12 सितंबर, 2026 को 140-बिंदुओं वाला दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से अपनाया गया। आम सहमति बनाने के लिए, इसमें यूक्रेन युद्ध का ज़िक्र नहीं किया गया और पश्चिम एशियाई संकट के कूटनीतिक समाधान की बात कही गई। फिलिस्तीन मुद्दे पर, हमेशा की तरह इसने ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-देश समाधान) का समर्थन किया, लेकिन गाजा में नरसंहार के लिए इज़राइल को दोषी नहीं ठहराया। इस घोषणापत्र की कुछ महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं:
1. इसमें अमेरिका का नाम लिए बिना, कुछ देशों द्वारा लगाए गए एकतरफा टैरिफ और प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की गई।
2. घोषणापत्र में यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) की भी आलोचना की गई और इसे संरक्षणवादी उपाय बताया गया। 01 जनवरी, 2026 से लागू सी0 बी0 ए0 एम0 (CBAM) उन सामानों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाता है जो यूरोपीय संघ देशों को निर्यात किए जाते हैं, यदि उनके उत्पादन की प्रक्रिया में यूरोपीय संघ के मानकों से अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है।
3. घोषणापत्र में ब्रिक्स मुद्रा के विचार का ज़िक्र नहीं किया गया ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ सीधे टकराव से बचा जा सके। राष्ट्रपति ट्रंप ने 2025 में धमकी दी थी कि अगर ब्रिक्स देश कोई वैकल्पिक मुद्रा बनाते हैं तो वे उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे। लेकिन घोषणापत्र ने डी-डॉलरलाइज़ेशन (बिना इसका नाम लिए) की दिशा में एक और नरम रास्ता अपनाया – 1. स्थानीय मुद्रा में व्यापार और निपटान, तथा 2. ब्रिक्स सदस्यों के बीच ब्रिक्स भुगतान प्रणाली के विकास ।
4. भारत के लिए एक बड़ी सफलता आतंकवाद पर प्रस्ताव था, जिसमें पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई और वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने तथा इस मुद्दे पर जीरो टोलेरेन्स को अपनाने तथा दोहरे मापदंडों से बचने का आह्वान किया गया।
5. भारत के बड़े हित का एक और मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग थी। मोदी ने अपने भाषण में समावेशी वैश्विक शासन पर 10-सूत्रीय दिशानिर्देशों को अपनाने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए एक रोडमैप तैयार करने का आह्वान किया। उन्होने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधारों को अब और अधिक टाला नही जा सकता हैफ
6. वैश्विक शासन में ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की बड़ी भूमिका और आवाज पर ज़ोर दिया गया। मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि ग्लोबल साउथ के देशों को नियम मानने वालों के बजाय नियम बनाने वाले बनना चाहिए।
7. समुद्री जल में यातायात की स्वतंत्रता और नाविकों की सुरक्षा के मुद्दे पर भी ज़ोर दिया गया।
हालांकि भारत घोषणापत्र पर आम सहमति बनाने में सफल रहा, लेकिन वह ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी दिशा में जाने से नहीं रोक सका। ईरान के राष्ट्रपति ने अमेरिकी डॉलर की जगह किसी दूसरी करेंसी को अपनाने की बात कही, और पुतिन ने ब्रिक्स की बढ़ती आर्थिक ताकत के सामने जी-7 की आर्थिक ताकत को खुलकर चुनौती दी। ट्रंप के एकतरफा टैरिफ की कड़ी आलोचना, लोकल करेंसी में व्यापार करने की मांग और येरोपीय संघ की ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ की आलोचना पश्चिमी देशों को पसंद नहीं आएगी। इसके बावजूद दिल्ली घोषणा को एक सन्तुलित घोषणा माना जा सकता है।
इन सबके अलावा, इस समिट ने दुनिया को एक मज़बूत संदेश दिया कि पिछले दो दशकों में ब्रिक्स का महत्व और ताकत बढ़ी है। हालांकि ब्रिक्स के अंदर अभी भी बहुत मतभेद हैं, फिर भी दुनिया के लिए इसका संदेश बहुत प्रभावशाली है।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी, शी जिनपिंग तथा पुतिन- क्या ब्रिक्स बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था की स्थापना कर पायेगा। साभार- इण्डिया टूडे
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