क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग व अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच निरन्तर मुलाकातों से ताईवान का भविष्य प्रभावित होगा?
शी जिनपिंग ने 23 से 25 सितंबर 2026 अमेरिका की राजकीय यात्रा की, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें एअरपार्ट में अगुवानी की तथा बाद में वाशिंगटन में उनका भव्य स्वागत किया। यह 11 साल के अंतराल के बाद चीन के किसी राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा थी। आम तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति किसी विदेशी महमान की एअरपोर्ट पर अगुवानी नही करते। ट्रम्प के पहले 1962 में केनेडी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री की एअरपोर्ट पर अगुवानी की थी। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि ट्रम्प चीन के राष्ट्रपति को खुश करने के लिये कितने लालायित थे। यद्यपि इस यात्रा से कोई खास आउटकम सामने नही आया, लेकिन दोनो नेता ने अपने 2025 के व्यापार समझौते को दो माह के लिये आगे बढ़ाने, व्यापार शुलक में 30 बिलियन उालर की कटौती करने, तथा ए0 आई0 पर बातचीत जारी रखने पर सहमत हुये हैं।
यह एक साल के अन्दर दोनो नेताओं की तीसरी मुलाकात थी। इसके पहले अक्टूबर, 2025 में दक्षिण कोरिया के शहर बुसान में तथा मई 2026 में ट्रम्प की चीन यात्रा के दौरान दोनो नेताओं की व्यक्तिगत मुलाकात हुई थी। इसके अलावा शीघ्र ही दोनो नेताओं ने नवम्बर, 2026 में चीन में होने वाले एपेक सम्मेलन तथा दिसम्बर 2026 में मियामी, अमेरिका में होने वाले जी-20 सम्मेलन में व्यक्तिगत मुलाकात की सहमति व्यक्त की है।
इन मुलाकातों का कोई सामरिक प्रभाव तुरन्त भले ही न दिखाई दे, लेकिन हिन्द -प्रशान्त क्षेत्र के अमेरिका के सहयोगी देश इन मुलाकातों विशेषकर चीन को अपने साथ लाने की ट्रम्प की तत्परता तथा ट्रम्प की नीतिगत अनिश्चतता के कारण चिन्तित अवश्य है। इन देशों में जापान, साउथ कोरिया, आस्ट्रेलिया, भारत तथा ताईवान मुख्य है। इसका कारण यह है कि ये देश किसी न किसी रूप में अमेरिका की चीन को रोकने की नीति के कारण अमेरिका के सहयोगी बने हुये थे। अमेरिका की चीन को संतुलित करने की रणनीति 2011 में पाइवट एशिया (Pivot Asia) नीति के अन्तर्गत आरंभ की गई थी। इस नीति के अन्तर्गत अमेरिका ने न केवल हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र में अपनी नौसेना की तैनाती बढ़ाई, वरन् इस क्षेत्र के देशों के साथ मिलकर क्वाड तथा औकस जैसे संगठनों से चीन को घेरने की नीति को मूर्त रूप दिया। इसके अलवा चीन ने इस क्षेत्र के अपने परम्परागत मित्रों जैसे जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया आदि को सुरक्षा की गारंटी भी दे रखी है।
ताईवान कैसे प्रभावित है?
अमेरिका के उक्त प्रयासों से ताईवान भी चीन के अधिग्रहण से सुरक्षित था। लेकिन अब चीन के प्रति ट्रम्प के बदलते दृष्टिकोण से सबसे अधिक ताईवान की सुरक्षा ही प्रभावित है। चीन का मानना है कि ताईवान उसका अभिन्न अंग है तथा उसे वह शांतिपूर्ण अथवा यदि आवश्यक हुआ तो सैनिक उपायों से लेकर रहेगा। चीन ने कई बार अमेरिका को ताईवान के मामलें में संभलकर चलने की चेतावनी भी दी है।
औपचारिक रूप से अमेरिका भी ताईवान को चीन का ही भाग मानता है। चीन में इसे वन चाइना नीति के रूप में जाना जाता है। इस संबन्ध में ताईवान से अपने संबन्धों का निर्धारित करने के लिये अमेरिका ने 1979 में ताईवान रिलेसन्स एक्ट पारित किया था। इस एक्ट में ताईवान को चीन का अंग मानते हुये भी अमेरिका ने ताईवान की चीनी सैनिक हसतक्षेप के विरूद्ध सुरक्षा की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। इस प्रकार से अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैनिक उपस्थिति तथा ताईवान को आधुनिक हथियारों की आपूर्ति कर उसकी सुरक्षा को मजबूत किया है। अमेरिका की उक्त रणनीति से चीन को यह विश्वास था कि यदि वह ताईवान के विरूद्ध सैनिक कार्यवाही करता है तो अमरिका उसमे अवश्य ही सैनिक हस्तक्षेप करेगा।
हो सकता है कि ट्रम्प भविष्य में भी ताईवान की रक्षा के लिये सैनिक हसतक्षेप करे, लेकिन चीन के प्रति ट्रम्प के बदलते दृष्टिकोण से मनोवैज्ञानिक रूप से चीन यह सोच सकता है कि अब अमेरिका ताईवान के मामले में शायद सैनिक हस्तक्षेप न करे। चीन का यह सोचना ही ताईवान के लिये सबसे बड़ा खतरा है। यह सभी जानते है कि ताईवान अकेले चीन की सेनाओं से अपना बचाव नही कर पायेगा। चीन की नई सोच के कतिपय ठोस आधार भी हैं। ट्रम्प ने शी जिनपिंग से अपनी मुलाकातों के बाद ताईवान को दी जाने वाली 14 बिलियन डालर के हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगा दी है। ट्रम्प की सुरक्षा गारन्टी की शिथिलता का एक नया मामला साउदी अरब में सामने आया है। अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही साउदी अरब को सुरक्षा प्रदान करता रहा है, लेकिन सितम्बर 2026 में हूथी आक्रमण के विरूद्ध अमेरिका ने साउदी अरब को सैनिक संरक्षण देने से मना कर दिया है। इन घटनाओं से ताईवान मे सैनिक कार्यवाही के लिये चीन का मनोबल मजबूत होगा।
इस बदले माहौल में चीन अपनी जानी पहचानी नीति के अन्तर्गत अमेरिका का रूख भांपनें के लिये ताईवान की खाड़ी में निकट भविष्य में अपनी सैनिक गतिविधयां बढ़ा सकता है। और ऐसी स्थिति में ट्रम्प ने यदि चीन के प्रति नरमी दिखाई अथवा तुष्टीकरण की नीति अपनाई तो आगे चलकर ताईवान में चीन की सैनिक कार्वाही को रोकना मुश्किल होगा। ट्रम्प चीन के राष्ट्रपति से अपनी इन मुलाकातों के व्यापारिक लाभों का तो आंकलन कर रहे है, लेकिन वे इनके सामरिक तथा मनोवैनिक प्रभावो से अनभिज्ञ प्रतीत होते हें। कान्स्ट्रक्टिविज्म अथवा रचनावादी सिद्धान्त के अनुसार मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्तर्राष्ट्रीय संबन्धों में अहम् भूमिका निभाते हैं।

Image Courtesy: Tarangya
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