संसद के दोनो सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 108 में किया गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार संसद के दोनो सदनों की संयुक्त बैठक निम्नलिखत तीन परिस्थितियों में से किसी एक परिस्थिति में राष्ट्रपति द्वारा बुलाई जा सकती है-
- यदि एक सदन ने किसी विधेयक को पारित कर दिया हो तथा दूसरे सदन ने उसे अस्वीकृत कर दिया हो, अथवा
- विधेयक में संशोधनों के बारे में दोनो सदन अन्तिम रूप से असहमत हो गये हों, अथवा
- एक सदन ने विधेयक को पारित कर दूसरे सदन में भेज दिया हो, लेकिन दूसरे सदन ने 6 माह तक कोई कार्यवाही न की हो।
उक्त शर्तों से स्पष्ट है कि संसद के दोनो सदनों की बैठक बिन्दु संख्या 1 व 2 के अन्तर्गत 6 महीने के पहले भी बुलाई जा सकती है।
संयुक्त बैठक के संबन्ध में कतिपय महत्वपूर्ण तथ्य
- संयुक्त बैठक बुलाना राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करता है।
- धन विधेयकों (अनुच्छेद 108) व संविधान संशोधन विधेयकों के संबन्ध में संयुक्त बैठक नही बुलाई जा सकती है। अनुच्छेद 368 के अनुसार संविधान संशोधन विधेयक को प्रत्येक सदन से अलग- अलग पारित किया जाना आवश्यक है।
- यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक की अधिसूचना जारी कर दी है तो उसके बाद संबन्धित विधेयक में किसी सदन द्वारा कोई बदलाव नही किया जायेगा। विधेयक को संयुक्त बैठक में पारित करते समय उसमें वही नये संशोधन किये जा सकते है जो समय बीतने के कारण आवश्यक हो गये हों।
- संयुक्त बैठक में विधेयक को दोनो सदनों के उपस्थित सदस्यों के बहुमत से पारित किया जायेगा। चूंकि लोक सभा की सदस्य संख्या राज्य सभा से जयादा है अतः संयुक्त बैठक में कोई विधेयक उसी रूप में पारित हो जाता है जिस रूप में लोक सभा चाहती है।
- यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक की अधिसूचना जारी कर संयुक्त बैठक की तिथि निर्धारित कर दी है तथा उस तिथि के पहले लोक सभा भ्रंग हो जाती है तो भी संयुक्त बैठक नियत तिथि पर संपन्न होगी तथा विधेयक पर विचार किया जायेगा। पूरे संविधान में यही एक ऐसा अवसर है जब लोक सभा भंग होने पर भी कानून बना सकती है।
संसद की संयुक्त बैठक की कार्यवाही के नियम बनाने का अधिकार किसे प्राप्त है?
संविधान के अनुच्छेद 118 के अन्तर्गत संसद के दोनो सदनों को अपनी- अपनी कार्यवाही के नियम बनाने का अधिकार प्राप्त है। इसी अनुच्छेद के अनुसार लेकिन संयुक्त बैठक की कार्यवाही के नियम बनाने का अधिकार राष्ट्रपति को ही प्राप्त है। राष्ट्रपति दोनो सदनों के अध्यक्ष/सभापति से विचार-विमर्श के उपरान्त संयुक्त बैठक की कार्यवाही के नियम बनाता है।
संविधान के अनुच्छेद 118 में यह भी लिखा है कि संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा के स्पीकर द्वारा की जायेगी। लोकसभा की अनुपस्थिति में संयुक्त बैठक की अध्यक्षता कौन करेगा, इसकी व्यवस्था राष्ट्रपति द्वारा बनाये जाने वाले नियमों में की जायेगी। इन नियमों के अनुसार स्पीकर की अनुपस्थिति में संयुक्त बैठक की अध्यक्षता डिपुटी स्पीकर द्वारा तथा उसकी भी अनुपस्थिति में राज्य सभा के डिपुटी चेयरमैन द्वारा की जायेगी। उल्लेखनीय है कि राज्य सभा के सभापति अर्थात उपराष्ट्रपति को संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करने का अवसर प्राप्त नही होता है, क्योंकि वह राज्य सभा का पदेन सभापति अवश्य है लेकिन संसद के किसी सदन का सदस्य नही है।
अब तक संसद की संयुक्त बैठक में किन कानूनों को पारित किया गया है?
संसद के अब तक के इतिहास में संयुक्त बैठक में निम्न तीन कानूनों को पारित किया गया है-
- दहेज प्रतिबन्ध अधिनयम, 1960
- बैंकिंग सर्विस कमीशन (रिपील) अधिनियम, 1977
- पोटा (POTA) आतंकवादरोधी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, 2002.
राज्य विधानमंडल में दो सदनों का गतिरोध कैसे दूर किया जाता है?
यह भी उल्लेखनीय हे कि कुछ राज्यों के विधानमंडल में भी दो सदन होते है- विधान सभा तथा विधान परिषद, लेकिन राज्यों में दोनो सदनों की संयुक्त बैठकों का प्रावधान नही है।
अनुच्छेद 197 के अनुसार राज्यों के विधानमंडलों में विधान सभा को विधान परिषद पर प्राथमिकता पदान की गई है। दोनो सदनों में यदि तीन माह तक गतिरोध बना रहता है तो विधान सभा किसी विधेयक को दोबारा पारित कर सकती है। दोबारा पारित विधेयक एक माह बाद उसी रूप में कानून बन जाता है जिस रूप में विधान सभा ने उसे पारित है। इस प्रकार विधान परिषद, विधान सभा द्वारा पारित किसी साधारण विधेयक को अधिकतम चार माह के लिये ही रोक सकती है।
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