भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39अ में भारतीय नागरिकों के पिछड़े वर्गों को कानूनी सहायता देने का प्रावधान है। अनुच्छेद 39अ के तहत मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान ‘लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी एक्ट, 1987’ के ज़रिए लागू किया गया है । इस एक्ट की धारा 12 में राज्यों से कानूनी सहायता पाने के लिए लोगों की पात्रता की शर्तें बताई गई हैं। इन शर्तों के तहत, सरकार से कानूनी सहायता पाने के लिए निम्नलिखित लोग पात्र हैं:
1. अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य;
2. संविधान के अनुच्छेद 23 में बताए गए अनुसार मानव तस्करी या बेगार का शिकार व्यक्ति;
3. महिला या बच्चा;
4. ‘पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ (इक्वल अपॉर्च्युनिटीज़, प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स एंड फुल पार्टिसिपेशन) एक्ट, 1995’ की धारा 2 के क्लॉज़ (i) में परिभाषित विकलांग व्यक्ति;
5. ऐसी परिस्थितियों में फंसा व्यक्ति जिसे मदद की ज़रूरत हो, जैसे कि किसी बड़ी आपदा, जातीय हिंसा, जातिगत अत्याचार, बाढ़, सूखा, भूकंप या औद्योगिक आपदा का शिकार होना; या
6. औद्योगिक मज़दूर; या
7. हिरासत में रहने वाला व्यक्ति, जिसमें प्रोटेक्टिव होम, जुवेनाइल होम, या मनोरोग अस्पताल या मनोरोग नर्सिंग होम में हिरासत शामिल है;
8. जिसकी सालाना आय नौ हज़ार रुपये से कम हो (या राज्य सरकार द्वारा तय की गई कोई ज़्यादा रकम), अगर मामला सुप्रीम कोर्ट के अलावा किसी दूसरी अदालत में हो; और जिसकी सालाना आय बारह हज़ार रुपये से कम हो (या केंद्र सरकार द्वारा तय की गई कोई ज़्यादा रकम), अगर मामला सुप्रीम कोर्ट में हो।
लाभार्थियों के लिए यह दायरा बहुत छोटा है, जिससे कम और मध्यम आय वाले ज़्यादातर नागरिक इस कानूनी सहायता के दायरे से बाहर रह जाते हैं। किसी भी वजह से न्याय तक पहुँच न होना असल में न्याय से वंचित करना ही है।
यह व्यवस्था अधिक प्रभावी नही है क्योंकि इसमें न्यायिक पक्रिया का सारा व्यय नही मिल पाता । दूसरा, प्रकि्रया जटिल है। तीसरा कमजोर वर्गों में इस सुविधा के प्रति जागरूकता का अभाव है।

Image Courtesy: Nyayaknowledge
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