फिलीस्तीन में क्या आज  इजराइल वही गलती कर रहा है जो आठ दशक पहले अरब देशों ने की थी?

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ईरान युद्ध को उसकी हार-जीत के रूप में नही वरन् उससे पश्चिम एशिया में होने वाले सामिरक बदलावों के रूप में याद किया जायेगा। इस युद्ध में अमेरिका के समक्ष ईरान का टिके रहना की उसकी जीत है। और ये सभी सामरिक बदलाव दीर्घकाल में इजराइल के हित में नही है।

फिलीस्तीनी समस्या क्या है?

अरब- इजराइल समस्या विश्व समुदाय की सबसे पुरानी समस्याओं में से एक है। इस समस्या के मूल में है- फिलीस्तीन (जिस पर अब इजराइल का कब्जा है) का बंटवारा कर उस पर इजराइल व फिलीस्तीन दो स्वतंत्र राज्यों की स्थापना । 14 मई 1948 को इजराइल की स्थापना के पहले फिलीस्तीन क्षेत्र को संयुक्त राष्ट्र की न्यास प्रणाली के अन्तर्गत ब्रिटेन की देख-रेख में रखा गया था। वास्तव में फिलीस्तीनी क्षेत्र 1919 में आटोमन साम्राज्य की हार के बाद उससे मुक्त होने के बाद स्वतंत्र अस्तित्व में आया था तथा तभी से उसे पहले राष्ट्र संघ की मैन्डेट प्रणाली तथा बाद में संयुक्त राष्ट्र की न्यास प्रणाली के अन्तर्गत ब्रिटेन की देख रेख में था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने फिलीस्तीन से अपना न्यास समाप्त करने कर निर्णय लिया तथा फिलीस्तीन के भविष्य का निर्धारण करने के लिये 2 अप्रिल 1947 केा इस प्रश्न को पहली बार संयुक्त राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक कमेटी की अनुसंशा पर 29 नवम्बर 1947 को प्रस्ताव संख्या 181 के अन्तर्गत फिलीस्तीन के बंटवारे का अनुमोदन किया। इस प्रस्ताव में फिलीस्तीन क्षेत्र को  विभाजित कर उसमें दो स्वतंत्र राज्यों- फिलीस्तीन व इजराइल की स्थापना किया जाना था तथा जेरूशलम को एक अन्तर्राष्ट्रीय शहर के रूप में रखा जाना था। इजराइल ने तो इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, लेकिन अरब देशों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद इजराइल व अरब देशों के बीच निरन्तर सैनिक संघर्ष चलता रहा है। अमेरिका तथा यूरोप समर्थित इजराइल को चार प्रमुख अरब-इजराइल युद्धों- 1948, 1956, 1967 तथा 1973 में विजय हासिल हुई है। अरब देश तो अब प्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष से अलग हो गये है लेकिन इजराइल व फलीस्तीनी समूहों के बीच अब भी निरन्तर संघर्ष चल रहा है। 2023 से चल रहा गाजा संघर्ष भी इसकी का अंग है। ईरान का वर्तमान युद्ध भी इसी समस्या का परिणाम है क्योंकि ईरान इजराइल विरोधी समूहों जैसे गाजा में हमास तथा लेबनान में हिजबुल्ला का समर्थन करता है। इजराइल इसे अपनी सुरक्षा के लिये खतरा मानता है। निक्ट भविष्य भी फिलीस्तीन समस्या के समाधान के कोई आसार दिखाई नही दे रहे हैं।

चित्र साभार- ए0बी0सी0 न्यूज

फिलीस्तीन में क्या आज  इजराइल वही गलती कर रहा है जो आठ दशक पहले अरब देशों ने की थी?

यह एक विडम्बना ही है कि जो फिलीस्तीनी राज्य अरब देशों को 1947 में बिना किसी प्रयास के प्राप्त हो रहा था आज वही स्वतंत्र फिलीस्तीनी राज्य तमाम संघर्षों के बाद भी नही प्राप्त हो रहा है, क्योंकि बदली परिस्थतियों में अब इजराइल इसके लिये तैयार नही है। जिन क्षेत्रों में फिलीस्तीनी राज्य बनना था, उन पर अधिकांशतः इजराइल ने कब्जा कर रखा है।

अरब देशों द्वारा 1947 में फिलीस्तीन राज्य के प्रस्ताव को अस्वीकार करना एक सामरिक गलती थी। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि अरब देश उस समय की सामिरक स्थिति को नही भांप सके। उनका मानना था कि इजराइल एक छोटा राज्य है, जो चारो तरफ से इस्लामिक देशों से घिरा है तथा उसे कभी भी पराजित कर फिलीस्तीन पर कब्जा किया जा सकता है। अरब देश यह अनुमान नही लगा पाये कि इजराइल को अमेरिका तथा यूरोपीय देशों से इतनी सैनिक व राजनीतिक मदद मिलेगी कि उसे पराजित करना आसान नही होगा। 1948 से लेकर अब तक इजराइल उसी समर्थन के बल पर अरब देशों पर हावी रहा है। लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही है।

एक स्वतंत्र फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना एक सच है जिसक टाला तो जा सकता ळै लकिन उसे खारिज नही किया जा सकता है। इजराइल को  अब इस सच को स्वीकार करने का सही समय है। अब इजराइल को यह सोचना होगा कि ईरान युद्ध 2026 के बाद पश्चिम एशिया की सामरिक स्थिति में बदलाव हो रहा है। इस बदलाव के दूरगामी परिणामों को समझने की जरूतर है।

पहला, फिलीस्तीनियों तथा अरब देशों की सैनिक स्थिति कितनी ही कमजोर क्यों न हो, एक स्वतंत्र फिलीस्तीनी राज्य का समर्थन विश्व समुदाय में कम नही हुआ है। सितम्बर, 2026 में जब इजराइल के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र की महासभा को संबोधित करने के लिये खड़े हुये तो इसके विरोध में कई देशों के प्रतिनिधि सदन से बाहर आ गये तथा महासभा का सदन लगभग खाली हो गया। यूरोपीय देशों के साथ भारत जैसे इजराइल के मित्र देश भी स्वतंत्र फिलीस्तीन की मांग का समर्थन कर रहे हैं। गाजा की हिंसा के बाद कुल मिलाकर फिलीस्तीन के प्रश्न पर इजराइल विश्व समुदाय में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। अमेरिका ही एक मात्र देश है जो इजराइल की सभी नीतियों का खुलकर समर्थन कर रहा है।

दूसरा, रही अमेरिका की बात तो ईरान युद्ध के बाद पश्चिम एशिया में अमेरिकी की सामरिक स्थिति कमजोर होना तय है। इसक संकेत मिल रहे हैं- अमेरिका इरान युद्ध के दौरान अपने खाड़ी मित्र देशों  (साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन कतर आदि) की ईरानी हमलों से रक्षा नही कर पाया, अमरिका की इच्छा के विपरीत हार्मुज जलडमरूमध्य ईरान ने बनद कर रखा है, जो इस युद्ध के पहले खुला था, अमेरिका से निराश साउदी अरब ने पाकिस्तान व तुर्की के साथ मिलकर अलग सैनिक गठबनधन बना लिया है, तथा अमरेरिका ने ईरान के हमलों से बचने के लिये 30 सितम्बर, 2026 को ईराक से अपनी सेनायें वापिस बुलाकर वहां ईरान समर्थित सैनिक समूहों की स्थिति मजबूत की है, आदि।

तीसरा, यद्यपि ईरान युद्ध के समय इजराइल को अमेरिका से पर्याप्त सैनिक व राजनीतिक समर्थन मिला है। लेकिन क्या भविष्य में भी पश्चिम एशिया से वापिस जाते हुये अमरिका से इजराइल को इसी तरह की मदद मिलती रहेगाी, यह विचारणीय प्रश्न है। ट्रम्प की तमाम कोशिशों के बाद भी यूरोप के देशों ने खुलकर अमेरिाकी की सैनिक मदद नही की। जहां तक सूडान, मोरक्को, बहरीन तथा संयुक्त अरब अमीरात द्वारा इजराइल के साथ उसके साथ मित्रता के लिये हस्ताक्षरित अब्राहम समझौतों की बात है, तो यह समझना होगा कि ये समझौते अरब देशों ने इजराइल के आकर्षण में नही, वरन् अमेरिका के दबाव में किये है। क्या भविष्य में भी अमेरिका अब्राहम समझौते के लिये अरब देशों पर इस प्रकार का दबाव डालने की स्थिति में होगा? निष्कर्ष यह है कि अब वह समय आ गया है कि इजराइल को अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की सैनिक सहयाता के बिना अपनी सुरक्षा के बारे में सोचना होगा।

तीसरा, बदलती परिस्थितियों में इजराइल के लिये एक मात्र सहायक तत्व इस्लामिक देशों के बीच आपसी एकता का अभाव है। ईरान तथा साउदी अरब के बीच क्षेत्र के नेतृत्व को लेकर तनाव है। इसके अलावा हाल में ही यमन की समस्या को लेकर साउदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच नये तनाव उभर आये हैं। गत सालों में अमेरिका की पश्चिम एशिया में उपस्थिति के कारण ही यह तनाव बढ़ते रहे हैं। लेकिन अब पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्रभाव पहले जैसेा नही रहेगा। ईरान तथा साउदी अरब दोनो ही रूस व चीन के साथ ब्रिक्स के सदस्य हैं तथा अमरिका की पश्चिम एशिया में कमजोर होती स्थिति के आलोक में रूस तथा चीन इन देशों के बीच एकता को मजबूत कर सकते हैं।

पश्चिम एशिया में हो रहे इस सामरिक बदलाव को इजराल द्वारा नजरअन्दाज करना उसके दीर्घकालीन हितों के अनुकूल नही होगा। इस बदलाव से निबटने के लिये एक स्वतंत्र फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना का ट्रम्प कार्ड अब भी उसके हाथ में है।

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