भारतीय संविधान में न्याय व न्यायपालिका का महत्व
भारत के संविधान निर्माता लोकतांत्रितक व्यवस्था में न्याय व न्यायपालिका के महत्व के बारे में जानते थे तथा उसे भारत के संविधान में रेखांकित किया है।
पहला, संविधान की प्रस्तावना में भारतीय गणराज्य का लक्ष्य अपने सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता देना बताया गया है। लेकिन यहाँ भी उन्होंने प्रस्तावना में उन्हें लिस्ट करते समय बाकी दो मूल्यों की तुलना में न्याय को प्राथमिकता दी है। प्रसतावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) पहले आता है और उसके बाद उसी क्रम में स्वतंत्रता और समानता को अंकित किया गया है।
दूसरा, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 32 में नागरिको को सीधे सर्वोंच्च न्यायालय में जाने के अधिकार को भी एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। इसे संवैधानिक उपचारों का अधिकार कहा गया है। अम्बेडकर ने इस अधिाकार को संविधान की आत्मा कहा है, क्योंकि इस अधिकार के बिना सभी मौलिक अधिकार व्यर्थ हैं।
भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये
क्या उपाय किये गये है?
भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये जो उपाय अपनाये गये हैं उनके दो स्रोत हैं-
अ. न्यायपालिका द्वारा स्वयं अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिये किये गये उपाय
प्रथम, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों जैसे केशवानन्द भारती केस (1973) में न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा शक्ति पृथक्करण को तथा तथा मिनर्वा मिल केस (1980) में न्यायिक पुनरावलोकन को संविधान के मौलिक ढांचे के अन्तर्गत माना है। अतः संसद द्वारा इनमें संशोधन नही किया जा सकता है।
दूसरे, सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये कालेजियम प्रणाली लागू की है। यह प्रणाली 1993 के द्वितीय जजेज केस द्वारा सबसे पहले लागू की गई थी तथा 1998 के तीसरे जजेज केस द्वारा इसे संशोधित किया गया था। इस संशोधन के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये कालेजियम में मुख्य न्यायाधीश सहित पांच वरिष्ठतम न्यायाधाीश होते है तथा उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति तथा स्थानानान्तरण के लिये मुख्य न्यायाधीश सहित तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों की कालेजियम गठित की जाती है।
कालेजियम की सिफरिस के आधार पर ही राष्ट्रपति द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। सरकार एक बार इस सिफारिस को मानने से मना कर सकती है, लेकिन यदि उसी सिफारिस को कालेजियम द्वारा पुनः प्रेषित किया जाता है तो सरकार को उसे मानना बाध्यकारी है।
इस प्रकार कालेजियम व्यस्था के माध्यम से न्यापालिका नियुक्ति के मामले में कार्यपालिका से स्वतंत्र है।

चित्र साभार- ला चक्र
तीसरे, सर्वोच्च ऐसे संविधान संशोधनों को अवैध घोषित कर देता है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करते हैं। उदाहरण के लिये 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने 99वें संविधान संशोधन, 2014 को निरस्त कर दिया था जिसके द्वारा अनुच्छेद 124 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया था। इस केस को चौथे जजेज केस के नाम से जाना जाता है।
ब. भारतीय संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये किये गये उपाय
भारत के संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये निम्न प्रावधान किये गये हैं-
1. अनुच्छेद 124 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधाीशों को हटाने की कठिन प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। न्यायधाीशों को केवल सिद्ध कदाचार तथा मानसिक व शारीरिक अक्षमता के आधार पर संसद के दोनो सदनों में विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव से ही हटाया जा सकता है। सिद्ध कदाचार की जांच 1968 के न्यायाधीश जांच अधिनियम के अन्तर्गत गठित एक तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा की जाती है, जिसमें निम्न न्यायिक सदस्य होते है-
अ. सर्वोच्च न्यायलय कर न्यायाधीश- अध्यक्ष
ब. उच्च न्यायालय का एक मुख्य न्यायाधीश- सदस्य
स. प्रख्यात न्याविद्-सदस्य
2. अनुच्छेद 125 के अन्तर्गत न्यायधीशों को प्राप्त होने वाले वेतन तथा भत्तों में उनके सेवाकाल में कोई कटौती नही की जा सकती है। अनुच्छेद 112 के अन्तर्गत सवौच्च न्यायालय के सम्पूर्ण व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित व्यय घोषित किया गया है। अतः संसद भी उसमें कोई काटौती नही कर सकती है। लेकिन वित्तीय आपात काल में राष्ट्रपति द्वारा उनके वेतन में कटौती की जा सकती है।
3. अनुचछेद 129 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायलय है, जिसमें उसे अपनी अवमानना हेतु दण्डित करने का अधिकार प्राप्त है। अवमानना की प्रक्रिया का उल्लेख 1971 के न्यायाधाीश अवमानना अधिनियम में किया गया है। इस अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत अवमानना के लिये किसी व्यक्ति को 6 माह का कारावास अथवा 2000 रूपये जुर्माना अथवा दोनो दिये जा सकते हैं।
4. अनुच्छेद 124(7) के अनुसार सेवानिवृत्ति के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भारत के किसी न्यायालय अथवा प्राधिकारी के समक्ष वकालत नही कर सकते हैं।
5. अनुच्छेद 145 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया संबन्धी नियम बनाने का अधिकार है। इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नही है।
6. अनुच्छेद 146 के अनुसार सरकार के हस्तक्षेप के बिना सर्वोच्च न्यायालय को अपने अधिकारियो तथा कर्मचारियो की नियुक्ति तथा पदमुक्ति का अधिकार है।
संक्षेप में उक्त न्यायिक तथा संवैधानिक उपायों द्वारा भारत में न्यापालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने का प्रयास किया गया है। लगभग ऐसे ही प्रावधान उच्च न्यायलयों की स्वतंत्रता के लिये किये गये हैं।
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