अमेरिका तथा इजराइल ने 28 फरवरी, 2026 को जब अचानक हमला किया था तो ईरान को व्यापाक तबाही का सामना करना पड़ा था। आरंभिक आक्रमण में ईरान के सुप्रीम नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई सहित कई अन्य नेता तथा शीर्ष सैनिक अधिकारी भी मारे गये थे। उसके बाद 7 अप्रिल, 2026 तक चले निरन्तर युद्ध में ईरान में जनधन की व्यापक हानि हुई है।
इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने इजराइल तथा फारस की खाड़ी स्थित देशों जैसे कुवैत, साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात बहरीन तथा कुवैत पर ड्रोन तथा मिसाइलों से हमले करके इस युद्ध को एक नया रूप दे दिया। ईरान का तर्क था कि खाड़ी के देशों में अमेरिका को सैनिक सुविधायें उपलब्ध हैं। कुछ भी हो अमेरिका खाड़ी के अपने मित्र देशों को सुरक्षा प्रदान करने में असफल रहा है।
ईरान की दूसरी सामरिक चाल यह थी कि उसने हार्मुज जलडमरूमध्य को बन्द कर दिया, जिससें विश्व बाजार में तेल की कीमतें बढ़ गयीं तथा तेल आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो गयी। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिये स्वयं उसके जहाजों को रोकने के के लिये ओमान की खाड़ी में समुद्री नाकेबन्दी कर रखी है। कुल मिलकर हार्मुज जलडमरूमध्य आज भी बन्द है। अमेरिका ने ईरान के विरूद्ध अधिकतम दबाव की नीति अपनाते हुये ईरान के विरूद्ध कई तरह के कड़े आर्थिक तथा सैनिक प्रतिबन्ध लगा रखें हैं। लेकिन उक्त युद्ध तथा प्रतिबन्धों के बावजूद ईरान अपनी राजनीतिक स्थिरता को बचाने में सफल रहा है। ईरान का बचे रहेन ही उसकी जीत है,क्योंकि अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी सैनिक शक्ति है।
युद्ध विराम तथा समझोते की आशा
दोनो पक्षों के बीच आठ अप्रिल 2026 को युद्ध विराम लागू हुआ। इसके अन्तर्गत 17 जून 2026 को पाकिस्तान की मध्यस्थता से ईरान तथा अमेरिका के बीच 60 दिन के अन्दर स्थाई समझौता करने पर सहमति बनी थी, लेकिन ऐसा समझौता 30 सितम्बर, 2026 तक नही हो पाया है। दोनो के बीच गहरे मतभेद के चलते निकट भविष्य में भी समझौते की उम्मीद कम है। इस दौरान दोनो के बीच यदा-कदा दोनो तरफ से सैनिक हमले भी हुये हैं।
ईरान युद्ध के कारण अमेरिका का सामरिक प्रभाव पश्चिम एशिया मे कैसे कम हो रहा है?
- ईरान पर अमेरिका के हमले का मुख्य उदद्येश्य ईरान की इस्लामिक सत्ता में परिवर्तन तथा ईरान की सैनिक क्षमता को नष्ट कर उसे परमाणु हथियारों पर समझौते के लिये विवश करना था। लेकिन अमेरिका इन दोनो ही उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहा है। इस असफलता का परिणाम यह था कि अमेरिका के राष्ट्रपति बार-बार अपने युद्ध उद्देश्यों को बदलते रहे हैं। अपने सर्वोच्च् नेता की हत्या के बाद भी ईरान अपनी इस्लामिक सत्ता को बचाने में सफल रहा है तथा उसे चीन तथा रूस का पर्याप्त समर्थन भी मिला है। ईरान ने परमाणु ईधन को सौंपने पर भी कड़ा रूख अपना रखा है।
- अमेरिका द्वारा 28 फरवरी, 2026 को अपारेशन एपिक फ्यूरी के अन्तर्गत किये गये हमले के पहले हार्मुज जलडमरूमध्य खुला था, लेकिन अमेरिकी सैनिक कार्यवाही के बाद एक रणनीतिक हथियार के तौर पर ईरान ने हार्मुज जलडमरूमध्य बन्द कर दिया है। अमेरिका तमाम प्रयासों, यहां तक की ईरान की सैनिक नाकेबन्दी के बाद भी हार्मुज जलडमरूमध्य को नही खुलवा पाया है। परिणामतः विश्व में तेल का संकट खड़ा हो गया है। उल्लेखनीय है कि हार्मुज जलडमरूमध्य से विश्व के 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। हार्मुज जलडमरूमध्य का बन्द रहना अमेरिकी की रणनीतिक हार है तथा विश्व के देश इसके लिये अमेरिका की आलोचना कर रहे हैं।
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका खाड़ी के देशों जैसे साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कत्तर आदि को सुरक्षा की गारन्टी देता रहा है। अमेरिका का पाचवां जहाजी बेड़ा बहरीन के मनामा शहर में स्थापित है। खाड़ी के अन्य देशों में भी अमेरिका को सैनिक सुविधायें प्राप्त हैं। इसके बावजूद जब ईरान ने अमेरिकी हमले के विरोध में खाड़ी देशों पर ड्रोन तथा मिसाइलों से हमले कियो तो अमेरिका इन देशों को सुरक्षा प्रदान करने में असफल रहा। यहां तक कि सितम्बर 2026 में जब ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों ने साउदी अरब पर हमले करने शुरू किये तो अमेरिका ने साउदी अरब के अनुरोध पर उसे हवाई सुरक्षा देने से मना कर दिया। इन घटनाओं का परिणाम यह हुआ है कि खाड़ी देशों को अमेरिका सुरक्षा को लेकर विश्वास डगमगा गया है। इसका तात्कालिक परिणाम यह सामने आया है कि पश्चिम एशिया में अमेरिका को छोड़कर क्षेत्रीय सुरक्षा के नये प्रयास तेज हो गये हैं। सात अगस्त 2026 को साउदी अरब, पाकिस्तान तथा तुर्की ने मक्का संयुक्त सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये है, जिसमें कहा गया है कि इनमें किसी एक देश पर बाह्य आक्रमण तीनो देशों के विरूद्ध आक्रमण माना जायेगा तथा तीनों देश मिलकर उसका सामना करेंगे। इस प्रकार भविष्य में पश्चिम एशिया अमेरिका की सामसरिक स्थिति कमजोर होगी।
- ईरान युद्ध के कारण राष्ट्रपति ट्रम्प को घरेलू मोर्चे पर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका में इसे आवश्यक युद्ध नही वरन् स्वेच्छा का युद्ध अथवा वार आफ च्वाइस माना जा रहा है। ईरान युद्ध में अमेरिका का खुल खर्च बढ़कर 43 बिलियन डालर हो गया है तथा उसके रिजर्व हथियार भी कम हो गये हैं। पर्यवेक्षक नवम्बर, 2026 में इस युद्ध के कारण कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प की हार की भविष्यवाणी कर रहे है। अगर ऐसा होता है तो ट्रम्प प्रशासन अमेरिकी कांग्रेस में अल्पमत में आ जायेगा।
- पश्चिम एशिया में अमेरिका की कमजोर होती स्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसने 30 सितम्बर, 2026 को ईराक से अपनी सेनाये वापिस बुला ली है। ईराक में इसे स्वतंत्रता के जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। ईराक में अमेरिकी सेनाये पहली बार 2003 में तैनात की गयी थी जब राष्ट्रपति बुश ने तीन देशों इराक, ईरान तथा उत्तरी कोरिया को एक्सिस आफ इविल की संज्ञा देकर ईराक के शासक सद्दाम हुसैन के विरूद्ध सैनिक कार्यवाही आरंभ की थी।
इसका दूसरा पहलू यह है कि इराक से अमेरिकी सेनाओं के वापिसी के बाद वहां ईरान का प्रभाव बढ़ जायेगा, क्योंकि इराक में इस समय ईरान समर्थक शिया समूह हसद अल शाबी (पापुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज) बहुत सक्रिय है तथा मजबूत स्थिति में है। पापुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज की संख्या इस समय 2,40000 है तथा इन फोर्सेज ने वर्तमान ईरान युद्ध के दौरान 600 से अधिक बार अमेरिका की सेनाओं से झड़पें की हैं। अमेरिका की सेनाओं की ईराक से वापिसी के बाद इरान समर्थित पापुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज बहुत मजबूत स्थिति में आ जायेंगी। अतः ईरान इस क्षेत्र में कमजोर होने की बजाय और अधिक मजबूत हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि इराक में शिया अबादी लगभग 60 प्रतिशत है।
उक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ईरान युद्ध के बाद पश्चिम एशिया में अमरिका की सामरिक स्थिति कमजोर होना तय है। ट्रम्प ईरान युद्ध में बुरी तरह उलझ गये हैं तथा बाहर िनकलने का कोई सम्मानजनक रास्ता नही दिखाई दे रहा है।

Image Courtesy: The Century Foundation
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