नार्डिक शिखर सम्मेलन क्या है? नार्डिक क्षेत्र में भारत के क्या हित संलग्न हैं?

नार्डिक शब्द मूल रूप से यूरोप की प्राचीन नार्श भाषा से आया है, जिसे बाद में फ्रांसीसी तथा अंग्रेजी भाषा में अपना लिया गया था। अंग्रेजी में ’नार्डिक’ शब्द का अर्थ होता है- उत्तरी अर्थात उत्तरी यूरोप। अतः उत्तरी यूरोप के देशों को नार्डिक देश कहा जाता है। इसमें पांच देश आते हैं- डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे, आइसलैंड तथा फिनलैंड। इन पांच देशों से घिरे क्षेत्र को नार्डिक क्षेत्र कहा जाता है।

भारत इन पांच देशों के साथ नियमित रूप से शिखर सम्मलनों का आयोजन करता है जिनमें भारत के प्रधानमंत्री के साथ इन पांचों देशों के शासनाध्यक्ष भी भाग लेते हैं।

पहला भारत- नार्डिक शिखर सम्मेलन स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में अप्रिल 2018 में आयोजित किया गया था। इसी क्रम में दूसरा भारत- नार्डिक शिखर सम्मेलन मई 2022 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में आयोजित किया गया था।

तीसरा भारत- नार्डिक शिखर सम्मेलन

इसी कड़ी में तीसरा शिखर सम्मेलन 19 मई 2026 को नार्वे की राजधानी ओसलो में आयोजित किया गया था। उस सम्मेलन में भाग लेने के लिये भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने नार्वे की यात्रा  की थी। इसी यात्रा के दैारान मोदी नीदरलैंड भी गये थे। इस सम्मेलन में दोनो पक्षों ने आपसी लाभ के महत्वपूर्ण विषयों पर विचार विमर्श किया था।

इस सम्मेलन की महत्वपूर्ण उपलब्धियां निम्नलिखित हैं-

  1. दोनो पक्षों ने अपनी साझेदारी का दर्जा बढ़ाया तथा इसका नाम ग्रीन टेक्नालाजी एण्ड स्ट्रेटजिक साझेदारी रखा गया।
  2. क्लीन इनर्जी तथा समुद्र आधारित नीली अर्थव्यवस्था में सहयेाग पर सहमति ।
  3. बहुपक्षीयता को मजबूत बनाने में सहयोग।
  4. ए0 आई0 सहित अन्य उच्च तकनीकों के विकास में सहयोग।
  5. आर्कटिक तथा ध्रुवीय शोध में सहयोग पर सहमति।
  6. व्यापार तथा निवेश बढने पर सहमति।

नार्डिक क्षेत्र में भारत के क्या हित निहित है?

  1. नार्डिक देश मानव विकास में अत्यधिक विकसित है तथा संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में सदैव शीर्ष स्थान पर रहते हैं। इन देशों की प्रति व्यक्ति औसतन आय लगभग 70000 डालर है। इसके साथ ही ये देश क्लीन इनर्जी, स्वच्छता, उच्च तकनीकि तथा पर्यावरण प्रबन्धन के क्षेत्र में अग्रणी देश हैं। भारत इन देशों के साथ विकास साझेदारी कर अपने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को सफल बना सकता है।
  2. नार्डिक क्षेत्र में भारत का सबसे महत्वपूर्ण हित आर्कटिक क्षेत्र में शोध तथा भविष्य में उत्तरी समुद्री मार्ग का प्रयोग करना है।  आर्कटिक की जलवायु भारत को प्रभावित करती है। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण वहां आवागमन तथा व्यापार के लिये भारत व यूरोप को जोड़ने वाले कम दूरी वाले उत्तरी समुद्र मार्ग की सभावना भी बन रही है। इसके अलावा आर्कटिक क्षेत्र में तेल व खनिजों की भी अपार संभावनायें है।

लेकिन आर्कटिक क्षेत्र ग्लोबल कामन क्षेत्र नही है वरन् यह क्षेत्र आठ सदस्यीय आर्कटिक परिषद के नियंत्रण व प्रबन्धन के अधीन है। आर्कटिक परिषद में उक्त पांच नार्डिक देशों के अलावा अमेरिका, कनाडा तथा रूस भी शामिल हैं। आर्कटिक परिषद की स्थापना 1996 में की गई थी। आर्कटिक परिषद का सदस्य केवल वही देश हो सकता है जिसकी तटीय सीमा आर्कटिक क्षेत्र को छूती है। अतः आर्कटिक क्षेत्र में अपने हितो की पूर्ति के लिये भारत को नार्डिक देशों से सहयोग करना आवश्यक है।

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आर्कटिक सर्किल से घिरा आर्कटिक क्षेत्र- चित्र साभार ब्रिटानिका

आर्कटिक में भारत के प्रयास

आर्कटिक क्षेत्र 66.5 डिगी उत्तरी अक्षांश से लेकर उत्तरी ध्रुव तक फैला है। भारत ने इस क्षेत्र में अपने हितों की पूर्ति के 2008 में नार्वे के सहयोग से नार्वे के क्षेत्र स्वालवाड में हिमाद्रि नामक शोधशाला की स्थापना की थी जो आज भी कार्यरत है। 2013 में भारत ने आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राIत किया है। वर्तमान में भारत उत्तरी समुद्र मार्ग के उपयोग का प्रयास कर रहा है।

Between Asia and Europe- the new North Sea Route in Red; and existing route in blue : Image Courtesy: ORF

आर्कटिक क्षेत्र में अपने प्रयासों को व्यवस्थित रूप देने के लिये 2021 में भारत ने एक नई आर्कटिक नीति की घोषणा की है। भारत की आर्कटिक नीति में निम्न 6 स्तम्भ है-

1. विज्ञान और अनुसंधान- जिसमें शोध ढ़ाचे व गतिविधयों को मजबूत करना शामिल है।

2. जलवायु और पर्यावरण संरक्षण- इसके अर्न्तर्गत आर्कटिक द्वोत्र में पिघलती बर्फ के भारतीय मानसून, तथा हिमालय के ग्लेशियरों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन शामिल है।

3. आर्थिक और मानव विकास- जिसमें आर्कटिक क्षेत्र में पर्यटन, मत्स्य पालन (Fisheries) और नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत, दुर्लभ पृथ्वी खनिजों तेल और प्राकृतिक गैस की खोज की संभावना तलाशना शामिल है।

4. परिवहन और कनेक्टिविटी– इसमें उत्तरी समुद्री मार्ग का प्रयोग करना शामिल है।

5. शासन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग- इसमें आर्कटिक परिषद (Arctic Council) में एक पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भारत की भागीदारी को मजबूत करना करना शामिल है।

6. राष्ट्रीय क्षमता निर्माण- इसमें उक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये भारत की क्षमताओं को बढ़ाना शामिल है।

भारत की अर्कटिक नीति के क्रियान्वयन के लिये पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अन्तर्गत कार्यरत गोवा स्थित राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र का नोडल अभिकरण बनाया गया है।

इस प्रकार हम कह सकते है कि भारत को आर्कटिक क्षेत्र में अपनेहितों की पूर्ति तथा आर्कटिक नीति की सफलता के लिये नार्डिक देशों के साथ सहयेाग आवश्यक है। भारत- नार्छिक शिखर सम्मेलन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

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