता के तौर पर पटेल की योग्यता तब सामने आई जब उन्होंने 1928 में गुजरात में बारदोली सत्याग्रह का आयोजन किया। यह सत्याग्रह किसानों द्वारा सामना किए जा रहे भीषण सूखे के बीच ज़मीन के लगान में बढ़ोतरी का विरोध करने के लिए किया गया था। चार महीने के कड़े विरोध के बाद, पटेल ने सरकार के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत ज़मीन के लगान में की गई बढ़ोतरी को वापस ले लिया गया और किसानों को ज़ब्त की गई ज़मीन और संपत्ति वापस कर दी गई। बारदोली सत्याग्रह के दौरान ही बारदोली की महिलाओं ने पटेल के नेतृत्व गुणों को देखते हुए उन्हें अनौपचारिक रूप से ‘सरदार’ की उपाधि
इसी दौरान, पटेल को 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन के लिए अध्यक्ष चुना गया, जहाँ उनके कुशल मार्गदर्शन और नेतृत्व में कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता पर प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में भारत में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना, श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन का प्रावधान और छुआछूत को खत्म करने जैसे कई प्रगतिशील उपाय भी शामिल थे।
3.भारत छोड़ो आंदोलन और पटेल
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, सरदार पटेल ने एक बार फिर जन-आंदोलन को संगठित करने की अपनी कुशलता का प्रदर्शन किया। उन्होंने पूरे देश में अपने भाषणों के ज़रिए लोगों का समर्थन जुटाया और उन्हें कर (टैक्स) न देने, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने और सभी सार्वजनिक सेवाओं को बंद करने के लिए प्रेरित किया। 7 अगस्त, 1942 को बॉम्बे के गोवालिया टैंक में एक लाख से ज़्यादा लोगों की भीड़ के सामने दिए गए उनके भाषण का भारतीय राष्ट्रवादियों पर ज़बरदस्त असर हुआ:
“इस बार का उद्देश्य है जापानियों के आने से पहले भारत को आज़ाद कराना और अगर वे आ जाएँ तो उनसे लड़ने के लिए तैयार रहना।——- यह ज़िंदगी का एक ऐसा मौका होगा जो बार-बार नहीं मिलता” ।पटेल को 9 अगस्त, 1942 को गिरफ़्तार किया गया और कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ अहमदनगर में जेल में रखा गया। वे जून 1945 में बाहर आए।
4.देशीरियासतों का विलय
अगला बहुत मुश्किल काम था 562 रियासतों को भारत संघ में मिलाना। रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे या तो भारत में शामिल हों, या पाकिस्तान में, या फिर स्वतंत्र बनी रहें। इस मुश्किल काम के लिए फिर से पटेल को चुना गया। पटेल ने अपनी कूटनीतिक समझ और दृढ़ संकल्प के साथ बहुत कम समय में इस चुनौती का सामना किया। उन्होंने अपनी बातचीत की कला से रियासतों के शासकों को मनाया और भारतीय संघ में शामिल होने के लिए ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन’ (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर करवाने के लिए ‘गाजर और छड़ी’ (कैरेट एन्ड स्टिक) दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया।
पटेल को अपने मिशन में ज़बरदस्त कामयाबी मिली, क्योंकि 15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तब तीन रियासतों को छोड़कर बाकी सभी रियासतें भारत में शामिल हो चुकी थीं। बाकी तीन रियासतें – जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर और हैदराबाद – बाद में भारत में शामिल हुईं और पटेल ने फिर से भारत के साथ उनके विलय को पक्का किया।
5. आधुनिक भारतीय सिविल सेवा के लिए विज़न
उन्होंने देश के प्रशासन में सिविल सेवा की अहम भूमिका को समझा—सिर्फ़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने में ही नहीं, बल्कि उन संस्थानों को चलाने में भी जो समाज को एकजुट रखते हैं। अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना में उनकी अहम भूमिका थी। पटेल ने 10 अक्टूबर, 1949 को संविधान सभा में अखिल भारतीय सेवाओं के पक्ष में बात रखी थी कि देष की एकता के लिये ‘इस प्रशासनिक व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें अखिल भारतीय सेवाओं का पिता माना जाता है।
पटेल एक ऐसी सिविल सेवा चाहते थे जो ईमानदार और निष्पक्ष हो और लोगों की सेवा के लिए समर्पित हो। उन्होंने 21 अप्रिल, 1947 को अपने भाषण में सिविल सेवाओं को भारत का स्टील फ्रेम कहा। उन्होंने भारतीय सिविल सेवकों से कहा, ‘एक सिविल सेवक राजनीति में हिस्सा नहीं ले सकता और न ही उसे लेना चाहिए। न ही उसे सांप्रदायिक झगड़ों में शामिल होना चाहिए। इन दोनों मामलों में सही रास्ते से भटकना जन-सेवा को गिराना और उसकी गरिमा को कम करना है’ । इसीलिये 21 अप्रिल को प्रतिवर्ष भारत में सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है।
उन्हें ‘भारत के सिविल सेवकों के संरक्षक’ के तौर पर याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के अगले दिन भारत की सिविल और पुलिस सेवाओं के 1,500 से ज़्यादा अधिकारी दिल्ली में पटेल के घर पर शोक मनाने के लिए इकट्ठा हुए और भारत की सेवा में ‘पूरी निष्ठा और लगातार जोश’ के साथ काम करने का संकल्प लिया । आज़ादी के बाद के दौर में भारत के किसी भी नेता को दी गई यह सबसे दुर्लभ श्रद्धांजलि है।

भारतीय लोक सेवकों को पटेल का सम्बोधन, 21 अप्रिल, 1947 चित्र साभारः ओलिव बोर्ड
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