क्या यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिक्स (BRICS) क्या अमेरिका की एकपक्षीयता (यूनिलैटरलिज़्म) का सामना करने के लिये यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिक्स (BRICS) एक साथ आ सकते है ?

पिछले एक साल से, अमेरिका एकपक्षीयता अथवा एकतरफा नीतियां बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था के लिए एक बड़ा ख़तरा बने हुए हैं।

1. ब्रिक्स देश अमेरिका एकतरफा नीतियों का सामना कर रहे हैं – जैसे ट्रंप की एकतरफ़ा टैरिफ नीतियां, रूस पर प्रतिबंध, ईरान परमाणु समझौते को रद्द करना और ईरान के खिलाफ आक्रामक आदि।

भारत और चीन को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ के तहत संभावित ‘सेकेंडरी सैंक्शन’ (दूसरे देशों पर लगने वाले प्रतिबंध) का सामना करना पड़ सकता है। इस एक्ट को हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने पास किया था और 18 सितंबर 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

यह एक्ट अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% तक टैरिफ़ लगाने का अधिकार देता है जो रूस से तेल और प्राकृतिक गैस का आयात जारी रखते हैं। राष्ट्रपति के पास कुछ देशों के साथ बातचीत और समझौते के द्वारा प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी है। चीन और भारत रूसी तेल के सबसे बड़े आयातक हैं। भारत अब अपने तेल आयात का 40 प्रतिशत रूस से मंगाता है।

2. यूरोपीय और नाटो देश भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के एकतरफा फैसलों से उतने ही प्रभावित हैं – जैसे डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी, कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बताने का दावा, नाटो फ्रेमवर्क के अन्तर्गत यूरोपीय सुरक्षा मेंअमेरिका की घटती भूमिका, और कनाडा व कई अन्य देशों के विरूद्ध एकतरफा तथा मनमाना टैरिफ़।

इसके अलावा, ट्रंप के एकतरफ़ा फ़ैसले वैश्विक संस्थाओं पर भी असर डालते हैं: जैसे पेरिस जलवायु समझौते से हटना, इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के जजों पर प्रतिबंध लगाना, और विष्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र (DSM) में मध्यस्थों की नियुक्ति का अनुमोदन नहीं करना आदि।

क्या BRICS और यूरोपीय देश मिलकर अमेरिकी एकपक्षीय नीतियों का सामना कर सकते हैं?

नहीं।

हालाँकि दोनों पक्ष अमेरिकी नीतियों से प्रभावित हैं और बहुपक्षवाद का समर्थन करते हैं, लेकिन कुछ बुनियादी कारणों से वे एक-दूसरे के करीब नहीं आ सकते।

1. यूरोपीय देशों में यह सोच बहुत गहरी है कि रूस यूरोपीय सुरक्षा के लिए एक संभावित खतरा है। इसलिए, वे चल रहे युद्ध में रूस के विरूद्ध यूक्रेन का समर्थन करते रहेंगे। यह सोच उन्हें एक-दूसरे से अलग रखेगी।

2. चीन की गैर-लोकतांत्रिक सरकार, विस्तारवादी नीति, आर्थिक नीतियां और व्यापार व जरूरी अथपा क्रिटिकल खनिजों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल चीन को यूरोपीय देशों की नजर में एक संदिग्ध साझीदार बनाता है। यूरोपियन संघ ने पहले से ही चीन को वैश्विक व्यवस्था के लिए एक ‘सिस्टमिक थ्रेट’ (व्यवस्थागत खतरा) घोषित किया हुआ है।

3. अमेरिका के एकतरफा निर्णयों और अनिश्चितता के बावजूद, यूरोपीय देशों को अभी भी अमेरिका के साथ सुलह की उम्मीद है। अभी यूरोपीय देश अमेरिका से अलग होने के लिये पूरी तरह से तैयार नही है। उदाहरण के लिये ग्रीनलैंड के मामले पर स्वीडन व अमेरिका एक सुरक्षा समझौते का प्रयास भी कर रहे हैं। रूस का खतरा कतिपय यूरोपीय देशों को अमेरिका से अलग नही हाेने दे रहा है।

चित्र साभार- चाइना डेली

हालांकि भारत ब्रिक्स तथा यूरोप के बीच एक संतुलन बनाने वाली ताकत हो सकता है, लेकिन इस असंतुलन को ठीक करने के लिए दोनों पक्षों (यूरोपीय संघ और रूस-चीन) पर भारत का प्रभाव सीमित है।

रूस तथा यूरोप के बीच मतभेद यूक्रेन युद्ध की वजह से और अधिक बढ़ गए हैं। इस तरह, ब्रिक्स देशों और यूरोप के बीच के ये बुनियादी अंतर ट्रंप को कम से कम कुछ समय के लिए बिना किसी रोक-टोक के अपनी एकतरफा नीतियां चलाने का मौका देंगे।

Leave a Reply

Discover more from PSIR Simplified

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading