न्यायिक स्वतंत्रता का सैद्धान्तिक विश्लेषण
अ. न्यायिक स्वतंत्रता धारणा क्या है?
न्यायिक स्वतंत्रता का तात्पर्य है- न्यायापालिका द्वारा अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिये स्वतंत्र तथा निष्पक्ष तरीके से काम करने की क्षमता।
इसमें मुख्य रूप से नीचे दिए गए चार सवाल शामिल हैं-
1. स्वतंत्रता किसके लिए?
न्यायिक स्वतंत्रता के विचार में पहला बिंदु यह है कि स्वतंत्रता किसे मिलती है: न्यायाधीशों को या न्यायपालिका को या दोनों को। न्यायाधीशों की स्वतंत्रता का मतलब है व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जबकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब है संस्थागत स्वतंत्रता। उदाहरण के लिए, न्यायाधीशों को उनके फैसलों की आलोचना से बचाना या कार्यकाल के दौरान वित्तीय सुरक्षा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उदाहरण है। दूसरी ओर, न्यापालिका को अपनी आन्तरिक प्रक्रिया के नियम बनाने का अधिकार या अपने प्रशासनिक अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार संस्थागत स्वतंत्रता का उदाहरण है। वास्तव में हमें दोनों की ज़रूरत है। भारतीय संविधान में भी दोनो को स्वतंत्रता प्रदान की गई हैं।
2. किससे स्वतंत्रता?
दूसरा सवाल न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए व्यक्तिगत या संस्थागत ख़तरे के स्रोत से जुड़ा है। आधुनिक राज्यों में न्यायिक स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा सरकार का कार्यकारी अंग (एग्जीक्यूटिव) है, जिसके पास नीति बनाने और कानूनों को लागू करने की बहुत ज़्यादा शक्तियाँ होती हैं। कार्यकारी अंग न्यायाधीशों की नियुक्ति और न्यायपालिका के फैसलों को लागू करने में भी अहम भूमिका निभाता है।
आम तौर पर, न्यायपालिका के सामने विचार और फैसले के लिए तीन तरह के मामले आते हैं: सरकार बनाम सरकार; निजी बनाम निजी; और सरकार बनाम निजी संस्था/ व्यक्ति। इन मामलों में, पहले तरह के मामलों में न्यापालिका आम तौर पर निष्पक्ष रहती है क्योंकि दोनों पक्ष सरकारी विभाग या एजेंसियाँ होती हैं। दूसरे तरह के मामलों में, दोनों पक्ष निजी होते हैं और इसलिए उन्हें पैसे या राजनीतिक प्रभाव के रूप में निजी प्रभाव का ख़तरा होता है। लेकिन न्यायपालिका सरकार की मदद से इस ख़तरे से निपट सकती है। असल में, तीसरे तरह के मामलों में न्यायपालिका को सरकार के दबाव का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वह अपना रुख सरकार के पक्ष में कर सकती है। इससे यह आरोप भी लगता है कि न्यायपालिका सत्ताधारी सरकार के एक यंत्र के तौर पर काम कर रही है।
3. किस चीज़ से स्वतंत्रता?
न्यायिक स्वतंत्रता का तीसरा प्रश्न न्यायिक स्वतंत्रता के लिए अलग-अलग तत्वों और ख़तरों के प्रकारों से जुड़ा है। न्यायपालिका को मुख्य रूप से तीन तरह के ख़तरों का सामना करना पड़ सकता है: डराना-धमकाना, रिश्वत और लालच, और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह। डराने-धमकाने का काम शक्तिशाली सरकार की तरफ़ से हो सकता है। मौजूदा सरकार न्यायपालिका के सदस्यों को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ, जैसे कि अच्छी सरकारी पोस्टिंग देने का लालच भी दे सकती है। न्यायपालिका के सदस्य निजी पक्षों द्वारा दिए जाने वाले पैसे के लालच में भी आ सकते हैं। साथ ही, न्यायाधीशों के व्यक्तिगत वैचारिक और अन्य पूर्वाग्रह उनके कामों की निष्पक्षता को कमजोर करते हैं। आधुनिक राज्य में न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए इन सभी तरह के ख़तरों से निपटना ज़रूरी है।
4. किस उदृदेश्य के लिए स्वतंत्रता?
आमतौर पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता का तात्कलिक उदृदेश्य न्यायपालिका के सदस्यों के निष्पक्ष व स्वतंत्र व्यवहार को सुनिश्चित करना होता है। हालाँकि, लोकतंत्र में न्यायिक स्वतंत्रता एक बड़े उदृदेश्य को पूरा करती है। न्यायपालिका ही है जो अपने निष्पक्ष व्यवहार के माध्यम से लोकतांत्रिक राज्य में न्याय में लोगों का भरोसा बनाए रखती है। अगर लोगों का राज्य की न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है, तो राज्य और राजनीतिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर घातक प्रभाव होता है। इसलिए, न्यायपालिका की स्वतंत्रता न सिर्फ़ निष्पक्ष फ़ैसले सुनाने के लिए ज़रूरी है, बल्कि न्याय व्यवस्था और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में लोगों का भरोसा बनाये रखने के लिए भी ज़रूरी है।
ब. न्यायिक स्वतंत्रता को लोकतंत्र की नींव क्यों माना जाता है?
न्यायिक स्वतंत्रता का विचार क्रियाशील लोकतंत्र का मुख्य आधार है। भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के बारे में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। भारत में न्यायपालिका कतिपय मुदृों जैसे कायर्पालिका के साथ अपने टकराव, व्यस्थापिका के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप, अपने आन्तरिक मतभेद और भ्रष्टाचार तथा पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आरोप आदि के कारण चर्चा में आती रहती है। सोशल मीडिया और सूचना तकनीकि के वर्तमान युग में इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान आसानी से चला जाता है। इससे न्याय और न्यायपालिका दोनों पर लोगों का विश्वास कम होने की संभावना है, जो कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिये यह आवश्यक है कि राजनीतिक व्यवस्था में लोगों का यह विश्वास बना रहे कि न्यायपालिका न्यायसंगत है और न्याय देने में सक्षम है। यह तभी संभव है जब न्यायपालिका स्वतंत्रत व निष्पक्ष रहे तथा ऐसा दिखे भी।
यह सिर्फ भारत का मामला नहीं है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता के विचार को संयुक्त राष्ट्र ने भी वैश्विक चिंता का विषय माना है। अपराधों की रोकथाम और अपराधियों के साथ बर्ताव पर सातवीं संयुक्त राष्ट्र कांग्रेस 1985 में इटली के मिलान शहर में संपन्न हुई। इस कांग्रेस में सदस्य देशों से कहा गया कि यह उनकी जिम्मदारी है कि वे ऐसे सभी उपाय अपनायें जिससे न्यापालिका स्वतंत्र व निष्पक्ष तरीके से काम कर सके।
राजनीतिक चिन्तन में न्यायपालिका का महत्व
अनेक राजनीतिक चिन्तकों ने न्यायपालिका के महत्व पर प्रकाश डाला है।
पाँचवीं सदी के राजनीतिक विचारक सेंट ऑगस्टीन ने समुद्री डाकुओं के लीडर और सिकंदर महान के बीच हुई बहस के बारे में बताते हुए यह टिप्पणी की कि ‘न्याय के बिना, एक देश लुटेरों के एक समूह के अलावा कुछ नहीं है‘।
एक और विचारक लॉर्ड ब्राइस ने कहा है कि ‘अगर अंधेरे में न्याय का दीपक बुझ जाए, तो अंधेरा कितना गहरा होगा, हम सोच भी नहीं सकते।‘
जाने-माने पॉलिटिकल साइंटिस्ट सेजविक ने कहा कि ‘राजनीतिक सभ्यता की रैंक तय करने में, न्याय के स्तर से बड़ा कोई दूसरा टेस्ट नहीं है ।
अमेरिकी संविधान के जनक जॉर्ज वाशिंगटन ने कहा था कि ‘एक सभ्य देश में न्याय का कोई विकल्प नहीं है।‘
बार्कर ने कहा कि न्याय की राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह समानता और स्वतंत्रता के मूल्यों को संतुलित करता है।
इस प्रकार यह न्याय ही है जो राज्य के अस्तित्व को औचित्य प्रदान करता है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका द्वारा ही विश्वास योग्य न्याय दिया जा सकता है।

चित्र साभार- फेसबुक
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