नरसंहार क्या है? एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत पर गाजा में नरसंहार में शामिल होने का जोखिम उठाने का आरोप क्यों लगाया है?

सन्दर्भ

गाजा में नरसंहार इस समय चर्चा का विषय है। दक्षिण अफ्रीका ने अन्तर्राष्ट्रीय न्यायलय में केस दायर कर इजराइल पर गाजा में नरसंहार का आरोप लगाया है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून में नरसंहार के अपराध को इरगा आमनेस (Erga Omnes) अर्थात सभी के प्रति अपराध माना गया है। इसीलिये इस अपराध के लिये कोई भी देश कानूनी कार्यवाही करने के लिये अधिकृत है। इस घटनाक्रम के बीच एमनेस्टी इनटरनेशनल नामक संस्था ने भारत के विरूद्ध गाजा के नरसंहार में अप्रत्यद्ध रूप से शामिल होने का बेबुनियाद आरोप लगाया है। यह पोस्ट इसी विषय पर क्रेन्द्रित है।

चित्र साभार- बी0 बी0 सी0

एमनेस्टी इंटरनेशनल कौन है?

एमनेस्टी इंटरनेशनल लंदन में स्थित एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (NGO) है जो दुनिया भर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दों को उठाता है। यह मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ अभियान भी चलाता है और 10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाए गए ‘मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ (Universal Declaration of Human Rights) को लागू करने की वकालत करता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की स्थापना 1961 में हुई थी।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 30 जुलाई, 2026 को जारी ‘मेड इन इंडिया: द सप्लाई ऑफ़ वेपन्स एंड एम्युनिशन टू इज़राइल’ (Made in India: The Supply of Weapons and Ammunition to Israel) शीर्षक वाली रिपोर्ट में भारत पर गाजा में इज़राइल के नरसंहार जैसे कृत्यों में शामिल होने का जोखिम उठाने का आरोप लगाया है। इस आरोप का आधार 2023 और 2025 के दौरान भारत द्वारा इज़राइल को छोटे हथियारों का निर्यात है। हो सकता है कि युद्ध के दौरान इज़राइल ने इन हथियारों का इस्तेमाल गाजा में नरसंहार करने के लिए किया हो। इस रिपोर्ट में, एमनेस्टी ने यह भी बताया है कि 07 अक्टूबर, 2023 (गाजा युद्ध की शुरुआत की तारीख) और 30 नवंबर, 2025 के बीच, भारत ने इज़राइल को सैन्य उपकरणों, छोटे हथियारों के पुर्जों और विस्फोटक आयुध घटकों की 2,596 खेपें निर्यात की हैं। ये खेपें निजी उद्योगों और सरकारी रक्षा उपक्रमों, दोनों द्वारा भेजी गई थीं।

ये आरोप इसलिए और भी चिंताजनक हो जाते हैं क्योंकि ‘कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र (पूर्वी यरुशलम सहित) और इज़राइल पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग’ (Independent International Commission of Inquiry on the Occupied Palestinian Territory, including East Jerusalem, and Israel) ने भसी इजराइल पर गाजा में नरसंहार का आरोप लगाया है। यह आयोग एक तथ्य-खोज करने वाली संस्था है, जिसे मई 2021 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा स्थापित किया गया था। आयोग ने अपनी सितंबर 2025 और जून 2026 की रिपोर्टों में यह निष्कर्ष निकाला है कि इज़राइली अधिकारियों और बलों ने गाजा में नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध किए हैं। इस आयोग की अध्यक्षता भारत के जस्टिस एस. मुरलीधर कर रहे हैं।

भारत सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया क्या है?

जब इस मुद्दे के बारे में पूछा गया, तो भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता श्री रणधीर जायसवाल ने आरोप का खंडन किया और कहा कि ‘रणनीतिक व्यापार निर्यात नियंत्रण पर भारत का कानूनी और नियामक ढांचा मजबूत है और उसने अपने राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप ही विभिन्न देशों को दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं और तकनीकों का निर्यात किया है’।

भारत के पक्ष में क्या तर्क हैं?

हालांकि गाज़ा में नरसंहार की घटनाओं में मिलीभगत के आरोपों पर भारत की उक्त प्रतिक्रिया एकदम सटीक नही है, लेकिन भारत के खिलाफ ऐसे आरोपों के विरोध में मज़बूत तर्क हैं जिन्हें हमें समझने की ज़रूरत है।

नरसंहार क्या है?

‘नरसंहार’ (Genocide) शब्द को एकमात्र अंतरराष्ट्रीय कानून, ‘नरसंहार के अपराध की रोकथाम और सज़ा अभिसमय (Convention on the Prevention and Punishment of Crime of Genocide) में परिभाषित किया गया है, जिसे 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पारित किया था। भारत ने नवंबर 1949 में इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए और अगस्त 1959 में इसे मंज़ूरी दी।

इस अभिसमय के अनुच्छेद II नरसंहार को परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से नष्ट करने के इरादे से किए गए निम्नलिखित कार्य:

(a) समूह के सदस्यों की हत्या करना;

(b) समूह के सदस्यों को गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुँचाना;

(c) समूह पर जानबूझकर ऐसी जीवन स्थितियाँ थोपना जिनसे उनका पूरी तरह या आंशिक रूप से शारीरिक विनाश हो;

(d) समूह के भीतर जन्म को रोकने के उद्देश्य से उपाय लागू करना;

(e) समूह के बच्चों को जबरन दूसरे समूह में स्थानांतरित करना।

अभिसमय के अनुच्छेद III के अनुसार निम्नलिखित कार्य दंडनीय होंगे:

(a) नरसंहार;

(b) नरसंहार करने की साज़िश;

(c) नरसंहार करने के लिए सीधा और सार्वजनिक उकसावा;

(d) नरसंहार करने का प्रयास;

(e) नरसंहार में मिलीभगत।

आखिरी कार्य नरसंहार में मिलीभगत से संबंधित है। यही आरोप भारत के विरूद्ध लगाने की कोशिश की गई है।

किसी अपराध में मिलीभगत क्या है?

एक कानूनी शब्द के रूप में मिलीभगत में दो तत्व शामिल होते हैं और मिलीभगत के अपराध को साबित करने के लिए दोनों को साबित करना ज़रूरी है:

  1. कुछ ऐसा कार्य जो नरसंहार में मदद करता हो।
  2. नरसंहार को सफल बनाने में मदद करने का इरादा।

पश्चिमी मानवाधिकार विशेषज्ञों के प्रभाव वाली संस्था ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने बिना ठोस आधार के यह अनुमान लगाया है कि भारत द्वारा हथियारों की आपूर्ति इज़राइल द्वारा नरसंहार करने का कारण थी। लेकिन उनके पास यह साबित करने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि भारत का इरादा इज़राइल को नरसंहार करने में मदद करने या इज़राइल के कृत्य को सफल बनाने का था। यह साबित नहीं किया जा सकता है कि भारत जानबूझकर इज़राइल को गाज़ा में नरसंहार की घटनाओं को अंजाम देने में मदद कर रहा था।

साथ ही, भारत ने कई बार गाज़ा में विवाद के शांतिपूर्ण समाधान और युद्ध के दौरान गाज़ा के लोगों को मानवीय सहायता प्रदान करने की मांग की है। संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत ने मिस्र और संयुक्त राष्ट्र के ज़रिए फ़िलस्तीन के लोगों को लगभग 135 मीट्रिक टन मानवीय सहायता पहुंचाई है। इसमें ज़रूरी मेडिकल सप्लाई, जीवन रक्षक दवाएं और आपदा राहत का सामान शामिल है। यह सहायता उस समय दी गई जब इज़राइल द्वारा नरसंहार किया जा रहा था। भारत ने इस संघर्ष के ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-देश समाधान) की मांग करने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का भी समर्थन किया है। भारत अब भी फ़िलस्तीन के एक स्वतंत्र देश होने के दावे का समर्थन करता है। भारत सभी अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का लगातार समर्थन करता रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इन तथ्यों को नज़रअंदाज़ किया।

इस तरह, इन कानूनी और हालात से जुड़े तथ्यों को देखते हुए, गाजा में इज़राइल द्वारा किए गए नरसंहार में भारत की मिलीभगत का आरोप लगाना बेबुनियाद है। फिर भी, ऐसे आरोपों से शांतिप्रिय देश के तौर पर भारत की छवि को नुकसान पहुँच सकता है।

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