सन्दर्भ
दिनांक 12-13 सितम्बर 2026 को दिल्ली में संपन्न हुई ब्रिक्स की बैठक में स्वीकृत नई दिल्ली घोषणापत्र में अन्य बातों के अलावा ब्रेटन वुड्स संस्थाओं अर्थात विश्व बैक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में सुधार व उनके लोकतंत्रीकरण की मांग की गई है। ऐसी मांग गैर-पश्चिमी देशों के अन्य संगठनों द्वारा भी की गई है। विश्व बैक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में किस प्रकार के सुधार की जरूरत है, इस बात को समझने के लिये इसकी कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है।
विश्व बैंक में सदस्य देशों का वोटिंग शेयर कैसे निर्धारित किया जाता है?
ब्रेटन वुड्स सममेलन 1944 में लिये गये निर्णय के अनुसार विश्व बैक की स्थापना 25 दिसम्बर 1945 को की गई थी तथा बैक ने 25 जून 1946 से अपना कार्य करना आरंभ किया था। वर्तमान में इसके 189 सदस्य हैं। सभी देशों को इसकी सदस्यता अलग से लेनी पड़ती है। भारत इसका संस्थापक सदस्य है।
हम जानते है कि संयुक्त राष्ट्र की महासभा में सभी सदस्य देशों को एक वोट मिलता है तथा सभी के वोट समान होते हैं। लेकिन विश्व बैक में सभी सदस्यों के वोट की कीमत बराबर नही होती है। प्रत्येक देश के वोट की कीमत अलग- अलग होती है। किसी देश के कुल वोटों का प्रतिशत का निर्धारण निम्न दो प्रकार के वोटों को जोड़कर किया जाता है-
- विश्व बैक में उस देश के शेयरों की संख्या से प्राप्त वोट। किसी देश को विश्व बैक का सदस्य बनने के पहले उसके शेयर खरीदने पड़ते हैं। उसके प्रत्येक शेयर के लिये एक वोट मिलता है तथा एक शेयर एक लाख डालर का होता है। लेकिन कोई देश मनमाने शेयर नही खरीद सकता है। इसके लिये उस देश को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में प्राप्त कोटा प्रतिशत के बराबर ही विश्व बैक में शेयरों का कोटा मिलता है। उदाहरण के लिये यदि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में किसी देश का कोटा पांच प्रतिशत है तो विश्व बैक में उसके शेयरों का हिस्सा भी पांच प्रतिशत होगा। इस प्रकार से किसी देश के कुल शेयरों का निर्धारण किया जाता है। किसी देश के जितने शेयर होंगे उतने ही उसके वोट होंगे।
इस प्रकार हम देखते में कि इन वोटों के निर्धारण में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में उस देश का कोटा ही प्रमुख आधार है, जो उस देश की अर्थव्यवस्था के आकार पर तय होता है। इसीलिये किसी देश को विश्व बैक की सदस्यता लेने से पहले अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की सदस्यता लेना अनिवार्य होता है।
- उक्त विधि से शेयरों के आधार पर प्राप्त वोंटों में बेसिक वोट जोड़कर उस देश के कुल वोटों का प्रतिशत निर्धारित होता है। प्रत्येक देश के बेसिक वोट उस देश के कुल वोटों का 5.5 प्रतिशत होते हैं। उदाहरण के लिये किसी देश के शेयरों से प्राप्त वोट यदि 10 प्रतिशत है तो बेसिक वोटों को मिलाकर उस देश के कुल वोटों का प्रतिशत 10.55 होगा।
वोटों के शेयरों की गणना की उक्त विधि से स्पष्ट है कि प्रत्येक देश को विश्व बैक में समान वोट नही मिलते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व बैक में कोई निर्णय लेने के लिये कम से कम 85 प्रतिशत मत उस निर्णय के पक्ष में होना अनिवार्य है।
उक्त विधि से विश्व बैक के आंकड़ों के अनुसार पांच सबसे ज्यादा वोटों का प्रतिशत रखने वाले देश है-
अमेरिका- 16.13 प्रतिशत
जापान- 6.94 प्रतिशत
चीन- 5.80 प्रतिशत
जर्मनी- 4.13 प्रतिशत
ब्रिटेन तथा फ्रांस प्रत्येक- 3.79 प्रतिशत
भारत को विश्व बैंक में 2.95 प्रतिशत मत प्राप्त है।
इन देशों की वोटों की लगभग यही स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में भी है।
विभिन्न देशों के मत प्रतिशत के उक्त विवरण से स्पष्ट है कि अमेरिका को विश्व बैक के निर्णयों में एक प्रकार से वीटो जेसी शक्ति प्राप्त है, क्योंकि उसकी सममति के बिना किसी निर्णय को लेने के लिये 85 प्रतिशत पूरे ही नही हो सकते हैं। यदि अमेरिका के वोटों के साथ यूरोपीय देशों के मतो को मिला दिया जाये तो इनके 42 प्रतिशत मत होते है क्योंकि यूरोपीय देशों के कुल मत लगभग 25 प्रतिशत हैं।
इससे स्पष्ट है कि विश्व बैक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनो में अमेरिका तथा यूरोपीय देशों का वर्चस्व है।
विश्व बैक का अध्यक्ष सदैव अमेरिका का नागरिक क्यों होता है?
1945 से अब तक विश्व बैक में 14 अध्यक्ष रह चुके है। सभी अध्यक्ष अमेरिका के नागरिक रहे हैं। अध्यक्ष का कार्यकाल पांच वर्ष होता है। वर्तमान 14वें अध्यक्ष अजय बंगा भी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक है। हांलाकि इस प्रकार का कोई लिखित कानून नही है, लेकिन विश्व बैक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष दोनो पर अमेरिका व यूरोप के वर्चस्व तथा दोनो की अनौपचारिक मिलीभ्रगत के कारण विश्व बैंक का अध्यक्ष सदैव अमेरिका से तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का प्रबन्ध निर्देशक यूरोप के किसी देश से हाता है।
इसी वर्चस्व को समाप्त करने की मांग ब्रिक्स व ग्लोबल साउथ के अन्य संगठनों द्वारा बार -बार उठायी जाती रही है, लेकिन इसका अब तक कोई समाधान नही हो पाया।

Image Courtesy: facebook
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