श्यामा प्रसाद मुखर्जी का राजनीति में क्या योगदान है? उन्होंने 1948 में हिन्दू महासभा तथा 1950 में नेहरू मंत्रिमंडल से क्यों त्यागपत्र दिया?

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी (06 जुलाई 1901 से 23 जून 1953)का जन्म कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे तथा बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक वकील, शिक्षाविद् व राजनेता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता से ग्रहण की तथा विधि की पढ़ाई इंगलैंड से पूरी की। वे 1934-38 तक कलकत्ता विश्व विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति थे। बाद में 1938 में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट की मानद उपाधि भी प्रदान की।

राजनीतिक योगदान

उनके राजनीतिक जीवन को दो भागों में बांटा जा सकता है-

  • स्वतंत्रता के पूर्व राजनीतिक योगदान

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1929 में कांगेस की सदस्यता ग्रहण कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। 1929 में ही वे कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में पहली बार बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गये। लेकिन 1930 में कांग्रेस ने बंगाल विधान परिषद के विरोध का आह्वान किया तथा 1930 में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल विधान परिषद की सदस्यता तथा कांग्रेस दोनो से त्याग पत्र दे दिया। इस प्रकार वे अपने जीवन काल में केवल दो वर्ष ही कांग्रेस के सदस्य रहे। इसके बाद वे 1930 में ही निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दोबारा चुनाव लड़कर बंगाल विधान परिषद के सदस्य बने।  1937 व 1946 के चुनावों में भी वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गये। 1939 में उन्होंने पहली बार हिन्दूमहासभा की सदस्यता ग्रहण की।

जब कांग्रेस मंत्रिमंडल ने 1939 में बंगाल सरकार से त्यागपत्र दे दिया तो वहां 1941 में फजलूल हक के नेतृत्व में कृषक प्रजा पार्टी की सरकार बनी तथा इस सरकार में वे हिन्दू महासभा के सदस्य के रूप में 1941-1942 तक वित्त मंत्री भी रहे। ब्रिटिश प्रतिबन्धों के कारण उन्होंने 1942 में वित्तमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया तथा 1942 में मिदनापुर जिले में आयी भयंकर बाढ़ में राहत पहुचाने में अग्रणी भूमिका निभाई।

वे चौथी बार 1946 में बंगाल विधान परिषद के चुनाव में सफल हुये तथा संविधन सभा के सदस्य भी चुने गये। 1946 में उन्होंने बंगाली हिन्दू होम रूल की मांग की, जिसमें बंगाल का विभाजन शामिल था, ताकि हिन्दू समुदाय विभाजन के बाद मुस्लिम बाहुल्य ईस्ट पाकिस्तान के अधीन न हों। भारत के विभाजन के बाद बंगाल विधान परिषद की उनकी सदस्यता समाप्त हो गयी। इस प्रकार वे 1929 से निरन्तर 1947 तक बंगाल विधान सभा के सदस्य रहे तथा उनकी राजनीति का केन्द्र बंगाल प्रान्त ही रहा।

ब. स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक योगदान

स्वतंत्रता के बाद 15 अगस्त 1947 को नेहरू ने अपने नये मंत्रिमंडल का गठन किया, जिसमें 15 मंत्री थे। इनमें से चार गैर-कांग्रेसी मंत्री थे-

  1. सरदार बलदेव सिंह (शिरोमणि अकाली दल)- रक्षा मंत्री
  2. आर0के0 सन्मुखम रेड्डी (जस्टिस पार्टी) वित्त मंत्री
  3. बी0 आर अम्बेडकर (आल इण्डिया श्यडूल कास्ट फेडरेशन) विधि मंत्री
  4. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ( हिन्दू महासभा) उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री

इस प्रकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी 15 अगस्त 1947 को महासभा के सदस्य के रूप में स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग व आपूर्ति मंत्री बने।

हिन्दू महासभा से मतभेद

श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहली बार 1939 में हिन्दू महासभा के सदस्य बने थे तथा वे 1940-42 की अवधि में हिन्दू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष तथा 1944-48 की अवधि में इसके पूरे अध्यक्ष भी रहे। अन्ततः उन्होंने 1948 में निम्न मतभेदों के कारण हिन्दू महासभा से त्यागपत्र दे दिया-

  1. वे हिन्दू महासभा में गैर-हिन्दुओं की सदस्यता के पक्षधर थे, लेकिन हिन्दू महासभा ने इसे स्वीकार नही किया।
  2. 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद हिन्दू महासभा भी अप्रत्यक्ष रूप से विवाद में आ गयी। इस कारण वे हिन्दू महासभा भी जुड़े नही रहना चाहते थे।

नेहरू से मतभेद

वे 1950 में संपन्न नेहरू – लियाकत अली समझौते से सहमत नही थे। इस समझौते के द्वारा भारत तथा पाकिस्तान दोनो ने अल्पसंख्यकों के संरक्षण पर सहमति व्यक्त की थी। अतः विरोधस्वरूप उन्होंने अप्रिल 1950 में नेहरू मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया।

इसके बाद उन्होंने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। भारतीय जनसंघ का 1977 में नवगठित जनता पार्टी में विलय हो गया था। 1979 में जनता पार्टी के विघटन के बाद भारतीय जनसंघ का पुनर्गठन 6 अप्रिल 1980 को भारतीय जनता पार्टी के रूप में किया गया।

कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 370 के अन्तर्गत कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति का विरोध किया। उन्होने नारा दिया– एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे। कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने भारत के दूसरे भाग से आने वाले लोगो को कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट लेना आवश्यक कर दिया था। इसी परमिट व्यवस्था तथा कश्मीर की विशेष स्थिति की विरोध करने के लिये वे कश्मीर गये तथा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में 23 जून 1953 को हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई।

इस प्रकार उनका सबसे प्रमुख योगदान 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना था जो आज  भारतीय जनता पार्टी के रूप में कार्यरत है।

चित्र साभार- विकीपीडिया

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