भारत में चुनाव सुधारों के क्या स्रोत है? अब तक किये गये प्रमुख चुनाव सुधार क्या है?

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चुनाव सुधार क्यों ?

भारत में प्रतिनिधि लोकतंत्र है, जहाँ लोग समय-समय पर अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं ताकि वे उनकी ओर से राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर सकें। इसलिए, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना प्रतिनिधि लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्शयक शर्त है। इसलिए, चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और लोगों की पसंद के अनुरूप बनाने के लिए हमें चुनावी प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है। चुनावी सुधार एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। चुनावी प्रक्रिया को प्रभावी, स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने के लिए उसमें किए गए किसी भी सुधार को चुनाव सुधार कहा जा सकता है। भारत में चुनाव सुधार मुख्य रूप से युवाओं की अधिक भागीदारी, मतदाताओं की संख्या बढ़ाने, चुनाव आयोग को कई सदस्यों वाली संस्था बनाकर मजबूत करने, चुनावों में उम्मीदवारों की संख्या कम करने, चुनावों में धन और बाहुबल की भूमिका को कम करने, और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग को रोकने पर केंद्रित रहे हैं।

भारत में चुनावी सुधारों के स्रोत

भारत में चुनावी सुधारों के स्रोत हैं: चुनाव आयोग के प्रस्ताव, विधि आयोग या अन्य समितियों की रिपोर्ट, संसद के कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय।

अ. भारत के चुनाव आयोग द्वारा सुधार

टी.एन. शेषन (1990-96) के कार्यकाल के दौरान चुनाव आयोग को नई ऊर्जा मिली; उन्होंने मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर आयोग को नई दिशा दी। अभ्रभी तक चुनाव आयोग द्वारा निम्नलिखित चुनावी सुधार लागू किए गए:

1. चुनाव आयोग ने 1971 में ‘आदर्श आचार संहिता’ (Model Code of Conduct) जारी की। यह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए चुनाव से पहले दिशा-निर्देशों का एक दस्तावेज है, जिसका उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। यह चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की तिथि से लेकर नतीजों की घोषणा तक लागू रहती है। हालाँकि आदर्श आचार संहिता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों को भारतीय दंड संहिता, 1860; दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 जैसे अन्य कानूनों के प्रावधानों का इस्तेमाल करके लागू किया जा सकता है।

2. चुनाव आयोग ने 1998 और 2001 के बीच क्रमशः इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) का प्रयोग शुरू किया। 2004 से सभी आम चुनावों और विधानसभा चुनावों में इनका प्रयोग हो रहा है। EVM ने चुनावी प्रक्रिया को ज़्यादा प्रभावी बनाया है, फर्जी मतदान और बूथ कैप्चरिंग पर रोक लगाई है, और वोटिंग व गिनती की प्रक्रिया में लगने वाले समय की बचत की है।

3. हालांकि किसी राजनीतिक पार्टी के चुनावी खर्च पर कोई सीमा नहीं है, फिर भी चुनाव आयोग ने अलग-अलग उम्मीदवारों के खर्च पर सीमा तय की है, यानी लोकसभा चुनाव के लिए 50-70 लाख रुपये और विधानसभा चुनावों के लिए 20-28 लाख रुपये। इसका चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के खर्च पर कुछ सकारात्मक प्रभाव हुआ है।

4. 2013 में, चुनाव आयोग ने पोस्टल बैलेट वोटिंग का दायरा छह तरह के मतदाताओं को शामिल किया है: स्पेशल वोटर, सर्विस वोटर, सर्विस और स्पेशल वोटर की पत्नियां, प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) में रखे गए वोटर, चुनावी ड्यूटी पर तैनात वोटर और नोटिफाइड वोटर।

5. चुनाव आयोग ने मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव को रोकने के लिए चुनावों के आखिरी चरण के खत्म होने तक एग्जिट पोल के प्रसारण पर रोक लगाई है।

भारत के चुनाव आयोग ने 2004 में ‘प्रस्तावित चुनावी सुधार’ नाम का एक दस्तावेज़ तैयार किया था, जिसमें दूसरी बातों के अलावा निम्न बिंदु भी शामिल है: सिक्योरिटी डिपॉजिट बढ़ाने की जरूरत; गंभीर आपराधिक अपराधों के आरोपी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना; किसी व्यक्ति के चुनाव लड़ने वाली सीटों की संख्या को एक तक सीमित करना; ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के नतीजों को छापने पर कुछ रोक; सरोगेट विज्ञापनों से निपटने के लिए स्पष्ट प्रावधान; नेगेटिव वोटिंग को शामिल करने के लिए कानून में संशोधन; आम जनता के लिए राजनीतिक पार्टियों के खातों का अनिवार्य प्रकाशन; चुनावों से छह महीने पहले सरकारी उपलब्धियों के विज्ञापन पर रोक आदि।

हालांकि, आयोग से जुड़े दो प्रस्तावित सुधारों पर ध्यान देने की ज़रूरत है: I. दूसरे संवैधानिक निकायों की तरह, आयोग के खर्च को संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित व्यय (charged expenditure) घोषित किया जाना चाहिए। 2. ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951’ के तहत नियम बनाने का अधिकार आयोग को दिया जाना चाहिए। अभी, नियम बनाने की शक्ति का प्रयोग सरकार के विधि मंत्रालय के पास है, (ECI: 2019)।

ब. संसद और चुनावी सुधार

संसद ने संविधान में संशोधन और अन्य संबंधित कानूनी प्रावधानों के द्वारा कई चुनावी सुधार किए हैं। इनमें से कुछ सुधार इस प्रकार हैं:

1. संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मतदान की न्यूनतम उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल कर दी गयी।

2. ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ में संशोधन (1988) करके धारा 13CC जोड़ी गई, जिसके तहत चुनाव कर्मचारियों को चुनाव आयोग की प्रतिनियुक्ति (deputation) पर माना जाता है। इसके परिणामस्वरूप, राज्य और केंद्र सरकार के सभी कर्मचारी चुनाव आयोग के नियंत्रण, देखरेख और अनुशासन के दायरे में आ जाते हैं।

3. 1989 में, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ में एक नई धारा 58A जोड़ी गई, जिसने भारत के चुनाव आयोग को बूथ कैप्चरिंग (बूथ पर कब्ज़ा करने) के मामलों में मतदान को रद्द करने और दोबारा मतदान का आदेश देने का अधिकार दिया। संसद ने चुनावों में समय और पैसा बचाने के लिए प्रचार की अवधि को 21 दिन से घटाकर दो सप्ताह करने के लिए भी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951′ में संशोधन किया गया है।

4. ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010‘ राजनीतिक दलों, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और विधायिका के सदस्यों को किसी भी विदेशी देश या स्रोत से कोई भी चंदा या योगदान लेने से रोकता है।

5. संसद ने ‘वित्त अधिनियम, 2017‘ पारित किया, जिसमें चुनावी बॉन्ड योजना शुरू की गई। चुनावी बॉन्ड बिना ब्याज वाले ‘बेयरर बॉन्ड’ (जिसके पास बॉन्ड हो, वही उसका मालिक) होते हैं, जिन्हें नागरिक राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए खरीद सकते हैं। विपक्षी दलों ने इस योजना की कुछ आलोचना भी की है क्योंकि इसमें चंदा देने वाले की पहचान का खुलासा करने का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे फरवरी 2024 में अवैध घाेषित कर दिया था।

स. न्यायपालिका और चुनावी सुधार

भारतीय न्यायपालिका ने भी कई ऐसे फैसले सुनाए हैं जिससे चुनावी सुधार हुये है। इनमें से कुछ प्रमुख फैसले इस प्रकार हैं:

1. सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम भारत संघ (2003) मामले में यह फैसला सुनाया कि भारत में मतदाताओं को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अन्तर्गत राजनीतिक उम्मीदवारों के बारे में जानकारी पाने का अधिकार है। इस वजह से, नामाकंन करते समय उम्मीदवारों की आय और संपत्ति की जानकारी देने का नियम बनाया गया।

2. लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) मामले में, कोर्ट ने ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (Representation of Peoples Act) की धारा 8(4) को रद्द कर दिया। इस धारा के अन्तर्गत, दोषी ठहराए गए सांसद/विधायक अपील के दौरान भी अपने पद पर बने रह सकते थे। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी सांसद/विधायक को दो साल या उससे ज़्यादा की सजा होती है, तो अपील के बावजूद उन्हें तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

3. एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य मामले (2013) में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र (manifesto) के लिए गाइडलाइंस बनाए। इन गाइडलाइंस का उद्देश्य पारदर्शिता, समान अवसर और चुनावी वादों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना था।

4. इसके बाद, PUCL बनाम भारत संघ (2013) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में नागरिकों के NOTA (इनमें से कोई नहीं) या नकारात्मक वोट देने के संवैधानिक अधिकार को बरकरार रखा।

5. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ मामले (2013) में, सुप्रीम कोर्ट ने VVPAT (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) के इस्तेमाल को अनिवार्य और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का ज़रूरी हिस्सा बना दिया।

6. 2013 में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने एक आदेश में राजनीतिक पार्टियों को ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (public authorities) माना था। लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने इस निर्देश को नही माना। इसलिए, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इस याचिका का उद्देश्य राजनीतिक पार्टियों को ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ (RTI Act) के दायरे में लाना था, ताकि चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सके। लेकिन अभी भी राजनीतिक पार्टियां सूचना का अधिकार अधिनियम’ 2005 के दायरे से बाहर हैं, क्योंकि इस मामले पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है।

चुनाव सुधार समितियां तथा अन्य आयोगों के सुझाव

सरकार ने भारत में चुनाव सुधारों का अध्ययन करने और सुझाव देने के लिए कई कमेटियां बनाई हैं-

1. तारकुंडे/जयप्रकाश नारायण कमेटी (1974-1975)

कमेटी के सुझाव हैं: चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संस्था हो; मुख्य चाुनावा आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधान मंत्री और लीडर ऑफ अपोजिशन वाली कमेटी से सलाह करके किया जाए, न कि सिर्फ प्रधानमंत्री द्वारा; चुनाव के समय सरकार केयरटेकर सरकार के तौर पर काम करे; राज्य द्वारा राजनीतिक दलों को वित्तीय सहायता; कंपनियों द्वारा अनुदान पर रोक; उम्मीदवारों और उनके राजनीतिक दलों के खातों का नियमित लेखा परीक्षण ; मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 साल करना आदि। इनमें से कुछ सिफारिशें लागू कर दी गई हैं।

2. चुनाव सुधारों पर गोस्वामी कमेटी (1990)

कमेटी ने निम्न सुझाव दिए: उपचुनाव कराने की निश्चित समय सीमा; स्वतंत्र उम्मीदवारों की जमानत राशि बढ़ाना; अखबारों में विज्ञापन देने पर रोक लगाना; बूथ कैप्चरिंग, धांधली और डराने-धमकाने को रोकने के लिए कानून बनाना; उम्मीदवारों को एक से अधिक चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने से रोकना।

3. चुनावों की स्टेट फंडिंग पर इंद्रजीत गुप्ता कमेटी (1998)

कमेटी ने ये सुझाव दिए: स्टेट फंडिंग सुविधाओं के रूप में होनी चाहिए; केंद्र और राज्यों से 600 करोड़ के बराबर योगदान का एक इलेक्शन कॉर्पस फंड बनाना; राज्य की वित्तीय सहायता केवल मान्यता प्राप्त पार्टियों तक ही सीमित होना चाहिए; राजनीतिक दलों के लिए आयकर विभाग को सालाना अकाउंट जमा करना जरूरी होना चाहिए; 10,000 रुपये से अधिक का डोनेशन चेक/ड्राफ़्ट के रूप में होना चाहिए और साथ ही डोनर के नाम भी बताने चाहिए।

4. जीवन रेड्डी कमेटी (2008)

कमेटी ने ये सुझाव दिए:

अ. राजनीति में दल-बदल को रोकने के लिए, इसने संविधान के 10वी अनुसूची के तहत पार्टियों के विलय और फूट पर पूरी तरह रोक लगाने का सुझाव दिया।

ब. चुनाव के लिए जमानत राशि में दस गुना बढ़ोतरी की जाए ताकि गैर-गंभीर उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके।

स. राजनीति में आपराधिक लोगों की एंट्री रोकने के लिए, जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में यह संश्सीशोधन किया जाये कि यदि किसी भी अपराध में कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाते हैं, तो उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाना चाहिए। कृपया ध्यान दें कि पहले की वोहरा कमेटी (1993) ने भी नेताओं, नौकरशाही और अपराधियों के बीच करीबी सांठगांठ पाई थी।

5. तन्खा समिति (कोर समिति), 2010

वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक के. तन्खा की अध्यक्षता में विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा इस (कोर) समिति का गठन किया गया था। इसकी मुख्य सिफारिशे निम्नलिखित हैं-

  1. चुनावी सुधारों का दायरा: देश के पुराने चुनाव कानूनों में व्यापक और समग्र संशोधन करना ताकि समकालीन लोकतांत्रिक चुनौतियों से निपटा जा सके।
  2. धनबल पर नियंत्रण: चुनावों में काले धन और अत्यधिक खर्च पर रोक लगाने के लिए कड़े प्रावधान सुझाना।
  3. पारदर्शिता: राजनीतिक दलों के वित्तपोषण (Political Funding) और उम्मीदवारों के चुनाव खर्च के लेखा-जोखा में पारदर्शिता बढ़ाना।
  4. कानूनी ढांचा: चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के वास्ते निर्वाचन आयोग को अधिक सशक्त और प्रभावी वैधानिक समर्थन देने पर जोर देना।

6. चुनाव सुधारों पर राष्ट्रीय विधि आयोग

चुनाव सुधारों पर राष्ट्रीय विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) में सिफारिश की गई थी कि मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों के बनने, काम करने,आय तथा व्यय, और आन्तरिक कामकाज को संसद द्वारा बनाए गए कानून द्वारा नियमित किया जाना चाहिए। इसी तरह, भारत के राष्ट्रीय विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट (इलेक्टोरल डिसक्वालिफिकेशन’– 2014) में झूठे एफिडेविट फाइल करने पर उम्मीदवार को अयाेग्य घाेषित करने की बात की गई थी। राष्ट्रीय विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट (इलेक्टोरल रिफॉर्म्स’- 2015) में निम्न सुझाव दिए गए थे: दोषी लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रोविज़न के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सेफगार्ड; झूठा एफिडेविट फाइल करने को ‘भ्रष्ट चुनावाी आचरण’ माना जाना जिसमें अयोग्यता शामिल हो; लगातार दस साल तक चुनावा न लड़ने पर पॉलिटिकल पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करना; आयोग के सभी सदस्यों को पद मुक्ति के मामले में संवैधानिक सरंक्षण प्रदान कर भारत के चुनाव आयोग को मजबूत करना आदि। आयोग ने अनिवार्य मतदान का विरोध किया है।

7. संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (2001)

संविधान में हर तरह से बदलाव के लिए कई सिफारिशें करने के साथ-साथ, इस आयोग ने चुनाव सुधारों के बारे में भी कुछ सुझाव दिए। इनमें से कुछ सुधार हैं: सभी चुनाव क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) लाना; बूथ कैप्चरिंग और धांधली के मामलों में चुनाव आयोग को चुनाव रद्द घोषित करने और दोबारा मतदान का आदेश देने का अधिकार देना; जाति या धर्म के आधार पर चुनाव प्रचार को दंडनीय अपराध बनाया जाना ; जघन्य अपराधों के दोषी लोगों को किसी भी राजनीतिक पद का चुनाव लड़ने से रोकना; नेताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का जल्द निपटारा; चुनाव याचिकाओं के लिए विशेष अदालतों का गठन; तथा उम्मीदवारों और उनके करीबी रिश्तेदारों की संपत्ति और देनदारियों की घोषणा।

Image Courtesy: The Economic Times

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