वर्तमान में भारत विश्व पटल पर अपनी मृदुल शक्ति (साफ्ट पावर) का विस्तार करने के लिये प्रयासरत है। किसी देश की हार्ड पावर उसकी दूसरे पर दबाव डालने की क्षमता पर निर्भर करती है, लेकिन मृदुल शक्ति अथवा साफ्ट पावर का मूल तत्व दूसरे देशों में उसके प्रति आकर्षण की क्षमता है। यह आकर्षण क्षमता भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही रही है। प्राचीन काल में इसके सबसे बड़े उदाहरण भारत का बौद्ध धर्म तथा रामायण की परम्परा है। प्राचीन काल में विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण इसलिये नही था कि भारत ने दूसरे देशों पर कोई राजनीतिक साम्राज्यवाद स्थापित किया था, बल्कि इसलिये था क्योंकि इसमें मानव समाज की स्थिरता तथा विकास के श्रेष्ठ तत्व शामिल थे।
प्राचीन काल में बौद्ध परम्परा का प्रचार-प्रसार
गौतम बुद्ध ने मानव आचरण के आठ ऐसे तत्व बताये जो समाज में शांति व विकास का मार्ग प्रशस्त करते है- सम्यक् दृष्टि: चीजों को उनके वास्तविक स्वरूप में सही-गलत समझना, सम्यक् संकल्प: विचारों में शुद्धता रखना और हिंसा, लालच या द्वेष से दूर रहना, सम्यक् वचन सत्य, विनम्र और संयमित बोलना, सम्यक् कर्म: अच्छे और नैतिक कार्य करना; सम्यक् आजीविका: ऐसा उचित व्यवसाय चुनना, जिससे ईमानदारी से जीवन यापन हो सके, सम्यक् प्रयत्न: मन से बुरे विचारों को हटाने और अच्छे विचारों को विकसित करने का निरंतर प्रयास करना, सम्यक् स्मृति: सजग जागरूक रहना, सम्यक् समाधि: मन को एकाग्र करना ।
राजकीय संरक्षण, विद्वानों, व्यापारियों, विदेश यात्रियों के माध्यम से प्राचीन काल में बौद्ध धर्म का एशिया में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ था तथा विदेशी लोगों द्वारा उसे अपनाया गया था। अशोक के प्रयासों से बौद्ध धर्म का हीनयान सम्प्रदाय पहले श्रीलंका और बाद में म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया तक फैला। कनिष्क के शासनकाल में बौद्ध धर्म का महायान संप्रदाय मध्य एशिया, ताशकंद, यारकंद, चीन तथा तिब्बत तक मजबूती से फैला। इसी प्रकार पहली-दूसरी शताब्दी में बौद्ध ग्रंथ चीन पहुंचे। चीन से होते हुए बौद्ध धर्म पहले कोरिया (552 ईस्वी) और फिर जापान पहुंचा। सातवीं शताब्दी (641 ईस्वी) में भारत से बौद्ध धर्म का वज्रयान सम्प्रदाय तिब्बत तथा भूटान में स्थापित हुआ। यह बौद्ध धर्म के मूल्यों की स्वीकार्यता ही थी कि उसे विभिन्न देशों में अपनाया गया तथा उसका अस्तित्व आज भी बना हुआ है।
इसी प्रकार पहली से पांचवी शताब्दी के बीच दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रामायण व उससे संबन्धित संस्कृत ग्रंथों का प्रचार-प्रसार हुआ। पांचवी शताब्दी के कम्बोडिया के वील कन्तल शिलालेखों से पता चलता है कि वहां रामायण की कहानी प्रचलित थी। भारतीय व्यापारियों, विद्वानों, और हिंदू-बौद्ध राजाओं के माध्यम से रामायण और इसकी संस्कृति इस क्षेत्र में पहुंची। भारत के पल्लव, चोल और अन्य राजाओं के साथ-साथ व्यापारियों और बौद्ध/हिंदू संतों ने इस संस्कृति को कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार और लाओस तक पहुंचाया। इस क्षेत्र के देशों द्वारा रामायण की संस्कृति का स्थानीय रूपान्तरण किया गया। उदाहरण के लिये कम्बोडिया में रामायण को ‘रीमकर’ (Reamker) कहा जाता है, जो अंगकोर वाट जैसे मंदिरों में और खमेर संस्कृति में गहराई से रची-बसी है। उसी तरह थाईलैंड में रामायण को ‘रामाकिएन’ कहा जाता है। इन्डोनेशिया के जावा तथा बाली में रामायण को ‘काकाविन रामायण’ और ‘वायंग कुलित’ (छाया कठपुतली कला) के रूप में रूपान्तरित किया गया है।
मध्य युग को भारतीय संस्कृति के बाह्य प्रसार का अन्धा युग कहा जाता है। इसके बाद ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संस्कृति के प्रसार के बात तो दूर , पश्चिमी इतिहासकारों व विचारकों जैसे जे0 एस0 मिल (ब्रिटिश हिस्ट्री आफ इन्डिया-1817); मैकाले; तथा विन्सेंन्ट स्मिथ ( दा अर्ली हिस्ट्री आफ इन्डिया) ने अपने स्रामज्यवादी हितों के कारण भारत की सम्यता व संस्कृति को पुरातनपंथी तथा गतिहीन बताया। मिल कभी भी भारत नही आया, लेकिन उसने भारतीय समाज को अत्यंत पिछड़ा, अंधविश्वासी, आदिम (barbaric) और अकुशल घोषित किया। उसने तर्क दिया कि हिंदू कभी भी स्वशासन के योग्य नही थे। स्मिथ ने निष्कर्ष निकाला कि भारतीय सदैव परतंत्र रहे हैं तथा उनमें कभी भी रजनीतिक एकता नही थी। रूडयार्ड किपलिंग ने तो 1899 में लिखी अपनी एक कविता में गोरे लोंगों को भार (ह्वाइटमैन बर्डन) का विचार दिया, जिसका निहितार्थ यह था कि भारत को सभ्य बनने के लिये विदेशी शासन का भार सहना होगा।
इतना ही नही ब्रिटिश विचारकों ने पश्चिमी सभ्यता की श्रेष्ठता सिद्ध करने तथा भारतीय मनीषियों की उपलब्धियों को कमतर आंकने के लिये कुतार्किक उपमाओं का सहारा लिया। उदाहरण के लिये उन्होंने भारत के चौथी- पांचवी शताब्दी के साहित्यकार कालिदास को भारत का शेक्सपियर कहा, जबकि शेक्सपियर ने अपनी रचनायें 16वीं शताब्दी में लिखी। सवाल यह है कि शेसपियर को ब्रिटेन का कालीदास क्यों नही कहा गया? यही उपनिवेशवादी मानसिकता फिर दोहराई गयी जब कौटिल्य को भारत का मैक्यावली कहा गया, जबकि कौटिल्य ई0 पू0 चौथी शताब्दी में थे तथा इटली के राजनीतिक विचारक मैक्यावली 15वीं शताब्दी में पैदा हुये थे।
गांधी ने विश्व में भारत की उल्टी सांस्कृतिक धारा को सीधा किया
गांधी ने अपने विचारों में भारत की संस्कृति के श्रेष्ठ तत्वों जैसे सत्य (न्यायपूर्ण स्थिति) और अहिंसा, हृदय परिवर्तन से स्थाई बदलाव, आत्म-निर्भरता, भौतिकवादी संस्कृति से प्रेरित असीमित इच्छााओं की आलोचना आदि को अपने वैचारिक फ्रेमवर्क में शामिल किया। उन्हें सफलता इसलिये मिली कि उन्होंने इन शाश्वत मूल्यों को अपने आचरण में अपनाया तथा इन्ही के आधार पर सामजिक व राजनीतिक बदलाव किया। उनके इस कार्य ने भारत की सांस्कृतिक धारा को एक नई दिशा दी। जब अमेरिका के नेता मार्टिन लूथर किंग ने गांधीवादी सिद्धान्तों के आधार पर 1960 के दशक में अमेरिका में काले लोगों के अधिकारों को लिये आन्दोलन चलाया तो उन्हें अमेरिकन गांधी कहा गया। गांधीवादी विचारों के आधार पर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति का विरोध करने वाले लोकप्रिय नेता नेल्सन मांडेला को अफ्रीकन गांधी कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में गांधी जी के जन्म दिन दो अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने को फैसला लिया था। उक्त घटनायें आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के सार्वभौमिक महत्व को रेखांकित करती है। यही गांधी जी का वैश्विक योगदान है। संघर्षों से भरे वर्तमान विश्व में शांति का एकमात्र रास्ता गांधीवाद में निहित है। जीवन्त विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये भी गांधी जी के विचार सार्थक हैं। कम से कम भौतिकवादी संस्कृति से जीवन्त विकास के लक्ष्यों को नही प्राप्त किया जा सकता है। भौतिकवादी संस्कृति में बदलाव की जरूरत है। यही गांधी जी चाहते थे।

प्राचीन काल में भारत का सांस्कृतिक प्रसार- चित्र साभार- विकीपीडिया
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