पिछले दो दशकों में ब्रिक्स की मुख्य उपलब्धियाँ क्या रही हैं?

ब्रिक्स की स्थापना 2006 में हुई थी, इसलिए 2026 में यह दो दशक पूरे कर लिया है। ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में आयोजित किया गया है। यह पिछले दो दशकों में ब्रिक्स की उपलब्धियों का जायजा लेने का सही समय है।

ब्रिक्स के प्रदर्शन का आकलन केवल उसके लक्ष्यों और उद्देश्यों के संदर्भ में ही किया जा सकता है।

सार्क, बिम्सटेक, तथा शंघाई सहयोग जैसे कई संगठनों के विपरीत, ब्रिक्स का अपना कोई चार्टर नहीं है जिसमें औपचारिक रूप से इसके उद्देश्यों को सूचीबद्ध किया गया हो। हालाँकि, ब्रिक्स की गतिविधियों और घोषणाओं से हम इसके दो व्यापक उद्देश्यों का अनुमान लगा सकते हैं:

A. सदस्य देशों के बीच सहयोग: जिसके अब तीन स्तंभ हैं – राजनीतिक और सुरक्षा; आर्थिक; और सांस्कृतिक तथा लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान।

B.एक ऐसी बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था की स्थापना जो लोकतांत्रिक और समावेशी हो।

पिछले 20 वर्षों में ब्रिक्स की मुख्य उपलब्धियाँ:

अ.सदस्य देशों के बीच सहयोग

ब्रिक्स ने सदस्य देशों के बीच सहयोग के दायरे को राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों तक बढ़ाया है।

1-राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर, ब्रिक्स सदस्य वैश्विक और क्षेत्रीय संघर्षों पर एक साझा रुख अपनाते हैं और आतंकवाद तथा साइबर सुरक्षा जैसे उभरते सुरक्षा खतरों से निपटने में सहयोग करते हैं। उन्होंने इन क्षेत्रों में कार्य समूह बनाए हैं और इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए लगातार अपने अनुभव साझा करते हैं।

2-आर्थिक सहयोग के लिये ब्रिक्स देश व्यापार और निवेश, सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला, सतत विकास, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, तथा ए0 आई0 जैसी हरित और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग का प्रयास करते हैं। एक अनुमान के अनुसार, 2003 और 2023 के बीच ब्रिक्स देशों के आपसी व्यापार में 13 गुना वृद्धि हुई है।

3-सांस्कृतिक मुद्दों पर, वे युवा विकास, महिला सशक्तिकरण और लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

ब्.बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था की स्थापना

इस उद्देश्य के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं:

1. संयुक्त राष्ट्र प्रणाली (सुरक्षा परिषद सहित) और ब्रेटन वुड्स संस्थाओं (जैसे विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन (पहले का नाम GATT) में सुधार की मांग। ब्रिक्स देश इन संस्थाओं को लोकतांत्रिक बनाना चाहते हैं, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। हालांकि, सुधारों की मांग और तेज़ हो गई है क्योंकि ब्रिक्स के नई दिल्ली सम्मेलन 2026 के दौरान, भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधारों में अब और देरी नहीं की जा सकती। इसके लिए एक रोडमैप होना चाहिए।

2.   पश्चिमी देशों के दबदबे वाले सिस्टम पर निर्भरता कम करने के उपाय:

(अ). अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए लोकल करेंसी में व्यापार और ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम करने के प्रयास। 2024 कज़ान समिट के बाद से इसे बढ़ावा दिया गया है। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि अभी ब्रिक्स देशों की अलग मुद्रा जारी काने का कोई पस्ताव नही है।

(ब). ग्लोबल साउथ और साउथ-साउथ सहयोग की आवाज को मज़बूत करना। 2026 के ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी ने कहा था कि विश्व व्यवस्था में ग्लोबल साउथ को नियम पालन करने वाले समूह के स्थान पर नियम बनाने वाला समूह बनना चाहिये।

(स). नई संस्थाएँ: न्यू डेवलपमेंट बैंक (एन0 डी0 बी0), आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था (CRA)।

ये दोनों संस्थाएँ 2014 में ब्राज़ील में हुए छठे ब्रिक्स समिट के दौरान फोर्टालेज़ा घोषणापत्र के तहत बनाई गई थीं।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (एन0 डी0 बी0)

2014 में परिकल्पित और 2015 में स्थापित, एन0 डी0 बी0 शंघाई में स्थित है।

इसके दो तरह के सदस्य होते हैं: नॉन-बॉरोइंग सदस्य (कर्ज़ न लेने वाले सदस्य), यानी विकसित देश जो बैंक के फंड में पैसा तो लगा सकते हैं लेकिन बैंक से पैसा उधार नहीं ले सकते। हालाँकि, उनके निवेश की सीमा बैंक के कुल फंड का 45 प्रतिशत तक ही सीमित है। बाकी 55 प्रतिशत फंड ब्रिक्स सदस्यों के पास होना चाहिए। बैंक के सदस्यों का वोटिंग शेयर फंड में उनके योगदान पर निर्भर करता है। वर्तमान में चीन और भारत के पास बैंक में 51 प्रतिशत वोटिंग शेयर है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एन0 डी0 बी0 का अंतिम नियंत्रण ब्रिक्स सदस्यों के हाथों में रहे।

सदस्यता की दूसरी श्रेणी बॉरोइंग सदस्य (कर्ज़ लेने वाले सदस्य) है, जो कोई भी विकासशील देश हो सकता है। बॉरोइंग सदस्यों को कोई फंड निवेश करने की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन वे बैंक से पैसा उधार लेने के हकदार होते हैं। कोई भी नॉन-ब्रिक्स सदस्य, अगर वह बैंक का बॉरोइंग सदस्य है, तो एन0 डी0 बी0 से पैसा उधार ले सकता है।

एन0 डी0 बी0 और ब्रिक्स की सदस्यता अलग-अलग है।

एन0 डी0 बी0 विकासशील देशों को बुनियादी ढाँचे और टिकाऊ विकास परियोजनाओं के लिए मामूली दरों पर पैसा उधार देता है। बैंक का प्रदर्शन धीमा रहा है क्योंकि इसने विकासशील देशों में 139 परियोजनाओं को 43 बिलियन डॉलर का फंड उधार दिया है।

एन0 डी0 बी0 विश्व बैंक की तरह काम करता है, लेकिन इसे विश्व बैंक का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। यह वर्ल्ड बैंक से मिलने वाले लोन के अलावा एक अतिरिक्त सुविधा है।

कंटिंजेंसी रिज़र्व अरेंजमेंट (सी0 आर0 ए0)

इसे भी 2014 के फोर्टालेजा डिक्लेरेशन के तहत 2015 में बनाया गया था।

यह ब्रिक्स (ब्रिक्स) के सदस्यों को तब लोन देता है जब उनके बैलेंस ऑफ़ पेमेंट में गड़बड़ी हो और उन्हें विदेशी मुद्रा की ज़रूरत हो। इससे केवल ब्रिक्स के सदस्य देश ही लान ले सकते हैं।

यह अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की तरह काम करता है, लेकिन यह अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का विकल्प नहीं है।

सी0 आर0 ए0 का कुल फंड 100 अरब डॉलर है। अब तक, किसी भी सदस्य देश ने सी0 आर0 ए0से लोन नहीं लिया है।

चित्र साभार- इन्स्टाग्राम

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