क्या डोनाल्ड ट्रंप ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सिर्फ़ टैरिफ और जमीन हड़पने के रूप में परिभाषित कर दिया है?

डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी, 2025 को दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति का पद संभाला।

उन्होंने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) के नारे के साथ चुनाव जीता; यह नारा पहली बार पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 1980 के चुनावों के दौरान दिया था।

इस नारे के दो अर्थ हैं:

1.   यह मानना ​​कि अमेरिका अब ‘महान’ (Great) नहीं है और उसे ‘महान’ बनाना है।

2.   महानता की परिभाषा तय करना मौजूदा राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। बस यहीं ट्रंप के लिए अवसर मिल गया है।

रीगन के लिए, महानता का मतलब था सोवियत संघ के साथ शांति के लिए वैश्विक जिम्मेदारी लेना और इस तरह एक ज़्यादा स्थिर दुनिया बनाना, जिससे अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़े।

ट्रंप ने रीगन से ‘ग्रेट’ (महान) शब्द तो लिया, लेकिन उसकी भावना को नहीं अपनाया।

ट्रंप ने अमेरिका की ‘महानता’ के लक्ष्य को एकतरफा टैरिफ लगाना, दूसरे देशों की जमीन हड़पना तथा वैश्विक जिम्मेदारियों से बचने के रूप में परिभाषित कर दिया है।

महानता की उनकी यह नई परिभाषा अलेक्जेंडर वेंड्ट के ‘कंस्ट्रक्टिविज़्म’ (रचनावाद) का एक सटीक उदाहरण है, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘अराजकता (anarchy) वही है जो हम उसे बनाते हैं’। अब ट्रंप कहते हैं कि ‘महानता’ और उसके साधन वही हैं जो हम उन्हें बनाते हैं।

अमेरिकी महानता के बारे में ट्रंप के विचारों और उनके काम करने के तरीकों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं-

1.उन्होंने वैश्विक नियमों और विश्व व्यापार संगठन के सिद्धांतों की अनदेखी करते हुए अपने यूरोपीय सहयोगियों और भारत सहित कई देशों के ख़िलाफ़ एकतरफा टैरिफ की घोषणा की है।

2. उन्होंने स्वीडन के द्वीप ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का दावा किया है, कनाडा को अमेरिका का 51वां प्रांत घोषित किया है, लेक ओंटारियो (जो अमेरिका और कनाडा दोनों की साझा झील है) का नाम बदलकर ‘अमेरिकन लेक’ कर दिया है, पनामा नहर पर दोबारा कब्जा करने की धमकी दी है, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को जबरन कैद कर लिया है तथा उसके तेल संसाधनों पर कब्जा किया है और अब पाकिस्तान के खनिज संसाधनों पर कब्जा करने की फिराक में है।

3. ट्रम्प ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से हटकर और नाटो सदस्यों की सुरक्षा का बोझ अपने यूरोपीय सहयोगियों पर छोड़कर खुलेआम वैश्विक जिम्मेदारियों की अनदेखी की है। यूरोपीय शक्तियाँ अमेरिका के बिना ‘यूरोपीय सुरक्षा परिषद‘ बनाने पर विचार कर रही हैं। उन्होंने ईरान पर आक्रमण कर ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि जो हारमुज जलउमरूमध्य युद्ध के पहले खुला था, वह अब बन्द हो गया है तथा पूरी दुनियां में तेल का संकट खड़ा हो गया है।

4. ट्रम्प ने हिटलर से यह सीख ली है – किसी झूठ को सौ बार दोहराओ, तो वह सच बन जाता है। भारत के कई बार मना करने के बावजूद, ट्रंप लगातार दावा करते रहे हैं कि उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की थी।

5. शांति के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने की उनकी गहरी इच्छा जब नही पूरी हो सकी तो उन्होने 2025 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया मचाडो का मेडल बेशर्मी से अपने पास रख लिया है। उन्होंने गाजा संकट को सुलझाने के लिए बनाए गए ‘शांति बोर्ड’ का खुद को आजीवन प्रमुख नियुक्त कर लिया है!

ये ट्रंप की ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ की कोशिशों के कुछ ही उदाहरण हैं।

ट्रंप फिलहाल क्यों सफल हो रहे हैं?

अभी, ट्रंप अमेरिका के दोस्तों और दुश्मनों, दोनों को धमकाने और उन पर दबाव डालने में सफल रहे हैं। क्यों? क्योंकि अपनी गिरावट के बावजूद, अमेरिका अभी भी दुनिया में एक प्रमुख आर्थिक, सैन्य और तकनीकी ताकत बना हुआ है।

लेकिन लंबे समय में क्या होगा?

लेकिन अमेरिका को फिर से महान बनाने का उनका रास्ता कई दीर्घकालिक नकारात्मक परिणामों से भरा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने न केवल अपने सभी मित्र देशों को खो दिया है, बल्कि अमेरिकी नीतियों की विश्वसनीयता के बारे में अपने सहयोगियों का भरोसा भी खो दिया है। यह अमेरिका की वैश्विक स्थिति को ऐसा नुकसान है जिसे ठीक होने में दशकों लगेंगे। लेकिन ट्रंप इतने ‘लेन-देन’ (transactional) वाले नजरिए से सोचते हैं कि वे इन परिणामों को या तो समझ नहीं पाते अथवा इनकी परवाह नही करते। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि ट्रंप शायद अमेरिकी इतिहास के एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जो सार्वजनिक जीवन के किसी भी अनुभव के बिना इस पद के लिए चुने गए थे। परिणामतः एक बिजनेस टाइकून के तौर पर उनके अनुभव और तौर-तरीके ही अमेरिका की वैश्विक नीतियों का आधार बन गए हैं।

अमेरिकी मतदाताओं के लिए यह सोचने का सही समय है कि उन्होंने ट्रम्प को इस पद के लिए कैसे चुना!

संक्षेप में, ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को केवल ‘लेन-देन’ (transnationalism) तक सीमित कर दिया है और इस ‘लेन-देन’ को दूसरे देशों में टैरिफ, जमीन हड़पने और संसाधनों पर कब्जा करने के रूप में परिभाषित कर दिया है। इस नई परिभाषा से सभी देश प्रभावित और चिंतित हैं क्योंकि अमेरिका अभी भी एक वैश्विक शक्ति है।

प्रश्न यह  है कि क्या ट्रम्प की यह नई परिभाषा अमेरिकी नीति की स्थायी विशेषता है या उनके राष्ट्रपति कार्यकाल तक का एक अस्थायी दौर है? इसका उत्त्तर अगले राश्ट्रपति चुनावों के बाद ही मिल सकेगा।

ट्रम्प की नीतियां जार्ज आरवेल के बिग ब्रदर को अवश्य पसन्द आयेंगी। चित्र साभार- दा नेशन

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