राष्ट्रीय आन्दोलन तथा राजनीतिक चिन्तन में जयप्रकाश नारायन का क्या योगदान है?

जयप्रकाश नारायन भारत के एक पमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व समाजवादी नेता थे।  लेकिन वे एक विचारशील व्यक्ति तथा विचारक भी थे। उनको समाजवाद, लोकतंत्र, दलविहील लोकतंत्र, सम्पूर्ण क्रान्ति आदि विचारों के लिये जाना जाता है।

जयप्रकाश नारायन का जन्म 1902 में बिहार के सारन जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होने अपनी आरंभिक शिक्षा सारन में प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिये उन्होंने पटना कालेज में प्रवेश लिया लेकिन असहयोग आन्दोलन के दौरान उन्होंने बीच में पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन के दौरान भारतीयों (राजेन्द्र प्रसाद तथा अनुग्रह नारायण सिंह) द्वारा स्थापित बिहार विद्यापीठ में प्रवेश लिया। लेकिन असहयोग आन्दोलन की समाप्ति के बाद वे उच्च शिक्षा के लिये अमेरिका चले गये। उन्होंने 1922-1929 के दौरान अमेरिका में अपनी पढ़ाई की। 1928 में ओहियो विश्वविद्यालय से बी0 ए0 तथा 1929 में विस्कोन्सिन विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एम0 ए0 की उपाधि प्राप्त की। अमेरिका में वे मार्क्सवादी क्रान्तिकारी विचारों से बहुत अधिक प्रभावित हुये।

राष्ट्रीय आन्दोलन तथा राजनीतिक चिन्तन में जयप्रकाश नारायन के योगदान को हम निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत समझ सकते हैं-

  • स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान

1. 1929 में अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की तथा राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की। गांधी जी के नेतृत्व में उन्होंने 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दालन में भाग लिया तथा 1932 में उन्हें अन्य नेताओं के साथ जेल भेज दिया गया। 

2.1934 में उन्होंने अन्य समाजवादी नेताओं- आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया तथा मीनू मसानी के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी के ही अन्दर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। आचार्य नरेंद्र देव कांगेस समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे। जयप्रकाश नारायण इस पार्टी में संगठन सचिव थे। मीनू मसानी भी इसके संस्थापक और संयुक्त सचिव थे।  राम मनोहर लोहिया ने पार्टी की विचारधारा को आकार देने और पार्टी पत्रिका के संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस समाजवदी पार्टी के अन्य नेता थे- यूसुफ मेहरअली, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, और डॉ. संपूर्णानंद।

3.  उन्होंने 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय अंग्रेज सरकार के खिलाफ जन आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व न देने के अभियान चलाये। टाटा स्टील कम्पनी मे हड़ताल कराके उन्होंने यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुँचे। इस आन्दोलन के लिये उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गयी। 

4. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे 1942 में हजारीबाग जेल से फरार हो गये तथा आन्दोलन मे कूद गये। गांधी जी उनके इस कृत्य से प्रभावित थे। उन्होने नेपाल जाकर वहां से आजाद दस्ते का गठन किया तथा क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया। वे आजादी के लिये क्रान्तिकारी गतिविधियों को उचित मानते थे। साथ ही उन्होंने क्रान्तिकारियों के बीच संचार व्यवस्था का संचालन किया। उन्हें 1943 में हिरासत में ले लिया गया तथा 1946 में रिहा किया गया।

इस प्रकार राष्ट्रीय आन्दोलन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

ब. जयप्रकाश नारायन के समाजवादी विचार

जयप्रकाश नारायन अपने अमेरिका में अघ्ययन के  दौरान मार्क्स के क्रान्तिकारी विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे। लेकिन जब उन्होंने रूस में मार्क्सवादी व्यस्था के अन्तर्गत अधिनायकवादी शासन का रूप देखा तो माक्सर्वाद के क्रान्ति व हिंसक साधनों से उनका मोह भंग हो गया। बाद में वे लोकतांत्रिक समाजवाद के समर्थक बन गये तथा आजीवन इसी विचार का समर्थन करते रहे। लोकतांत्रिक समाजवाद ऐसी विचारधारा है जिसमें समाजवादी लक्ष्यों जैसे समानता, न्याय व जनकल्याण को शांतिपूर्ण साधनों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। उनके इस बदलाव में गांधी जी के शांतिपूर्ण साधनों का भी प्रभाव है।

उन्होने 1934 में अन्य समाजवादियों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक समाजवाद की विचारधारा के  आधार पर कांग्रेस के अन्दर ही कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन किया था तथा इसी में काम करते रहे। लेकिन आजादी के बाद मार्च 1948 में कांग्रेस ने यह प्रस्ताव पारित किया कि कोई भी व्यक्ति कांग्रेस तथा उसके अन्दर गठित कांग्रेस समाजवादी पार्टी का एक साथ सदस्य नही रह सकता। अतः 1948 में जयप्रकाश नारायन व लोहिया ने कांग्रेस से अलग होकर समाजवादी पार्टी की स्थापना की। लेकिन 1952 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को वांछित सफलता नही मिली। इसके बाद जयप्रकाश नारायन ने समाजवादी पार्टी का एक अन्य पार्टी कृषक मजदूर प्रजा पार्टी में विलय कर प्रजा सोसलिस्ट पार्टी की स्थापना की।   लेकिन राजनीति में व्याप्त सत्तावाद व अवसरवाद के कारण शीघ्र ही उनका सक्रिय राजनीति से मोह भंग गहो गया तथा 1954 में वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गये।  इसके बाद वे विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन में शामिल हो गये।

सर्वोदय आन्दोलन में अगले 20 वर्षों  तक उनकी भागीदारी उनके समाजवादी जीवन का तीसरा व अन्तिम चरण है।  उन्होंने हृदय परिवर्तान के आधार पर संचाालित विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन में भूदान व ग्रामदान कार्यक्रमों को समाजवाद का ही एक रूप माना। उनके अनुसार समाजवाद स्थापना के लिये सर्वोदय एक श्रेष्ठ मार्ग है।

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, मंहगाई तथा अधिनायकवादी प्रवृत्तियों, के खिलाफ आन्दोलन चलाने के लिये 1974 में वे पुनः सक्रिय राजनीति में वापिस आय गये। तथा 1979 में अपनी मृत्यु तक इन चुनौतियों का सामना करते रहे।

स. लोकतंत्र पर जयप्रकाश नारायन के विचार

जयप्रकाश नारायन लोकतंत्र के समथर्क थे, लेकिन वे लोकतंत्र की वर्तमान कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट नही थे अतः उन्होंने लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिये निम्न सुझाव दिये-

  1. उन्के अनुसार लोकतंत्र की समस्या एक नैतिक समस्या है। अत्ः उन्होंने लोकतंत्र की नैतिक नीव को मजबूत करने के लिये लोकतंत्र में कतिपय नैतिक मूल्यों जैसे अहिंसात्मक साधनों; व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता तथा व्यक्ति की गरिमा का सम्मान; सहयोग की भावना; विरोधी दृष्टिकोण के प्रति सहनशीलता; कर्तव्य भावना; तथा साधारण जीवन यापन आदि के समावेश पर बल दिया।
  2. वे लोकतंत्र को सफल बनाने के आर्थिक तथा राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के समर्थक थे। उनके अनुसार किसी भी प्रकार का केन्द्रीकरण लोकतंत्र में बाधक है। उनकी विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में ग्राम सभा राजनीतिक सत्ता की सबसे निचली इकाई होगी तथा ग्राम सभा द्वारा उन् सदस्यों का चुनाव किया जायेगा जो जिला स्तर की इकाई का चुनाव करेगे। जिला इकाई प्रदेश इकाई का तथा प्रदेश इकाई द्वारा केन्द्रीय विधायिका का अप्रत्यक्ष् रूप से चुनाव किया जायेगा।
  3. संसदीय लोकतंत्र को सफल बनाने के लिसे उन्होंने राजनीतिक प्रक्रिया में जनता की सक्रिय भागीदारी का समर्थन किया ।
  4. उन्होंने माना कि लोकतंत्र की सफलता में सबसे बड़ी बाधा राजनीतिक दल है। दलों में सबसे बड़ी दो बुराइयां है- दलों पर धनी लोगो का प्रभुत्व तथा दूसरा सत्ता प्राप्ति के लिये दलों द्वारा अनैतिक व अनुचित साधनों का प्रयोग।

दलविहीन लोकतंत्र का समर्थन–  राजनीतक दलों की उक्त बुराइयों के कारण उन्होंने दल विहीन लोकतंत्र का समर्थन किया। दलविहीन लोकतंत्र में चुने हुये प्रतिनिधि पार्टी के प्रतिनिधि न होकर जनता के प्रतिनिधि होंगे। उनके अनुसार दलविहीन व्यवस्था ग्राम सभा आधारित विकेन्द्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत कार्य करेगी, जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है।

लेकिन बाद में उनके यह अहसास हुआ कि दल विहीन लोकतंत्र की स्थापना व्यवहारिक नही है। अतः  उनहोने दलों में व्याप्त बुराइयों के समाधान की वकालत की। उन्होने सत्ताधारी दल की बुराइयों को नियंत्रत करने के लिये मजबूत विपक्षी दल का होना आवश्यक बताया।

द. सम्पूर्ण क्रान्ति का विचार

लगभग बीस वर्षों तक राजनीतिक सन्यास के बाद 1974 में जयप्रकाश नारायन सक्रिय राजनीति में तब लौटे जब देश में मंहगाई, भ्रष्टाचार तथा अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ रही थी। इनके विरोध में उन्होंने 5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान में 50,000 लोगो की सभा में अपना संपूर्ण क्रान्ति का विचार रखा। सम्पूर्ण क्रान्ति में समाज के प्रत्येक क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों की आवश्यकता है। उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति में निम्न सात क्षेत्रों में आधारभूत परिवर्तन शामिल है-

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक वैचारिक अथवा बौद्धिक, शैक्षणिक तथा आध्यित्मक।

उक्त सात क्षेत्रों में परिवर्तन लाने के लिये जयप्रकाश नारायन ने अहिंसक साधनों द्वारा व्यापक आन्दोलन चलाने की वकालत की जिसमें सविनय अवज्ञा तथा विधायिकाओं को भंग करने जैसे साधन भी शामिल हैं। इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के उदृदेश्यों की प्राप्ति के लिये लोगो द्वारा अहिंसक लेकिन प्रत्यक्ष कार्यवाही का समर्थन किया।

अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में उन्होंने केन्द्र सरकार द्वारा जून 1975 में  लागू किये गये आपात काल का तीव्र विरोध किया। इसके लिये उन्हें 1975 में हिरासत में ले लिया गया तथा खराब स्वास्थ्य के कारण 1976 में रिहा किया गया।

   आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ।  जनता पार्टी के  गठन तथा 1977 में केन्द्र में गठित जनता पार्टी की सरकार के संचालन में उन्होने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगस्त 1977 में जनता पार्टी में फूट पड़ गई तथा जनता पार्टी की सरकार गिर गई। 8 अक्टूबर 1979 में जयप्रकाश नारायन का निधन हो गया।

5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुये जयप्रकाश नारायन। चित्र साभार- सिविल डेली

इस प्रकार जयप्रकाश नारायन को उनके स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान, तथा समाजवाद, लोकतंत्र तथा सम्पूर्ण क्रान्ति संबन्धी विचारों के लिये सदैव याद किया जायेगा। 

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