भारत में न्यायिक जवाबदेही की मुख्य चुनौती यह है कि एक तरफ न्यायपालिका के विरूद्ध कदाचार की शिकायते व आरोप निरनतर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी आरे इसे रोकने के लिये संसद द्वारा न्यायाधीशों को पदमुक्त करने के अलाव कोई साधन नही है। यदि इस प्रक्रिया के बीच न्यायाधीश त्यागपत्र दे देता है तो उसके विरूद्ध महाभियोग की कार्यवाही भी निरस्त हो जाती है।
भारत में न्यायाधीशों के विरूद्ध नियम विरूद्ध आचरण की शिकायतें निरन्तर बढ़ रही हैं। 1993 में, संसद ने निजी फायदे के लिए फंड के गलत इस्तेमाल के आरोपों पर चंडीगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की थी। जस्टिस पी. दिनकरन और जस्टिस सौमित्र सेन ने भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण 2011 में इस्तीफा दे दिया था। जस्टिस सीएस कर्णन को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के लिए छह महीने की जेल की सजा सुनाई गई थी। 2018 में, सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों ने सुनवाई के लिए केस गलत तरीके से आवंटित करने को लेकर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। 2019 में, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस एस.एन. शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में चार्जशीट दाखिल की गई थी । 2019 में, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई पर कोर्ट की एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
हाल का मामला जस्टिस यशवंत वर्मा (इलाहाबाद हाई कोर्ट) से जुड़ा है, जो दिल्ली हाई कोर्ट के जज के तौर पर काम कर रहे थे, जब मार्च 2025 में दिल्ली में उनके सरकारी आवास पर जले हुए नोटों के ढेर मिले थे। उन्हें तुरंत उनके मूल स्थान, इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया और कोई न्यायिक काम भी नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने आंतरिक जांच की और उन्हें दोषी पाया, साथ ही इस्तीफा देने को कहा। लेकिन उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने भारत के राष्ट्रपति से महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की। संसद ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू कर दी है, जो अभी भी संसद में लंबित है। हालांकि, जस्टिस वर्मा ने 10 अप्रैल, 2026 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन राष्ट्रपति ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। इस तरह, लंबित महाभियोग की कार्यवाही जारी रहेगी। अगर महाभियोग सफल होता है, तो जस्टिस वर्मा को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों से वंचित किया जा सकता है। दूसरी ओर, अगर महाभियोग (impeachment) से पहले उनका इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले सभी लाभों के हकदार होते हैं।
एक अलग घटनाक्रम में, फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एन0 सी0 ई0 आर0टी0 (NCERT) द्वारा प्रकाशित कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका के बारे में एक चैप्टर पर स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने उस चैप्टर को तुरंत हटाने का निर्देश दिया क्योंकि इससे न्यायपालिका में लोगों का भरोसा कम होता है। चैप्टर का शीर्षक था ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’, जिसमें अन्य बातों के अलावा, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा की गई थी। इसके बाद, एन0 सी0 ई0 आर0टी0 ने सभी प्रकाशित किताबों से उस विवादित चैप्टर को हटा दिया।
ये मुद्दे भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही के बारे में चिंताएँ पैदा करते हैं।
न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन
न्यायिक स्वतंत्रता भारतीय राजव्यस्था का मुख्य तत्व हैं। न्याय की स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यवस्था के बिना, हम भारत में लोकतंत्र की सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका न केवल लोगों के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा करती है बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में नागरिकों का विश्वास भी मजबूत करती है। संविधान निर्माताओं ने भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कई प्रावधान भी किए हैं। न्यायपालिका ने सरकार से अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संघर्ष भी किया है। कुल मिलाकर, भारतीय न्यायपालिका ने स्वतंत्र तरीके से काम किया है और नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा और विस्तार करने में सफल रही है।
लेकिन न्यापालिका की जवाबदेही भी एक महतवपूर्ण मुद्दा है। भ्रष्टाचार और ईमानदारी की कमी जैसी आंतरिक चुनौतियों के लिए न्यायिक जवाबदेही के किसी तंत्र की आवश्यकता होती है। सरल शब्दों में, जवाबदेही का अर्थ है अपने कार्यों और निर्णयों की जिम्मेदारी लेना’ । लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता को देखते हुए, न्यायिक जवाबदेही को बाहर से सरकार द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है। अथवा न्यायिक स्वतंत्रता को दांव पर रखकर जवाबदेही को लागू नही किया जा सकता है।
इसलिए, हमें न्यायिक जवाबदेही तथा न्यायिक स्वतंत्रता में सामन्जस्य बैइाने की आवश्यकता है। इस तरह का सामन्जस्य बनाने के लिये आंतरिक न्यायिक जवाबदेही का एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसी जवाबदेही के बिना स्वतंत्रता का दावा कायम नहीं रह पाएगा। आन्तरिक जवाबदेही का मतलब है कि न्यापालिका स्वयं अपने को नियंत्रित कर अपनी जवाबदेही सुनिश्चत करे। न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही साथ-साथ चलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट आन्तरिक दिशा में कुछ पहल की हैं। मई 1997 में, कोर्ट की पूर्ण पीठ ने न्यायपालिका के सदस्यों के लिए एक निश्चित आचार संहिता पर सहमति व्यक्त की, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्निर्धारण’ (Restatement of Values of Judicial Life) के रूप में जाना जाता है । इस आचार संहिता में न्यायपालिका के सदस्यों द्वारा पालन किए जाने वाले 16 नियम शामिल हैं, जैसे आम जनता से उपहार स्वीकार न करना, उन मामलों से दूर रहना जिनमें उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुचि है, आदि। इस आचार संहिता का मार्गदर्शक सिद्धांत यह है कि केवल न्याय होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए कि न्याय हुआ है। 2002 में अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने भी आचार-संहिता का एक ऐसा ही नियम घोषित किया था, जिसे ‘बैंगलोर प्रिंसिपल्स ऑफ़ जुडिशियल कंडक्ट‘ (न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांत) के नाम से जाना जाता है। ये सिद्धांत जजों के नैतिक और जवाबदेह आचरण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानक हैं। इन्हें ‘जुडिशियल इंटीग्रिटी ग्रुप‘ ने तैयार किया था और संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद ने इन्हें मंज़ूरी दी थी।
हालांकि, न्यायपालिका को अधिक पारदर्शिता और इस आचार संहिता के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ज़रूरत इस बात की है कि न्यायिक स्वतंत्रता का दावा करने के साथ न्यायपालिका को अपने नैतिक आचरण पर भी ध्यान देना चाहिए।’न्यायिक जवाबदेही न्यायपालिका की स्वतंत्रता का ही एक परिणाम है।
निष्कर्ष
न्यायिक जवाबदेही से कानून के शासन, न्यायपालिका में जनता के भरोसे और संस्थागत ज़िम्मेदारी को बढ़ावा मिलता है । भारतीय लोकतंत्र में लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए हमें न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही, दोनों की एक मज़बूत व्यवस्था की ज़रूरत है। सबसे बड़ी चुनौती न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच सही संतुलन बनाना है। न्यायिक स्वतंत्रता के हित में, न्यायिक जवाबदेही की व्यवस्था को बाहर से लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए, न्यायपालिका को खुद ही न्यायिक जवाबदेही की एक व्यावहारिक और प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी। इससे कार्यपालिका और विधायिका जैसे बाहरी स्रोतों से ज़्यादा न्यायिक स्वतंत्रता के उसके दावे को मजबूती मिलेगी।
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