मदन मोहन मालवीय (25 दिसम्बर, 1861- 12 नवम्बर 1946) का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा म्योर सेन्ट्रल कालेज, इलाहाबाद से, स्नातक उपाधि कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा अन्त में विधि की उपाधि इलाहाबाद विश्व विद्यालय से प्राप्त की थी। म्योर सेन्ट्रल कालेज की स्थापना विलियम म्योर द्वारा 1872 में की गई थी तथा 1921 में उसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मिला दिया गया था। उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत 1884 में गवर्नमेंट हाईस्कूल इलाहाबाद में सहायक मास्टर के रूप में की थी। उन्होंने पहली बार 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लिया। उनके भाषण से इलाहाबाद के पास स्थित कालाकंकर रियासत के राजा रामपाल सिंह बहुत प्रभावित हुये तथा उन्होंने अपने नवस्थापित हिन्दी समाचार पत्र हिन्दुस्तान के सम्पादक के तौर पर मालवीय जी की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया। 1887 में मालवीय जी ने सहायक मास्टर की नौकरी छोड़कर हिन्दुस्तान के सम्पादक के तौर पर काम करना आरभ किया। लेकिन उन्होंने ढ़ाई साल बाद सम्पादक का कार्य छेाड़कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद उन्होंने 1991 में इलाहाबाद जिला न्यायालय में तथा 1993 में हाईकोर्ट इलाहाबाद में वकालत आरंभ की। लेकिन उन्ंहोने 1911 में राष्ट्रीय आन्दोलन, शिक्षा तथा समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने के लिये वकालत से सन्यास ले लिया।
मदन मोहन मालवीय ने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन, पत्रकारिता, तथा समाज सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, गंगा आरती, तथा भारत स्काउट व गाइड आज भी उनकी विरासत के रूप में विद्यमान हैं। भारत सरकार ने मरणोपरान्त 2014 में उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया था।
राष्ट्रीय जीवन में उनके योगदान को निम्न तीन शीर्षकों के अन्तर्गत समझा जा सकता है-
- राष्ट्रीय आन्दोलन में भूमिका
वैसे तो मदन मोहन मालवीय ने 1886 से ही कांग्रेस की गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था लेकिन 1909 में पहली बार कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता अधिक बढ़ गयी। इसके बाद वे 1918, 1932 तथा 1933 में कुल चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। 1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के समय उन्होंने मुसलमानों को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व देने का विरोध किया था। इस पर महात्मा गांधी ने उन्हें महामना की उपाधि प्रदान की थी। 1918 में जब वे कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो उन्होंने सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय उद्घोष के रूप में स्वीकार करने की अपील की थी। आज सत्यमेव जयते भारत के राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह में अंकित है।
वे पहली बार 1912 में इम्परियल लेजिसलेटिव काउन्सिल के सदस्य चुने गये थे तथा लगातार 1926 तक इसके सदस्य बने रहे। 1991 के बाद इम्परियल लेजिसलेटिव काउन्सिल का नाम बदलकर सेण्ट्रल लेजिसलेटिव काउन्सिल कर दिया गया था। जब प्रो-चेन्जरस द्वारा 1923 में कांग्रेस से अलग होकर स्वराज पार्टी की स्थापना की गई थी, तब वे आधिकारिक तैार पर स्वराज पार्टी में तो नही शामिल हुये, लेकिन उन्होंने कांग्रेस तथा स्वराज पार्टी दोनो से अलग लाला लाजपत राय तथा एन सी केलकर के साथ मिलकर एक समूह बनाया था जिसे रिस्पान्स्विसट के नाम से जाना जाता था। रिस्पान्स्विसट भी हिन्दू हितों की रक्षा के लिये विधायिकाओं में प्रवेश के पक्षधर थे, जबकि मुख्य कांग्रेस पार्टी इसका विरोध कर रही थी।
मालवीय ने 1920 के असहयोग आन्दोलन, 1928 के साइमान कमीशन के बहिष्कार तथा 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की थी। 1922 के चौरी चौरा कान्ड में गोरखपुर जिला न्यायालय ने 177 व्यक्तियों को मृत्यु दण्ड दिया था, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की गई तो मालवीय ने उनकी वकालत की तथा इसमें से 155 लोगों को दोषमुक्त किया गया तथा शेष लोगों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला गया। उन्होंने 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया, लेकिन वे 1932 के साम्प्रदायिक निर्णय के विरोधी थे। हरिजनों के संबन्ध में 1932 के पूना पैक्ट के बाद पृथक निर्वाचन को वापिस ले लिया गया, लेकिन मुसलमानों तथा सिक्खों के लिये पृथक निर्वाचन प्रणाली लागू बनी रही। जब कांग्रेस ने इसका विरोध नही किया तो मालवीय कांग्रेस से अलग हो गये तथा 1934 में श्रीहरि अनेय के साथ मिलकर अलग से कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की। कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी को 1934 के चुनावों में केन्द्रीय विधायिका में 12 स्थान प्राप्त हुये। 1933 में जब गांधी जी ने आल इण्डिया अनटचिबलिटी लीग के स्थान पर हरिजन सेवक संघ की स्थापना की तो वे उसके पहले अध्यक्ष बने। इस अवसर उन्होंने कहा कि यदि आपका धर्म आत्मा की आन्तरिक शुद्धता पर बल देता है तो किसी अन्य व्यक्ति के स्पर्श मात्र से कोई व्यक्ति अपवित्र नही हो सकता है।
ब. पत्रकार के रूप में योगदान
मदन मोहन मालवीय ने पत्रकारिता की शुरूआत 1887 में हिन्दुस्तान अखबार के सम्पादक रूप में की थी। 1889 में उन्होंने एक अन्य समाचार पत्र इण्डियन आपीनियन का सम्पादन किया। अह अखबार जब बन्द हो गया तो 1907 में उन्होंने अपने साप्ताहिक हिन्दी अखबार ’अभ्युदय’ का प्रकाशन आरंभ किया। मालवीय ने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाने वाले कानूनों- न्यूजपेपर एकट, 1908 तथा इन्डियन प्रेस एक्ट, 1910 का विरोध किया तथा व्यापक विरोध के लिये उन्होंने 1909 में अंगेजी दैनिक अखबार ‘लीडर‘ की शुरूआत की। 1910 में उन्होंने एक अन्य हिन्दी अखबार ‘मर्यादा‘ की शुरूआत की।
1924 में मालवीय ने घनश्याम दास बिरला, लाला लाजपत राय तथा एम आर जयकर के साथ मिलकर ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ अखबार का स्वामित्व प्राप्त किया। मालवीय 1924 से 1926 तक इस अखबार के सम्पादक रहे। वर्तमान में यह अखबार बिरला के स्वामित्व में संचालित है।
मालवीय ने मकरन्द नाम से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पत्रिका ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका‘ तथा बालकृष्ण भट्ट की पत्रिका हिन्दी प्रदीप में अपनी कवितायें व लेख भी प्रकाशित किये। इस प्रकार पत्रकारिता तथा लेखन के क्षेत्र में मालवीय का महत्वपूर्ण योगदान है।
स. शिक्षा तथा समाजसेवा में योगदान
शिक्षा के क्षेत्र में मालवीय का सबसे महत्वपूर्ण योगदान 1915 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना है। आरंभिक तौर पर इसकी स्थापना 1898 में एनी बेसेन्ट द्वारा स्थापित सेन्ट्रल हिन्दू कालेज को मिलकार की गई थी। मालवीय जी 1919 से 1939 तक बनारस विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे थे।
उनके द्वारा कुंभ मेला के दौरान 1915 में हरिद्वार में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना भी की गई थी। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा एक राजनीतिक दल है तथा आज भी कार्यरत है। उन्होंने हरिद्वार में गंगा आरती की शुरूआत भी की थी जो आज भी संचालित होती है।
समाजसेवा के क्षेत्र में मालवीय जी का एक अन्य योगदान 1934 में युवाओं में स्काउटिंग व समाजसेवा के लिये आल इंडिया सेवा समिति की स्थापना है, क्योंकि भारतीयों युवाओं को ब्रिटिश ब्वाइज स्काउट में ज्वाइन करने का अवसर नही मिलता था। बाद में 7 नवम्बर 1950 को आल इंडिया सेवा समिति को भारत स्काउट व गाइड में विलय कर दिया गया था। आज भी भारत स्काउट व गाइड की कूट भाषा मामोमा (MAMOMA) मालवीय जी के नाम पर आधारित है।
अविरल गंगा रक्षा समझौता क्या है?
गंगा नदी के संरक्षण के लिये मदन मोहन मालवीय ने 1905 में गंगा महासभा की स्थपना की थी। उन्होंने गंगा नदी के संरक्षण के लिये ब्रिटिश सरकार पर निरन्तर दबाव डाला । परिणामतः 1916 में गंगा महासभा तथा ब्रिटिश सरकार के बीच अविरल गंगा समझौते पर हस्ताक्षर हुये, जिसमें ब्रिटिश सरकार ने बिना किसी रोक टोक के गंगा नदी के बहाव को बनाये रखने का आश्वासन दिया। यही कारण था कि ब्रिटिश काल में गंगा नदी पर कोई बांध नही बनाया गया। यह उनकी दूर की सोच का परिणाम है। आज सरकार इसी कार्य को पूरा करने के लिये क्लीन गंगा मिशन पर कार्य कर रही है।

Image Courtesy: Wikipedia
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