अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर, 2026 को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026’ को कानून के तौर पर स्वकृति प्रदान कर दी है। भारत की विदेश नीति के पर्यवेक्षक सोच रहे हैं कि क्या लिंडसे ग्राहम एक्ट पास करके ट्रंप ने भारत के धैर्य की सीमा पार कर दी है ? तथा भारत पर इसके गंभीर असर क्या होंगे? यह कानून ट्रम्प की सालभर से चल रही भारत को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियों जैसे भारतीय सातान पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाना, पाकिस्तान को बढ़ावा देना, क्वाड तथा भारत दोनो को हिन्द-प्रशान्त रणनीति में कम महत्व देना आदि। भारत और अमेरिका के बीच सालभर से चल रहे मतभेदों के बीच नया अधिनियम तनाव का एक नया कारण है।
लिंडसे ग्राहम एक्ट, दूसरी बातों के अलावा, उन देशों पर प्रतिबन्ध लगाता है जो रूस से तेल खरीदेंगे और ईरान के साथ व्यापार करेंगे। ईरान के मामले में, यह नया कानून असल में पुराने कानून (ईरान सैंक्शन एक्ट, 1996) की अवधि को 31 दिसंबर, 2031 तक बढ़ा देता है।
जो देश इस कानून का उल्लंघन करेंगे, उन्हें अमेरिका के सेकेंडरी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा, जैसे 100 प्रतिशत टैरिफ, बैंकिंग प्रतिबन्ध, संपत्ति जब्त करना और वीजा पर रोक । यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों को छूट देने का अधिकार भी देता है जो राष्ट्रपति से सलाह-मशविरा करते हैं और उनके निर्देशों का पालन करते हैं।
हालांकि इस कानून से चीन भी प्रभावित है, लेकिन यह भारत के लिए अधिक नुकसानदेह है, जिसके निम्न कारण हैं:
1. अगर भारत रूस से तेल खरीदता है, तो उसे अमेरिका से 100 प्रतिशत टैरिफ के रूप में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य (ईरान और अमेरिका दोनों की हरकतों की वजह से) और बाब अल-मंदेब (हूतियों की हरकतों की वजह से) में रुकावटों को देखते हुए, भारत के पास तेल खरीदने के सीमित विकल्प हैं। अभी भारत अपने कुल तेल आयात का 40 प्रतिशत रूस से आयात करता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के खतरे के बावजूद यह जारी रहेगाए क्योंकि भारत के पास कोई और विकल्प नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की इस मजबूरी को समझने में नाकाम रहे हैं।
2. जहां तक ईरान की बात है, मई 2024 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के अन्तर्गत भारत, ईरान के चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहश्ती टर्मिनल का संचालन कर रहा है। अब तक भारत ने इस टर्मिनल के विकास पर 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। पहले अमेरिका ने भारत को इस बंदरगाह के लिए छूट दी थी, जो अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। अब लिंडसे ग्राहम एक्ट के तहत नए प्रतिबंध लागू हो गए हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम है क्योंकि यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से कनेक्टिविटी देता है। यह ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) को चालू करने के लिए भी बहुत जरूरी है, जो मॉस्को को मुंबई से जोड़ता है और मुख्य रूप से चाबहार बंदरगाह से होकर गुज़रता है।

चित्र साभार: रैन्डमपिकअप
इस तरह, भारत पर नए लिंडसे ग्राहम एक्ट का बहुत बड़ा असर होगा।
भारत की प्रतिक्रिया क्या होगी?
इसमें कोई सन्देह नहीं कि पिछले तीन दशकों में, यानी शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, भारत और अमेरिका के बीच बहुत करीबी रणनीतिक संबंध बने हैं। लेकिन, हमारे आकलन के अनुसार, भारत अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकी के आगे नहीं झुकेगा, जिसके निम्नलिखित कारण हैं:
1. रूस से तेल की ज़रूरत भारत की ऊर्जा सुरक्षा का मामला है, जिस पर भारत कोई समझौता नहीं कर सकता।
2. भारत एक सभ्यता-आधारित देश है, जिसे इस तरह की धमकियों से निपटने का बहुत ज़्यादा कूटनीतिक अनुभव है। इसी वजह से, भारत इस मुद्दे पर अमेरिका से टकराव मोल नहीं लेगा। भारत बिना अमेरिका से टकराए, बस अपने राष्ट्रीय हित के लिए जरूरी काम करता रहेगा।
3. ट्रंप को कूटनीति और इतिहास दोनो की बहुत कम जानकारी है। उन्हें शीत युद्ध के दौर में भारत की ‘गुटनिरपेक्ष नीति’ (Non-alignment policy) के प्रभावी तरीके से लागू होने के बारे में नहीं भूलना चाहिए। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, अमेरिका ने भारत को धमकाने के लिए अपना 7वां बेड़ा हिन्द महासागर में भेजा था, लेकिन भारत की कूटनीति कामयाब रही और अमेरिका को अपना बेड़ा वापस बुलाना पड़ा। आखिरकार, भारत युद्ध जीत गया।
4.अमेरिका के पास ऐसे प्रतिबंध लगाने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं है। ऐसे प्रतिबंध सिर्फ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ही लगा सकती है।
भारत की रणनीति अमेरिका से उलझने की बजाय इन प्रतिबंधों को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म करने की होगी। यही बात ट्रंप समझ नहीं पा रहे हैं।
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