संसद व उसके सदस्यों के विशेषाधिकार क्या हैं? क्या ये विशेषाधिकार कतिपय ऐसे व्यक्तियों को भी प्राप्त हैं, जो संसद सदस्य नही है?

संसदीय विशेषाधिकारों का तात्पर्य संसद तथा उसके सदस्यों को प्राप्त कतिपय अधिकारों, स्वतंत्रताओं तथा उन्मुक्तियों से है जो उनके कार्यों के प्रभावी निष्पादन के लिये आवश्यक हैं।

विशेषाधिकार किसे प्राप्त हैं?

  1. ससंद के दोनो सदनों को सामूहिक रूप से
  2. संसद सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से
  3. ससंद की समितियों को
  4. संसद में भाग लेने के लिये निम्न दो गैर- सदस्यों को संसदीय विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं-
    1. भारत का महान्यावादी तथा

ब. वे मंत्री जो संसद के सदस्य नही है।

उल्लेखनीय है कि यद्यपि अनुच्छेद 79 के अनुसार राष्ट्रपति संसद का अंग है तथा वह संसद के दोनो सदनों की संयुक्त बैठकों को संबोधित  भी करता है, लेकिन राष्ट्रपति को संसदीय विशेषाधिकार प्राप्त नही होते हैं।

संसदीय विशेषाधिकार क्यों दिये जाते है?

ससंद तथा उसके सदस्यों को विशेषाधिकार इसलिये नही दिये जाते कि उनकी कोई विशेष कानूनी स्थिति है, और न ही ये विशेषाधिकार संसद सदस्यों के निजी लाभ के लिये दिये जाते हैं, वरन् इसलिये दिये जाते है ताकि वे अपने कार्यों का सम्पादन प्रभावी तरीके से कर सके। उदाहरण के लिये ससंद के सदस्यों को सदन के अन्दर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती प्राप्त होती है। यदि ऐसी स्वतंत्रता नही होगी तो महत्वपूर्ण विषयों पर कानूनी कार्यवाही के डर से अपनी बात ही नही रख पायेंगे। अतः संसदीय विशेषाधिकार संसद व उसके सदस्यों को प्रभावी कार्य निष्पादन के लिये दिये जाते हैं।

ससंद के समान ही राज्य विधान सभाओं तथा उनके सदस्यों को भी विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।

संसदीय विशेषाधिकार कहां लिखे हुये हैं? अथवा उनका स्रोत क्या है?

भारत में संसदीय विशेषाधिकार किसी एक कानून में नही लिखे हुये हैं, वरन् इन विशेषाधिकारों के पांच स्रोत माने जाते हैं-

  1. भारत का संविधान- संसद सदस्यों के लिये अनुच्छेद 105 तथा राज्य विधानमंडल के लिये अनुच्छेद 194
  2. संसद की कार्यवाही संबन्धी नियम
  3. संसद द्वारा पारित कानून जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908
  4. न्यायालयों द्वारा समय समय पर की गई व्याख्या
  5. परम्परायें- उदाहरण के लिये अनुच्छेद 105 में मूल रूप से यह अंकित था कि जब तक संसद विशेषाधिकारों के संबन्ध में कोई कानून नही बनाती, तब तक संसद तथा उसके सदस्यों को वही विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो ब्रिटिश संसद तथा उसके सदस्यों को प्राप्त हैं। चूंकि भारत के संविधान में ब्रिटिश संसद का उल्लेख उचित नही था, अतः 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 105 यह व्यवस्था कर दी गई कि जब तक संसद कानून नही बनाती ससंद,  तथा उसके सदस्यों के विशेषाधिकार वही होंगे जो 44वें संविधान संशोंधन के पहले प्राप्त थे। संसद ने अभी तक विशेषाधिकारों के संहिताकरण के लिये काई कानून नही बनाया है। 44वें संविधान संशोंधन के द्वारा ऐसी ही व्यवस्था राज्य विधानमंडल के संबन्ध में अनुच्छेद में भी कर दी गई थी। राज्यों के विधनमंडलों व उनके सदस्यों के विशेषाधिकारों के संबन्ध में कानून बनाने का अधिकार राज्यों के विधानमडलों को ही प्राप्त है।

वर्तमान में संसद व राज्यों के विधानमंडलों के विशेषाधिकारों के उक्त पांच स्रोत ही हैं।

संसद व उसके सदस्यों को कौन से विशेषाधिकार प्राप्त हैं?

इन विशेषाधिकारेां को दो भागों मे समझा जा सकता है

  1. संसद को अपनी कार्यवाही का नियमन करने का अधिकार है। अर्थात अनी कार्यवाही के नियम वे स्वयं बनायेंगे तथा उसका नियमन वे भी वे स्वयं करेंगे। अनुच्छेद 122 के अन्तर्गत न्यायालय भी संसद की कार्यवाही की जांच नही कर सकते हैं।  ऐसा ही प्रावधान राज्य विधानमंडल के लिये अनुच्छेद 212 में है।
    1. अपनी कार्यवाही के प्रकाशन करने अथवा न प्रकाशित करने का अधिकार। इस कार्यवाही में सदन में हुई चर्चा तथा पारित किये गये प्रस्ताव आदि शामिल हैं।
    1. गैर-सदस्यों को सदन की कार्यवाही से बाहर करने का अधिकार
    1. अपने सदस्यों की उपस्थिति सुनिश्चत करने का अधिकार
    1. विशेषाधिकारों के उल्लंघन की दशा में दोषी व्यक्ति को दण्डित करने का अधिकार, जिसमें सदन एक कोर्ट  की तरह काम करता है तथा वह दोषी व्यक्ति को जेल की सजा भी दे सकता है। विशेषाधिकारों के उल्लंघन की जांच के लिये लोक सभा में 15 सदस्यों की तथा राज्य सभा में 10 सदस्यों की विशेषाधिकार समिति होती है। 

ब. संसद के सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त विशेषाधिकार

1. अनुच्छेद 105 में संसद के सदस्यों में भाषण् व अभिव्यक्ति तथा मत देने की स्वतंत्रता है। इसके लिये न्यायलयों में उनके विरूद्ध कोई कार्यवाही नही की जा सकती है। राज्य विधानमंडल के सदस्यों को ऐसा ही अधिकार अनुच्छेद 194 में प्राप्त है।

2. सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 135 अ के अन्तर्गत संसद तथा राज्य विधानमंडल के सदस्यों को सदन की बैठकों के दौरान तथा उसके 40 दिन बाद तथा 40 दिन पहले किसी सिविल केस में पुलिस द्वारा हिरासत में नही लिया जा सकता है। लेकिन ऐसी छूट आपराधिक मामलों तथा निवारक नजरबन्दी के मामलों में प्राप्त नही है। यदि आपराधिक मामलों में किसी सदस्य को हिरासत में लिया जाता है तो उसकी सूचना संबन्धित सदन के अध्यक्ष को तत्काल प्रदान की जायेगी।

3.  सदन की बैठकों के दौरान न्यायलय द्वारा सदस्यों को गवाही के रूप में उपस्थित होने के लिये बाध्य नही किया जा सकता है।

चित्र साभार- इन्डिया.काम

विशेषाधिाकरों से संबन्धित प्रमुख वाद

  1. सर्चलाइट केस 1959

इस केस में सर्चलाइट मैगजीन ने बिहार की विधान सभा की कार्यवाही के कुछ ऐसे अंश प्रकाशित कर दिये थे, जिन्हें सदन ने अपनी कार्यवाही से हटा दिया था। बिहार विधान सभा से नोटिस मिलने के बाद सर्चलाइट के सम्पादक ने सर्वोच्च न्यायलय में अनुच्छेद 19 में प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर वाद दायर किया।  इस वाद में सर्वोच्च न्यालय ने यह आदेश दिया कि अनुच्देद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार एक सामन्य अधिकार है लेकिन अनुच्देद 105 व 194 में सदस्यों को विशिष्ट अधिकार प्राप्त है। अतः सदन की कार्यवाही उचित है, क्योंकि विशिष्ट अधिकार सामान्य अधिकार पर प्रभावी माना जायेगा।

  • केशव सिंह केस, 1965

इस मामले में केशव सिंह ने उत्तर प्रदेश विधान सभा के एक सदस्य के वियद्ध भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुये एक पम्पलेट वितरित कर दिया था। इस पर विधान सभा ने केशव सिंह को दोषी मानते हुये सात दिन की सजा सुनाई थी। इस सजा के विरूद्ध केशव सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में वाद दायर किया था। कोर्ट ने सजा को निरस्त कर यह आदेश पारित किया कि प्रत्येक मामले में विशेषाधिकार, मौलक अधिकारों पर हावी नही हो सकते है तथा विशेषाधिकार न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन होते हैं, अर्थात न्यायालय द्वारा उनकी वैधता का परीक्षण किया जा सकता है।

  • सीता सोरेन बनाम भारत सरकार, 2024

इस केस  में सर्वोच्च न्यायलय ने नरसिम्हा राव मामलें में 1998 के अपने फैसले को बदलते हुये यह निर्णय दिया कि सदस्यों को सदन में मतदान की आजादी है, लेकिन घूस लेकर मतदान करना अपराध है। इस संबन्ध में न्यायालय ने विशेषाधिकार को सिद्ध करने के लिये दो बिन्दुओं वाला एक टैस्ट घोषित किया, जिसमें निम्न दो शर्तों के पूरा होने पर ही विशेषाधिकार मान्य होगा-

  • विशेषाधिकार का संबन्ध सदन की कार्यवाही से होना चाहिये।

ब. विशेषाधिकार का कार्यात्मक संबन्ध सदन में सदस्य की ड्यूटी से होना चाहिये।

न्यायालय में किसी विशेष्शधिकार को तभी वैध मामना जायेगा जब वह उक्त दो शर्तों को पूरा करेगा, अन्यथा नही।

चित्र साभार- दैनिक भास्कर

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